Ramakrishna Paramahansa Jayanti : सर्वधर्म समभाव को विश्व पटल पर लाने वाले स्वामी रामकृष्ण परमहंस की जयंती

Ramakrishna Paramahansa Jayanti : स्वामी रामकृष्ण परमहंस भारत के एक महान संत और विचारक थे। बचपन से ही उन्हें ईश्वर में अटूट विश्वास था। उनका विश्वास था कि ईश्वर के दर्शन हो सकते हैं। रामकृष्ण परमहंस को सभी धर्मों की एकता पर विश्वास था। रामकृष्ण मानवता के पुजारी थे। ईश्वर की प्राप्ति के लिए उन्होंने जीवन पर्यंत कठोर साधना और भक्ति की। अपनी कठोर साधना के फलस्वरुप उन्होंने पाया कि विश्व के सभी धर्म सच्चे हैं ।कोई धर्म एक दूसरे से अलग नहीं है। सभी धर्म ईश्वर प्राप्ति के अलग-अलग साधन मात्र हैं।

स्वामी रामकृष्ण परमहंस की जयंती

Swami Ramakrishna Paramahansa Jayanti 2023

Swami Ramakrishna Paramahansa Jayantiस्वामी रामकृष्ण परमहंस (Swami Ramkrishna paramahansa) भारत के एक महान संत और विचारक थे। बचपन से ही उन्हें ईश्वर में अटूट विश्वास था। उनका विश्वास था कि ईश्वर के दर्शन हो सकते हैं। रामकृष्ण परमहंस को सभी धर्मों की एकता पर विश्वास था। रामकृष्ण मानवता के पुजारी थे। ईश्वर की प्राप्ति के लिए उन्होंने जीवन पर्यंत कठोर साधना और भक्ति की। अपनी कठोर साधना के फलस्वरुप उन्होंने पाया कि विश्व के सभी धर्म सच्चे हैं ।कोई धर्म एक दूसरे से अलग नहीं है। सभी धर्म ईश्वर प्राप्ति के अलग-अलग साधन मात्र हैं।

आइए जानते हैं भारत के महान संत एवं स्वामी विवेकानंद के गुरु स्वामी रामकृष्ण परमहंस के जीवन के विषय में –

स्वामी रामकृष्ण परमहंस का जन्म

 स्वामी रामकृष्ण परमहंस का जन्म 18 फरवरी सन 1836 ईस्वी में पश्चिम बंगाल के हुगली जिले में कामारपुकुर नामक गांव में हुआ था। रामकृष्ण एक दीन एवं धर्मनिष्ठ परिवार से थे। बचपन में इनका नाम गदाधर था। रामकृष्ण के पिता का नाम खुदीराम चट्टोपाध्याय था। वह एक निष्ठावान गरीब ब्राम्हण थे। अपने माता-पिता को तो रामकृष्ण परमहंस शाश्वत आनंद की अनुभूति कराते ही थे साथ ही साथ अपने गांव के भोले भाले लोगों के लिए भी शाश्वत आनंद का केंद्र थे। उनका सुंदर स्वरूप, चरित्र की निर्मलता एवं पवित्रता, गहरी धार्मिक भावनाएं, ईश्वर प्रदत्त संगीतात्मक प्रतिभा, आकस्मिक रहस्यमयी समाधि और सबसे अधिक माता-पिता के प्रति उनकी अगाध श्रद्धा और भक्ति ने उन्हें संपूर्ण गांव का आकर्षक व्यक्तित्व बना दिया था।
रामकृष्ण परमहंस (गदाधर) ने साधारण शिक्षा प्राप्त की थी किंतु अपने पिता की सादगी और धर्म निष्ठा से पूरी तरह प्रभावित थे। मात्र 7 वर्ष की आयु में ही परमहंस के पिता का निधन हो गया।

मां महाकाली के दर्शन श्री कृतार्थ

 रामकृष्ण परमहंस जब 17 वर्ष के थे तभी उन्हें यह अनुभूति हुई कि जगन्माता उन्हें पुकार रही है और उसी समय उन्होंने गांव के वंश परंपरागत गृह का परित्याग कर दिया।17 वर्ष की अवस्था में वे कोलकाता के झामपुकुर में अपने बड़े भाई के साथ रहने लगे। कुछ दिन पश्चात परमहंस राजमणि के दक्षिणेश्वर मंदिर कोलकाता में अपने भाई के स्थान पर पुजारी के रूप में नियुक्त हुए। मां महाकाली के चरणों में उन्होंने स्वयं को समर्पित कर दिया। रामकृष्ण परमहंस मां महाकाली के भक्ति भाव में इतने तल्लीन रहने लगे कि लोग उन्हें पागल समझने लगे। मां काली के दर्शन के लिए उनके अंदर जो तड़प थी उसके लिए घंटो ध्यान करते थे। मानव जीवन के प्रत्येक संसर्ग को उन्होंने मां जगदंबा के गहन चिंतन में भुला दिया। मां के दर्शन के लिए उनकी आत्मा की गहराइयों से प्रवाहित रुदन के शब्द कठोर हृदय को भी दया एवं अनुकंपा से भर देते थे।अंततः मां के दरबार में उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली गई और जगन्माता काली ने उनको दर्शन दिया। इस दर्शन से वे कृतार्थ हुए, किंतु यह तो केवल संकेत मात्र था परमहंस जी ने 12 वर्षों तक सभी प्रमुख धर्मों एवं संप्रदायों का असाधारण दृढ़ता और उत्साह के साथ अनुशीलन किया। वह आध्यात्मिक चेतना की उस सीमा तक पहुंच गए जहां से वह विश्व के धार्मिक विश्वासों के सभी स्वरूपों को प्रेम एवं सहानुभूति की दृष्टि से देख सकते थे। अर्थात सभी धर्मों में उनका सामान प्रेम और विश्वास था।

स्वामी रामकृष्ण परमहंस के आध्यात्मिक विचार

   रामकृष्ण परमहंस ने अपने जीवन में प्रयोग करके देखा कि उस परम सत्ता एवं परम सत्य तक पहुंचने के लिए आध्यात्मिक विचार द्वैतवाद, संशोधित अद्वैतवाद एवं निरपेक्ष अद्वैतवाद, यह तीनों महान श्रेणियां मार्ग की अवस्थाएं थी। उनका मानना था कि इन तीनों आध्यात्मिक विचारों को यदि एक दूसरे से जोड़ दिया जाए तो एक दूसरे की पूरक हो जाएंगी।

विवाह

  बंगाल में बाल विवाह की प्रथा होने के कारण रामकृष्ण (गदाधर) का विवाह बाल्यकाल में ही हो गया था। उनकी पत्नी शारदा मणि जब दक्षिणेश्वर आई तब बचपन के गदाधर सन्यासी रामकृष्ण हो चुके थे। उनकी पत्नी मां शारदा मणि ने कहा “ठाकुर के दर्शन एक बार पा जाती हूं यही क्या मेरा कम सौभाग्य है”। परमहंस जी ने अपनी पत्नी मां शारदा मणि के लिए कहा “जो मां जगत का पालन करती है, जो मंदिर में पीठ पर प्रतिष्ठित है वही तो यह (शारदामणि)  है” अर्थात उनको सब में मां के ही दर्शन होते थे।

परमहंस जी का अमृतोपदेश

 स्वामी रामकृष्ण परमहंस जी का जीवन विभिन्न साधनाओं और सिद्धियों से परिपूर्ण था, किंतु महापुरुष की महत्ता उसके चमत्कार में नहीं अपितु उसके अमृतोपदेश में होती है। परमहंस जी की महत्ता उनके त्याग, पराभक्ति, वैराग्य और उनके अमृतोपदेश में है। उनके अमृतोपदेश से हजारों प्राणी कृतार्थ हुए। उनके अमृतोपदेश के प्रभाव से ब्रह्म समाज के अध्यक्ष केशव चंद्र सेन जैसे विद्वान भी प्रभावित थे। परमहंस जी के अमृतोपदेश के प्रभाव एवं उनकी आध्यात्मिक शक्ति ने नरेंद्र दत्त को भारत के गौरव का प्रचारक स्वामी विवेकानंद बना दिया। वह नरेंद्र दत्त जो नास्तिक और तर्कशील थे परमहंस को अपना गुरु बना कर भारतीय संस्कृति एवं गौरव के आधार स्तंभ बने। स्वामी रामकृष्ण परमहंस ने अपना अधिकांश जीवन समाधिस्त होकर व्यतीत किया। उन्होंने काशी, वृंदावन, प्रयाग आदि तीर्थों की यात्रा अपने जीवन के आखिरी 30 वर्षों में की। परमहंस जी  छोटे से दृष्टांत में अपनी पूरी बात कह जाते थे। उनकी उपदेश शैली अत्यंत सरल और भाव ग्राही थी। उन्होंने स्नेह, दया, सेवा के द्वारा सदैव लोक सुधार की शिक्षा दी।

परमहंस जी की आध्यात्मिक प्रेरणा

कुछ समय व्यतीत होने के पश्चात परमहंस जी के कठोर आध्यात्मिक अभ्यास और सिद्धियों का तेजी से प्रचार होने लगा। दक्षिणेश्वर मंदिर का परिसर भ्रमणशील सन्यासियों और भक्तों का प्रिय आश्रय स्थल बन गया। पंडित नारायण शास्त्री, पंडित पद्मलोचन तारकालकर, गौरीकांत, तारकभूषण और वैश्वाचरण जैसे बड़े विद्वान, तांत्रिक साधक और प्रसिद्ध वैष्णव परमहंस जी से आध्यात्मिक प्रेरणा प्राप्त करते थे। परमहंस जी बंगाल में विचारों का नेतृत्व करने वाले तत्कालीन सुविख्यात विचारकों के संपर्क में आए। इन विचारको में  केशवचंद्र सेन, ईश्वरचंद्र विद्यासागर, विजयकृष्ण गोस्वामी, अश्विनकुमार दत्त और बंकिम चंद्र चटर्जी जैसे लोग शामिल थे। परमहंस की जगन्माता के प्रति निष्कपट प्रार्थना के फल- स्वरुप ऐसे सैकड़ों गृहस्थ उनके चारों ओर एकत्रित हो जाते थे जो बड़े ही सरल थे। परमहंस के उपदेशामृत से लोग अपनी आध्यात्मिक पिपासा को शांत करते थे।

स्वामी परमहंस का आध्यात्मिक बंधुत्व

 आचार्य परमहंस ने कुछ चुनिंदा लोगों को अपना साथी बनाया और उनके जीवन को त्याग एवं सेवा के उच्च आदर्शों के अनुरूप मोड़ा। पृथ्वी पर अपने संदेश की पूर्ति के लिए उन लोगों को एक आध्यात्मिक बंधुत्व में बदला। यह दिव्य संदेशवाहक महान आचार्य स्वामी रामकृष्ण परमहंस के कीर्तिस्तंभ को साहस के साथ पकड़े रहे। आचार्य के जीवन के अंतिम वर्षों में पवित्र आत्माओं का प्रतिभा शील मंडल रंग मंच पर अवतरित हुआ। जिसके नेता नरेंद्र दत्त (स्वामी विवेकानंद) थे।

     स्वामी रामकृष्ण परमहंस का संपूर्ण जीवन ईश्वर का अबाध चिंतन था। अपनी ईश्वरभक्ति और जीवन के माध्यम से श्री रामकृष्ण ने यह सिद्ध कर दिया कि ईश्वर का प्रकटीकरण हर समय होता है। और ईश्वर प्राप्ति किसी विशेष युग देश या लोगों का एकाधिकार नहीं है।

     19वीं सदी के भारत के देव पुरुष ने न तो कोई पंथ अपनाया और ना ही उन्होंने मुक्ति का कोई नया मार्ग दिखाया। उनका संदेश उनकी ईश्वर चेतना थी। जब ईश्वर चेतना कम हो जाती है तो परंपराएं, हठधर्मिता और दमनकारी हो जाती हैं और धार्मिक शिक्षाएं अपनी परिवर्तनकारी शक्ति खो देती हैं।

      ऐसे समय में जब धर्म की नींव चरमरा रही थी श्री परमहंस ने अपने ज्वलंत आध्यात्मिक अनुभूतियों के माध्यम से निसंदेह भगवान की वास्तविकता और समय- सम्मानित शिक्षाओं की वैधता का प्रदर्शन किया।

    स्वामी रामकृष्ण ने विभिन्न धर्मों के आध्यात्मिक विषयों का अभ्यास किया और यह महसूस किया कि सभीधर्म एक ही लक्ष्य की ओर ले जाते हैं इस प्रकार उन्होंने घोषणा की –

           “जितने धर्म उतने मार्ग”

     रास्ते अलग-अलग होते हैं लेकिन लक्ष्य एक ही रहता है ईश्वर की प्राप्ति। आज के परमाणु युद्ध से प्रभावित और धार्मिक असहिष्णुता से जूझ रहे विश्व में श्री रामकृष्ण परमहंस का संदेश हमें आशा देता है और रास्ता दिखाता है।

 

रामकृष्ण परमहंस की मृत्यु

     स्वामी परमहंस को 1885 के मध्य गले में कष्ट महसूस हुआ और शीघ्र ही इस कष्ट ने गंभीर रूप धारण कर लिया। 15 अगस्त सन 1886 को उन्होंने महाप्रस्थान किया। सेवाग्राम के संत ने कहा है-

     ” उनका जीवन धर्म को व्यवहार क्षेत्र में उतारकर मूर्त रूप देने के प्रयास की एक अमर गाथा है।”

     स्वामी रामकृष्ण परमहंस का जीवन और उनकी शिक्षा हमें सदैव प्रेरणा देते रहेंगे।