Mukhtar Ansari (मुख्तार अंसारी) – एक स्वतंत्रता सेनानी का पोता कैसे बना ‘पूरब का डॉन’

Mukhtar Ansari (मुख्तार अंसारी) – एक स्वतंत्रता सेनानी का पोता कैसे बना ‘पूरब का डॉन’: पूर्वांचल के माफिया डॉन और पूर्व विधायक 61 वर्षीय मुख्तार अंसारी की गुरुवार रात हार्ट अटैक से मौत हो गई। वह 3 साल से बांदा जेल में बंद था और गुरुवार रात को तबीयत बिगड़ने पर बांदा मेडिकल कॉलेज लाया गया था। करीब 3 घंटे इलाज के बाद उसकी मौत की घोषणा की गई।

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Mukhtar Ansari (मुख्तार अंसारी), UP News: पूर्वांचल के माफिया डॉन और पूर्व विधायक 61 वर्षीय मुख्तार अंसारी की गुरुवार रात हार्ट अटैक से मौत हो गई। वह 3 साल से बांदा जेल में बंद था और गुरुवार रात को तबीयत बिगड़ने पर बांदा मेडिकल कॉलेज लाया गया था। करीब 3 घंटे इलाज के बाद उसकी मौत की घोषणा की गई।

Mukhtar Ansari को हार्ट अटैक की सूचना मिलते ही बांदा से लखनऊ तक अलर्ट जारी हो गया। बांदा शहर, जेल और मेडिकल कॉलेज को छावनी में तब्दील कर दिया गया। चुनाव से पहले एरिया डोमिनेशन के लिए बुलाई गई फोर्स को भी मेडिकल कॉलेज के बाहर तैनात कर दिया गया। 18 थानों की फोर्स के अलावा सेंट्रल फोर्स को भी लगाया गया है। दिन रात तक बांदा की डीएम दुर्गा शक्ति नागपाल, एसपी अंकुर अग्रवाल मेडिकल कॉलेज में रहे।

‘पूरब का डॉन’ कहे जाने वाले मुख्तार अंसारी की बांदा जेल में दिल का दौरा पड़ने से मौत हो गई। जेल अधिकारियों ने कहा कि 60 वर्षीय राजनेता की रमजान का उपवास तोड़ने के बाद स्वास्थ्य स्थिति बिगड़ गई। जिसके इशारे पर सरकारें अपना फैसला बदल देती थीं आज वही मुख्तार अंसारी जेल में मौत की नींद सो गया।

मुख्तार अंसारी की पारिवारिक पृष्ठभूमि स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ी हुई है। भारत के स्वतंत्रता संग्राम में उनके परिवार की गहरी जड़ें थीं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि एक स्वतंत्रता सेनानी के घर में जन्म लेकर भी मुख्तार अंसारी कैसे बना माफिया डॉन जिसे ‘ पूरब का डॉन’ भी कहा जाता है। आईए जानते हैं-

Mukhtar Ansari का अपराध की गलियों से राजनीतिक गलियारों तक का सफर विवादास्पद रहा। अंसारी का जन्म 30 जून 1963 को उत्तर प्रदेश के यूसुफपुर में हुआ था। मुख्तार अंसारी का परिवार भारत के स्वतंत्रता आंदोलन और स्वतंत्रता के बाद के राजनीतिक परिदृश्य में अपने योगदान के लिए प्रसिद्ध था।

मुख्तार अंसारी के दादा मुख्तार अहमद अंसारी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में प्रमुख स्थान रखते थे। 1927 में वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष भी रहे। मुख्तार अहमद अंसारी मुस्लिम लीग से भी जुड़े थे। बाद में अलगाववादी एजेंडे के कारण उन्होंने खुद को अलग कर लिया। मुख्तार अहमद अंसारी जामिया मिलिया इस्लामिया के कुलपति के पद पर अपनी मृत्यु पर्यंत बनी रहे।

Mukhtar Ansari के नाना थे ‘महावीर चक्र’ से सम्मानित

मुख्तार अंसारी के मंत्री पक्ष की बात करें तो उसके नाना ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान भारतीय सेना में एक सम्मानित अधिकारी थे। 1948 में पाकिस्तान के साथ संघर्ष के दौरान जम्मू कश्मीर के नौशेरा सेक्टर में सर्वोच्च बलिदान के लिए उन्हें मरणोपरांत ‘महावीर चक्र’ से सम्मानित किया गया था। मुख्तार के पिता सुबहानउल्लाह अंसारी गाजीपुर में अपनी साफ सुथरी छवि के साथ राजनीति में सक्रिय रहे।

एक सम्मानित परिवार पर मुख्तार अंसारी ने कैसे लगाया माफिया का धब्बा

प्रतिष्ठित और ऐतिहासिक पारिवारिक पृष्ठभूमि होने के पश्चात भी मुख्तार अंसारी की राहें अलग हो गई। 1980 के दशक में पूर्वांचल की अराजकता के बीच मुख्तार अंसारी का अपराधिक करियर शुरू हुआ। उस समय पूर्वांचल सरकारी ठेकों के लिए स्पर्धा करने वाले आपराधिक गिरोहों के लिए कुख्यात क्षेत्र था।

गाजीपुर में भूमि विवाद को लेकर सच्चिदानंद राय की हत्या से मुख्तार अंसारी ने गंभीर अपराध की दुनिया में कदम रखा। सच्चिदानंद राय हत्याकांड से मुख्तार अंसारी की एक लंबी और अंधकारमय यात्रा शुरू हुई।

1996 में बीएसपी से टिकट पर मुख्तार पहली बार विधानसभा पहुंका। मुख्तार अंसारी ने 2002, 200,7 2012 और 2017 में भी मऊ से जीत हासिल की। इनमें से आखिरी 3 चुनाव उसने देश की अलग-अलग जेलों में बंद रहते हुए लड़े और जीते थे। राजनीति की आड़ में मुख्तार अंसारी जुर्म की दुनिया में गहरी पैठ बनाने लगा। हर संगठित अपराध में उसकी जड़ें गहरी होती चली गईं।

कृष्णानंद राय हत्याकांड में आया नाम

वर्ष 2002 में एक सियासी अदावत ने मुख्तार अंसारी की जिंदगी को हमेशा के लिए बदल दिया। 2002 में भाजपा विधायक कृष्णानंद राय ने 1985 में अंसारी परिवार के पास रही गाजीपुर की मोहम्मदाबाद विधानसभा सीट छीन ली। कृष्णानंद राय विधायक तो बन गए परंतु वे अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सके। 3 साल बाद ही वर्ष 2005 में उनकी हत्या कर दी गई। एक कार्यक्रम का उद्घाटन करके लौटते समय कृष्णानंद की गाड़ी पर ऐसी सड़क पर हमला हुआ जहां से गाड़ी को दाएं बाएं मोड़ने का कोई रास्ता नहीं था।

हमलावरों ने एक-47 से करीब 500 गोलियां बरसाई। इस हमले में कृष्णानंद राय समेत गाड़ी में मौजूद सभी लोग मारे गए। कृष्णानंद राय की पत्नी अलका राय की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने केस 2013 में गाजीपुर से दिल्ली ट्रांसफर कर दिया लेकिन गवाह मुकर गए और यह केस परिणाम तक नहीं पहुंच पाया। गवाहों की कमी के कारण मुख्तार अंसारी जेल से छूट गया। जेल में रहते हुए भी मुखर हमेशा सक्रिय रहता था।

प्रदेश के पूर्वांचल में मुख्तार का रसूख इस कदर प्रभावी था कि वह करीब एक दर्जन विधानसभा सीटों पर प्रभाव रखता था।

मऊ दंगे के बाद गया जेल

मऊ में अपनी राजनीतिक जमीन तैयार करने के बाद मुख्तार अपना वर्चस्व फैलाने के लिए कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। वर्ष 2005 में हुए दंगे के बाद पूरा देश सुर्खियों में आ गया था। इसी मामले में मुख्तार जेल की सलाखों में पहुंचा। इसके बाद फिर कभी बाहर नहीं निकला। केवल दो बार ही पैरोल लेकर बाहर आया था। 2005 में रामलीला मैदान में लाउडस्पीकर को तोड़कर फेंकने को लेकर बवाल हुआ। इसमें दोनों समुदायों के लोग आमने-सामने हो गए थे। इसी समय मुख्तार अंसारी भी शहर में मौजूद था। जैसे ही मामले को लेकर मुख्तार अपनी खुली जीप में शहर में निकला, दंगा और भड़क गया। इसी के बाद मुख्तार को जेल भेज दिया गया था।

योगी सरकार में शुरू हुए बुरे दिन

माफिया डॉन मुख्तार अंसारी के बुरे दिन योगी सरकार के आने के बाद शुरू हो गए थे। उत्तर प्रदेश में मुख्तार अंसारी पर 52 केस दर्ज हैं। जिसमें 15 केस में मुख्तार को सजा दिलाने की यूपी सरकार की कोशिश थी। मुख्तार के गैंग की सैकड़ो करोड़ों की संपत्ति या तो जब्त हो चुकी थी या ध्वस्त। मुख्तार गैंग के अब तक करीब 1000 अभियुक्त गिरफ्तार किये जा चुके हैं। मुख्तार अंसारीका राजनीतिक कार्यकाल सांप्रदायिक हिंसा भड़काने और व्यक्तिगत लाभ के लिए धार्मिक भावनाओं का शोषण करने के आरोपों से भी घिरा रहा मुख्तार अंसारी के खिलाफ 61 केस दर्ज हैं।इनमें हत्या हत्या के प्रयास, अपहरण, धोखाधड़ी, गुंडा एक्ट, गैंगस्टर एक्ट, आर्म्स एक्ट, सीएलए एक्ट से लेकर एनएसए तक शामिल हैं।कई मामलों में अंसारी को सजा भी हो चुकी थी।

डेढ़ साल में दूसरी बार मिली थी उम्र कैद की सजा

सत्ता संभालते ही अपराधियों के प्रति जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाने के योगी सरकार के फैसले से ही माफिया डॉन मुख्तार अंसारी के बुरे दिनों की शुरुआत हो गई थी। साल 2017 में वह एक बार जेल गया तो फिर बाहर नहीं आ पाया। बांदा जेल में बंद रहे मुख्तार को पिछले 18 महीने में आठ मुकदमों में दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई गई थी। इनमें से दो मुकदमों में तो उसे उम्र कैद की सजा मिली थी।