Supreme Court Foundation Day : भारत के सुप्रीम कोर्ट का स्थापना दिवस ( foundation day of supreme court of India)

संविधान के तहत भारत का उच्चतम न्यायालय अथवा भारत का सर्वोच्च न्यायालय सबसे बड़ा न्यायिक प्राधिकरण है। सर्वोच्च न्यायालय को संविधान के भाग 5 अध्याय 4 के अंतर्गत स्थापित किया गया है। संविधान के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय संघीय न्यायालय और भारतीय संविधान का संरक्षक है। भारतीय संघ में सर्वोच्च न्यायालय को व्यापक और अधिकतम न्यायिक शक्तियां प्राप्त हैं। उच्चतम न्यायालय के गठन का प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 124 में किया गया है। जिसके तहत उच्चतम न्यायालय में एक मुख्य न्यायाधीश तथा 7 अन्य न्यायाधीश होंगे। न्यायाधीशों की संख्या का निर्धारण समय-समय पर संसद कर सकती है। संसद में न्यायाधीशों की संख्या का निर्धारण करने के लिए 1956 में उच्चतम न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) अधिनियम 1956 पारित किया और यह संख्या 10 कर दी गई थी। न्यायाधीशों की संख्या में इस अधिनियम में संशोधन करके कई बार वृद्धि की गई।

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Supreme Court Foundation Day (सुप्रीम कोर्ट का स्थापना दिवस) : संविधान के तहत भारत का उच्चतम न्यायालय अथवा भारत का सर्वोच्च न्यायालय (supreme court of india) सबसे बड़ा न्यायिक प्राधिकरण है। सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) को संविधान के भाग 5 अध्याय 4 के अंतर्गत स्थापित किया गया है। संविधान के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय संघीय न्यायालय और भारतीय संविधान का संरक्षक है। भारतीय संघ में सर्वोच्च न्यायालय को व्यापक और अधिकतम न्यायिक शक्तियां प्राप्त हैं। उच्चतम न्यायालय के गठन का प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 124 में किया गया है। जिसके तहत उच्चतम न्यायालय में एक मुख्य न्यायाधीश तथा 7 अन्य न्यायाधीश होंगे। न्यायाधीशों की संख्या का निर्धारण समय-समय पर संसद कर सकती है। संसद में न्यायाधीशों की संख्या का निर्धारण करने के लिए 1956 में उच्चतम न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) अधिनियम 1956 पारित किया और यह संख्या 10 कर दी गई थी। न्यायाधीशों की संख्या में इस अधिनियम में संशोधन करके कई बार वृद्धि की गई।

उच्चतम न्यायालय का इतिहास (History of supreme court)

 1973 के रेगुलेटिंग एक्ट के तहत कोलकाता में पूर्ण शक्ति एवं अधिकार के साथ उच्चतम न्यायाधिकरण की स्थापना की गई। जॉर्ज तृतीय द्वारा वर्ष 1800 एवं 1823 में मद्रास एवं बंबई में सर्वोच्च न्यायालय स्थापित किए गए थे।

उच्च न्यायालय अधिनियम

1861 के तहत विभिन्न प्रांतों में उच्च न्यायालय की स्थापना हुई, जिसके बाद कलकत्ता, मद्रास और मुंबई में उच्चतम न्यायालय तथा प्रेसीडेंसी शहरों में सदर अदालतों को समाप्त कर दिया गया। भारत सरकार अधिनियम 1935 के तहत भारत की संघीय न्यायालय की स्थापना तक उच्च न्यायालयो को सर्वोच्च न्यायालय होने का गौरव प्राप्त था।
भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात जब 26 जनवरी 1950 को भारत का संविधान लागू हुआ, उसी समय 28 जनवरी 1950 को उच्चतम न्यायालय की पहली बैठक हुई और उच्चतम न्यायालय अस्तित्व में आया।

उच्चतम न्यायालय का गठन (Constitution of Supreme Court)

 भारत में 26 जनवरी के 2 दिन बाद अर्थात भारत के एक संप्रभु, लोकतांत्रिक, गणराज्य बनने के 2 दिन बाद 28 जनवरी 1950 को भारत के उच्चतम न्यायालय का गठन हुआ है। इससे पूर्व सन 1937 से 1950 तक ‘ चेंबर ऑफ प्रिंसेसजेड ही भारत के उच्चतम न्यायालय का भवन था। 1958 में उच्चतम न्यायालय ने अपने वर्तमान तिलक मार्ग, नई दिल्ली परिसर का अधिग्रहण किया। इससे पहले आजादी के बाद तक ‘ चेंबर ऑफ प्रिंसेस ही भारत के उच्चतम न्यायालय का भवन था। 28 जनवरी 1950 को इसके उद्घाटन समारोह का आयोजन संसद भवन के नरेंद्र मंडल (चेंबर ऑफ प्रिंसेस) भवन में किया गया था। इसके उद्घाटन के बाद उच्चतम न्यायालय ने संसद भवन के चेंबर ऑफ प्रिंसेस में अपनी बैठकों की शुरुआत की।

उच्चतम न्यायालय की मुख्य पीठ (Principal Bench of the Supreme Court)

उच्चतम न्यायालय की मुख्य पीठ नई दिल्ली में स्थित है लेकिन मुख्य न्यायाधीश राष्ट्रपति से अनुमति लेकर दिल्ली के अतिरिक्त अन्य किसी स्थान पर भी सुनवाई कर सकता है। विधि एवं न्याय पर संसदीय समिति के द्वारा प्रस्तुत 32वी रिपोर्ट में कहा गया कि, निर्धनों जरूरतमंदों की न्याय तक पहुंच को आसान बनाने के लिए उच्चतम न्यायालय की क्षेत्रीय पीठे स्थापित की जानी चाहिए। उच्चतम न्यायालय की क्षेत्रीय पीठे,पश्चिम, दक्षिण व पूर्वोत्तर क्षेत्रों में स्थापित करने की सिफारिश की गई है। इस प्रक्रिया द्वारा निर्धनता के कारण जो जरूरतमंद दिल्ली तक नहीं पहुंच पाते उनको कम खर्च पर न्याय उपलब्ध कराया जा सकेगा। प्रयोग के तौर पर समिति ने ऐसी पहली पीठ दक्षिण में चेन्नई में स्थापित करने की सलाह दी थी।

उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि

 उच्चतम न्यायालय में एक मुख्य न्यायाधीश और 25 अन्य न्यायाधीश 26 न्यायाधीश थे। न्यायाधीशों की संख्या में 1960 में 13, 1977 में 17 तथा 1986 में 25 तक की वृद्धि कर दी गई थी। 21 फरवरी, 2008 को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की संख्या 26 से बढ़ाकर मुख्य न्यायाधीश सहित 31 करने का निर्णय लिया इसे वैधानिक रूप प्रदान करने के लिए उच्चतम न्यायालय अधिनियम (न्यायाधीशों की संख्या) 1956 में संशोधन किया गया और सर्वोच्च न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) 2019 के विधेयक में 4 न्यायाधीशों की वृद्धि की गई इसमें मुख्य न्यायाधीश सहित न्यायिक शक्ति को बढ़ाकर 34 कर दिया गया है।

उच्चतम न्यायालय का क्षेत्राधिकार (Jurisdiction of Supreme Court)

मूल क्षेत्राधिकार-

एक संघीय न्यायालय के रूप में सर्वोच्च न्यायालय निम्न के मध्य किसी भी विवाद का निर्णय कर सकता है

  • दो या अधिक राज्यों के मध्य अथवा
  • केंद्र व एक या अधिक राज्यों के मध्य अथवा
  • केंद्र एवं किसी राज्य या राज्यों का एक तरफ होना तथा एक अथवा अधिक राज्यों का दूसरी तरफ होना
    न्यायादेश क्षेत्राधिकार
  • उच्चतम न्यायालय को बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, उत्प्रेषण, प्रतिषेध एवं अधिकार पृच्छा आदि पर न्यायादेश जारी कर विक्षिप्त नागरिकों के मूल अधिकार की रक्षा का अधिकार प्राप्त है।
  • एक पीड़ित नागरिक सीधे सर्वोच्च न्यायालय में जा सकता है इसके लिए याचिका की माध्यम की आवश्यकता नहीं होती है।
  • उच्चतम न्यायालय के न्यायादेश अधिकार क्षेत्र पर विशेषाधिकार नहीं है। मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए उच्च न्यायालय को भी रिट जारी करने का अधिकार प्राप्त है।

परामर्शदात्री क्षेत्राधिकार-

 संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत राष्ट्रपति को यह अधिकार है कि, जब उसे यह प्रतीत हो की विधि या तथ्य का कोई ऐसा प्रश्न उत्पन्न हो गया है, जो कि ऐसे व्यापक महत्व का है जिस पर उच्चतम न्यायालय की राय लेना आवश्यक है तो उच्चतम न्यायालय उस मामले की सुनवाई कर के राष्ट्रपति को उस प्रश्न या तथ्य पर अपनी सलाह दे सकता है।

अपीलीय क्षेत्राधिकार-

 उच्चतम न्यायालय निचली अदालतों के निर्णय के खिलाफ अपील सुनता है। उच्चतम न्यायालय को विस्तृत अपीलीय क्षेत्राधिकार प्राप्त है। अपीलीय क्षेत्राधिकार को 4 शीर्षकों के अंतर्गत वर्गीकृत किया जा सकता है-

  • संवैधानिक मामलों में अपील
  • दीवानी मामलों में अपील
  • आपराधिक मामलों में अपील
  • विशेष अनुमति द्वारा अपील

न्यायिक समीक्षा की शक्ति-

 न्यायिक समीक्षा केंद्र और राज्य दोनों सरकारों के विधायी अधिनियम और कार्यकारी आदेशों के संवैधानिकता  की जांच करने की शक्ति उच्चतम न्यायालय को प्राप्त है।

पुनर्विलोकन क्षेत्राधिकार-

 उच्चतम न्यायालय को संसद या विधान मंडल द्वारा पारित किसी अधिनियम तथा कार्यपालिका द्वारा  दिए गए किसी आदेश की वैधानिकता का पुनर्विलोकन करने का अधिकार है।

अंतरण का क्षेत्राधिकार-

उच्चतम न्यायालय को निम्न अधिकार भी प्रदान किए गए हैं-

  • किसी उच्च न्यायालय में लंबित मामलों को दूसरे उच्च न्यायालय में अंतरित कर सकता है।
  • उच्चतम न्यायालय उच्च न्यायालय को लंबित मामलों को अपने यहां अंतरित कर सकता है।

अभिलेख न्यायालय

 अभिलेख न्यायालय का आशय उच्च न्यायालय से है जिसके निर्णय सदा के लिए लेखबद्ध होते हैं। संविधान के अनुच्छेद 129 के अनुसार भारत के उच्चतम न्यायालय को अभिलेख न्यायालय की शक्तियां प्राप्त है। अभिलेख न्यायालय के रूप में उच्चतम न्यायालय के पास दो शक्तियां हैं-

  • सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय कार्यवाही और फैसले सर्वकालिक अभिलेख के रूप में दर्ज किए जाते हैं,। किसी अन्य अदालत में सुनवाई के दौरान इन पर प्रश्न नहीं उठाया जा सकता।
  • उच्चतम न्यायालय न्यायालय की अवमानना करने पर दंड देने का अधिकार रखता है। यह दंड 6 माह का कारावास या 2हजार तक का आर्थिक दंड अथवा दोनों हो सकता है।