Chandra Shekhar Azad Death Anniversary 2023 (चंद्रशेखर आजाद शहादत दिवस 2023 ) : महान क्रांतिकारी और स्वतंत्रता सेनानी पंडित चंद्रशेखर आजाद का जीवन परिचय

Chandra Shekhar Azad Death Anniversary (चंद्रशेखर आजाद शहादत दिवस 2023 ) : चंद्रशेखर आजाद भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के प्रसिद्ध क्रांतिकारियों में से एक थे। चंद्रशेखर आजाद, राम प्रसाद बिस्मिल, शहीद भगत सिंह जैसे महान क्रांतिकारियों के घनिष्ठ मित्रों में से थे। आजाद जब 17 वर्ष के थे तभी क्रांतिकारी दल ‘ हिंदुस्तान रिपब्लिक एसोसिएशन’ में सम्मिलित हो गए। धन एकत्र करने के लिए पार्टी की ओर से जितने भी कार्य किए गए, आजाद उनमें सबसे आगे रहे। चंद्रशेखर आजाद ने प्रसिद्ध ‘ काकोरी कांड’ में सक्रिय भूमिका निभाई। भगत सिंह द्वारा असेंबली में बम फेंकना, सांडर्स की गोली मारकर हत्या और वायसराय को ट्रेन बम से उड़ाने का प्रयास, इन सब के नेता चंद्रशेखर आजाद थे। 27 फरवरी को इस महान क्रांतिकारी का शहादत दिवस मनाया जाता है।

Chandra Shekhar Azad Death Anniversary 2023_About Chandra Shekhar azad

चंद्रशेखर आजाद शहादत दिवस || About Chandra Shekhar Azad || India's freedom fighters || Chandra Shekhar Azad's death anniversary || 27 February 2023

Chandra Shekhar Azad’s death anniversary 2023 :
चंद्रशेखर आजाद (Pandit Chandra Shekhar Azad) भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के प्रसिद्ध क्रांतिकारियों में से एक थे। चंद्रशेखर आजाद, राम प्रसाद बिस्मिल, शहीद भगत सिंह जैसे महान क्रांतिकारियों के घनिष्ठ मित्रों में से थे। आजाद जब 17 वर्ष के थे तभी क्रांतिकारी दल ‘ हिंदुस्तान रिपब्लिक एसोसिएशन’ में सम्मिलित हो गए। धन एकत्र करने के लिए पार्टी की ओर से जितने भी कार्य किए गए, आजाद उनमें सबसे आगे रहे। चंद्रशेखर आजाद ने प्रसिद्ध ‘ काकोरी कांड’ में सक्रिय भूमिका निभाई। भगत सिंह द्वारा असेंबली में बम फेंकना, सांडर्स की गोली मारकर हत्या और वायसराय को ट्रेन बम से उड़ाने का प्रयास, इन सब के नेता चंद्रशेखर आजाद (Chandra Shekhar Azad) थे। 27 फरवरी को इस महान क्रांतिकारी का शहादत दिवस मनाया जाता है।

आइए जानते हैं महान क्रांतिकारी और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी चंद्रशेखर आजाद के जीवन के विषय में-

 पंडित चंद्रशेखर आजाद (Pandit Chandra Shekhar Azad) का जन्म 23 जुलाई सन 1906 में आदिवासी ग्राम भावरा मध्यप्रदेश में हुआ था। उनके पिता पंडित सीताराम तिवारी उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के बदर गांव में रहते थे, लेकिन भीषण अकाल पड़ने के कारण वे ‘ अलीराजपुर रियासत’ के भाबरा में रहने लगे। वर्तमान में भावरा, मध्यप्रदेश के झाबुआ जिले का एक गांव है। चंद्रशेखर जब बड़े हुए तो अपने माता पिता को छोड़कर बनारस जा पहुंचे, जहां उनके फूफा जी, पंडित श्री विनायक मिश्र रहते थे। फूफा जी की मदद से वह संस्कृत विद्यापीठ में भर्ती हो गए और संस्कृत का अध्ययन करने लगे। उन दिनों गांधी जी द्वारा चलाए गए असहयोग आंदोलन की लहर चल रही थी। विदेशी माल बेचने पर रोक लगाने के लिए लोग दुकानों के सामने लेट कर धरना देते थे। जलियांवाला बाग नरसंहार से चंद्रशेखर बहुत व्यथित थे।

पंडित चंद्रशेखर का नाम आजाद क्यों पड़ा ? ( Why was Pandit Chandrashekhar named Azad?)

 महात्मा गांधी द्वारा 1921 में चलाए गए असहयोग आंदोलन में उन्होंने सक्रिय योगदान दिया। इस दौरान धरना देते समय 1 दिन वे पकड़े गए और उन्हें पारसी मजिस्ट्रेट मि. खरेघाट की अदालत में पेश किया गया। मिस्टर खरेघाट कठोर दंड देते थे। उन्होंने बालक चंद्रशेखर से व्यक्तिगत जानकारियों के बारे में पूछना शुरू किया-

 तुम्हारा नाम क्या है?
” मेरा नाम आजाद है”।
तुम्हारे पिता का क्या नाम है?
“मेरे पिता का नाम स्वाधीन है”।
तुम्हारा घर कहां पर है?
” मेरा घर जेल खाना है”।

चंद्रशेखर के इन उत्तरों से मिस्टर खरेघाट चिढ़ गए और चंद्रशेखर को 15 बेतो की सजा सुना दी। मात्र 14 वर्ष की उम्र के चंद्रशेखर की निर्वस्त्र देह पर जल्लाद ने अपनी पूरी शक्ति के साथ बेतो के प्रहार किए। बेत के साथ खाल भी उधर कर बाहर आ जाती, लेकिन पीड़ा सहने का अभ्यास चंद्रशेखर को बचपन से ही था। प्रत्येक बेत के साथ वे ‘ महात्मा गांधी की जय’ और ‘ भारत माता की जय’ बोलते जाते थे। 15 बेते लगने के पश्चात जेलर ने जेल के नियमानुसार उनकी हथेली पर तीन पैसे रख दिए। बालक चंद्रशेखर ने वे पैसे जेलर के मुंह पर फेंक दिया और भाग कर जेल से बाहर आ गए। चंद्रशेखर द्वारा इस अग्निपरीक्षा को सम्मान सहित उत्तीर्ण करने के परिणाम स्वरुप बनारस के ज्ञानवापी मोहल्ले में नागरिक अभिनंदन किया गया और तभी से पंडित चंद्रशेखर को चंद्रशेखर आजाद कहा जाने लगा। चंद्रशेखर का मन अहिंसात्मक उपायों से हटकर देश को स्वतंत्र कराने के लिए सशस्त्र क्रांति की तरफ तरफ मुड़ गया।

काकोरी कांड (Kakori conspiracy)

 उत्तर प्रदेश में लखनऊ के पास स्थित यह स्थान आधुनिक भारत में चर्चा का विषय बना। जब 9 अगस्त 1925 को इस स्थान पर देशभक्तों ने रेल विभाग की ले जाई जा रही संग्रहित धनराशि को लुटा। यह घटना इतिहास में काकोरी षड्यंत्र के नाम से जानी जाती है। इस अभियान के नेता राम प्रसाद बिस्मिल थे। इसमें चंद्रशेखर आजाद भी शामिल थे। उस समय चंद्रशेखर (Pandit Chandra Shekhar Azad) की आयु कम थी और स्वभाव से बहुत चंचल थे। इसीलिए राम प्रसाद बिस्मिल उन्हें क्विक सिल्वर (पारा) कहकर पुकारते थे। काकोरी कांड के पश्चात उसमें शामिल सभी क्रांतिकारी पकड़े गए थे। पर चंद्रशेखर आजाद कभी भी पुलिस के हाथ नहीं आए। काकोरी कांड के बाद उन्होंने दल का नए सिरे से संगठन किया। उसका नाम “हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन एंड आर्मी” रखा गया जिस के कमांडर चंद्रशेखर आजाद थे।

आजाद का झांसी प्रवास

काकोरी कांड में जब क्रांतिकारियों को फांसी की सजा दी जा रही थी और लंबे कारावास की सजा मिल रही थी, उस समय चंद्रशेखर आजाद ने झांसी में अपना अड्डा जमा लिया। झांसी बुंदेलखंड मोटर कंपनी में उन्होंने कुछ दिन मोटर मैकेनिक के रूप में काम किया, मोटर चलाना सीखा और पुलिस अधीक्षक की कार चलाकर उससे मोटर चलाने का लाइसेंस भी ले आए। चंद्रशेखर आजाद झांसी में पुलिस थाने पर जाकर पुलिस वालों से गपशप करते थे लेकिन पुलिस वालों को कभी भी उन पर संदेह नहीं हुआ कि वह व्यक्ति महान क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद हो सकता है।

चंद्रशेखर का ओरछा प्रवास

चंद्रशेखर आजाद (Chandra Shekhar Azad) ने क्रांति सूत्रों को जोड़कर एक सुदृढ़ क्रांतिकारी संगठन बनाया, जिसका नाम था,” हिंदुस्तान समाजवादी प्रजातंत्र सेना” और आजद को उनके साथियों ने इस सेना का ‘ कमांडर ऑफ़ चीफ’ बनाया। भगत सिंह भी उनके क्रांतिकारी साथियों में शामिल हो गए।

हिंदुस्तान समाजवादी प्रजातंत्र सेना

 उत्तर प्रदेश में लखनऊ के पास स्थित यह स्थान आधुनिक भारत में चर्चा का विषय बना। जब 9 अगस्त 1925 को इस स्थान पर देशभक्तों ने रेल विभाग की ले जाई जा रही संग्रहित धनराशि को लुटा। यह घटना इतिहास में काकोरी षड्यंत्र के नाम से जानी जाती है। इस अभियान के नेता राम प्रसाद बिस्मिल थे। इसमें चंद्रशेखर आजाद भी शामिल थे। उस समय चंद्रशेखर की आयु कम थी और स्वभाव से बहुत चंचल थे। इसीलिए राम प्रसाद बिस्मिल उन्हें क्विक सिल्वर (पारा) कहकर पुकारते थे। काकोरी कांड के पश्चात उसमें शामिल सभी क्रांतिकारी पकड़े गए थे। पर चंद्रशेखर आजाद कभी भी पुलिस के हाथ नहीं आए। काकोरी कांड के बाद उन्होंने दल का नए सिरे से संगठन किया। उसका नाम “हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन एंड आर्मी” रखा गया जिस के कमांडर चंद्रशेखर आजाद थे।

साइमन कमीशन का विरोध

साइमन कमीशन की नियुक्ति ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने सर जॉन साइमन के नेतृत्व में की थी। इस कमीशन को इस बात की जांच करनी थी कि  क्या भारत इस लायक हो गया है कि यहां लोगों को संवैधानिक अधिकार दिए जाएं। इस कमीशन में किसी भी भारतीय को शामिल नहीं किया गया, जिस कारण इसका तीव्र विरोध हुआ। जब लाहौर में साइमन कमीशन का विरोध हुआ तो पुलिस ने प्रदर्शन प्रदर्शनकारियों पर बेरहमी से लाठियां बरसाईं। पंजाब के लोकप्रिय नेता लाला लाजपत राय पर इतनी लाठियां बरसाई गई कि कुछ दिन पश्चात ही उनकी मृत्यु हो गई। लाला जी पर लाठियां बरसाने वाले पुलिस अधीक्षक को मृत्युदंड देने की प्रतिज्ञा चंद्रशेखर आजाद भगत सिंह और पार्टी के अन्य सदस्यों ने की।

लाला लाजपत राय की मृत्यु के बदले सांडर्स की हत्या

 चंद्रशेखर आजाद और भगत सिंह समेत अन्य क्रांतिकारियों ने लाला लाजपत राय की मौत का बदला लेने की प्रतिज्ञा ली थी जिसके परिणाम स्वरूप 17 दिसंबर 1928 को शाम के समय पुलिस अधीक्षक के दफ्तर को घेर लिया और ज्योंही जे.पी. सांडर्स अपने अंगरक्षक के साथ निकला राजगुरु ने पहली गोली सांडर्स के मस्तक पर मारी ,जिससे सांडर्स  मोटरसाइकिल से नीचे गिर पड़ा। भगत सिंह ने आगे बढ़कर चार छह गोलियां दाग दीं और उसे बिल्कुल ठंडा कर दिया। सांडर्स के अंगरक्षक द्वारा पीछा किया जाने पर चंद्रशेखर आजाद ने उसे भी गोली मार दी। लाहौर में प्रत्येक जगह पर्चे चिपका दिए गए क्योंकि लाला लाजपत राय की मृत्यु का बदला ले लिया गया था। क्रांतिकारियों के इस कार्य की पूरे भारत में सराहना हुई।

आजाद के नेतृत्व में असेंबली में बम विस्फोट

8 अप्रैल 1929 को चंद्रशेखर आजाद के सफल नेतृत्व में, भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त द्वारा दिल्ली के केंद्रीय असेंबली में बम विस्फोट किया गया। यह विस्फोट अंग्रेज सरकार द्वारा बनाए गए काले कानूनों के विरोध में किया गया था। इसका उद्देश्य किसी को नुकसान पहुंचाना नहीं था।

 

अल्फ्रेड पार्क में चंद्रशेखर आजाद की शहादत

  चंद्रशेखर आजाद कभी भी पुलिस की पकड़ में नहीं आए थे। वह घूम- घूम कर क्रांति प्रयासों को गति देने में लगे हुए थे। अंततः वह दिन भी आया जब चंद्रशेखर आजाद 27 फरवरी 1931 को अल्फ्रेड पार्क में अपने एक साथी सुखदेव राय से मंत्रणा कर रहे थे, तभी उन्हें घेर लिया गया। सीआईडी का एसएसपी नॉट बाबर जीप से वहां आ पहुंचा। उसके पीछे भारी संख्या में कर्नलगंज थाने की पुलिस भी वहां पहुंच गई। चंद्रशेखर ने अपने साथियों को तुरंत वहां से निकल जाने को कहा। नॉट बाबर ने प्रश्न करते हुए कि ‘ तुम कौन हो’ आजाद पर गोली चला दी जो आजाद की जांघ में लगी।आजाद  घिसट कर,  एक जामुन के वृक्ष की वोट लेकर, पुलिस की गोली का जवाब देने लगे। दोनों तरफ से भीषण गोलीबारी हुई। पुलिस की कई गोलियां आजाद के शरीर में समा गई। आखिरकार जब चंद्रशेखर के माउजर में सिर्फ एक आखिरी गोली बची तो उन्होंने सोचा यदि मैने यह गोली चला भी दी तो जीवित गिरफ्तार हो जाने का भय है। अतः आजीवन आजाद रहने की अपनी प्रतिज्ञा को पूरा करते हुए आजाद ने अपने बंदूक की आखिरी गोली स्वयं पर ही चला दी। गोली लगते ही आजाद का प्रणांत  हो गया।

चंद्रशेखर आजाद के शहीद होने का समाचार जब देशभक्तों को मिला तो शमशान घाट से आजाद की अस्थियां लेकर एक जुलूस निकला। इलाहाबाद की मुख्य सड़कें अवरुद्ध हो गई। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो संपूर्ण भारत देश अपने इस वीर सपूत को अंतिम विदाई देने के लिए उमड़ पड़ा है। जुलूस के बाद एक सभा को संबोधित करते हुए सचिंद्र नाथ सान्याल की पत्नी ने कहा-

“जैसे बंगाल में खुदीराम बोस की शहादत के बाद उनकी राख को लोगों ने घर में रख कर सम्मानित किया, वैसे ही आजाद को भी सम्मान मिलेगा”।
देश का एक महान क्रांतिकारी योद्धा, जो मृत्युपर्यंत आजाद रहा, चंद्रशेखर आजाद ने 27 फरवरी 1931 को भारत माता की स्वतंत्रता के लिए स्वयं को बलिदान कर दिया और शहीद हो गए। चंद्रशेखर आजाद को श्रद्धांजलि देते समय महात्मा गांधी ने कहा-
“चंद्रशेखर की मृत्यु से मैं आहत हूं। ऐसे व्यक्ति युग में एक बार ही जन्म लेते हैं। फिर भी हमें अहिंसक रूप से ही विरोध करना चाहिए।”

पंडित जवाहरलाल नेहरू ने कहा- 
“चंद्रशेखर आजाद की शहादत से पूरे देश में आजादी के आंदोलन का नए रूप में शंखनाद होगा। आजाद की शहादत को हिंदुस्तान हमेशा याद रखेगा।”

पंडित मदन मोहन मालवीय ने कहा-

 “पंडित जी की मृत्यु मेरी निजी क्षति है। मैं इससे कभी उबर नहीं सकता।”

 चंद्रशेखर आजाद सदैव सत्य बोलते थे। उन्होंने साहस और बलिदान की नई कहानी लिखी। उनके बलिदान से स्वतंत्रता आंदोलन तेज हो गया। चंद्रशेखर आजाद वेश बदलने में पारंगत थे। इसी कारण ब्रिटिश सरकार की पुलिस कभी उन्हें पकड़ नहीं पाई। यहां तक कि मृत्यु के समय भी चंद्रशेखर आजाद, आजाद ही मरे न की पुलिस की गिरफ्त में आए। उन्होंने स्वयं को गोली मारकर अपने नाम ‘ आजाद’ को सार्थक सिद्ध कर दिया।