World Leprosy Day 2023 : विश्व कुष्ठ रोग निवारण दिवस कब और क्यों मनाया जाता है ?

World Leprosy Day 2023 || Leprosy Day || विश्व कुष्ठ दिवस || विश्व कुष्ठ रोग निवारण दिवस
भारत में प्रत्येक वर्ष महात्मा गांधी की पुण्यतिथि 30 जनवरी को कुष्ठ रोग निवारण दिवस मनाया जाता है। यह दिवस रोग उन्मूलन और रोग निवारण के लिए प्रयासों को बढ़ाने के लिए मनाया जाता है। यह बच्चों में कुष्ठ रोग से संबंधित विकलांगों के शून्य मामले के लक्ष्य पर केंद्रित है। कुष्ठ निवारण के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए रोग का जल्दी पता लगाने के साथ-साथ इस रोग को फैलने से रोकने के लिए प्रयास करना अति महत्वपूर्ण है। कुष्ठ रोग के अधिकतर रोगी ब्राजील, भारत और इंडोनेशिया में है। कुष्ठ रोग का उपचार संभव है यदि शुरुआत में ही उपचार प्रारंभ हो जाए तो विकलांगता से बचा जा सकता है।

World Leprosy Day 2023

World Leprosy Day 2023 || Leprosy Day || विश्व कुष्ठ दिवस || विश्व कुष्ठ रोग निवारण दिवस || कुष्ठ रोग

विश्व कुष्ठ रोग निवारण दिवस कब और क्यों मनाया जाता है ?

भारत में प्रत्येक वर्ष महात्मा गांधी की पुण्यतिथि 30 जनवरी को कुष्ठ रोग निवारण दिवस मनाया जाता है। यह दिवस रोग उन्मूलन और रोग निवारण के लिए प्रयासों को बढ़ाने के लिए मनाया जाता है। यह बच्चों में कुष्ठ रोग से संबंधित विकलांगों के शून्य मामले के लक्ष्य पर केंद्रित है। कुष्ठ निवारण के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए रोग का जल्दी पता लगाने के साथ-साथ इस रोग को फैलने से रोकने के लिए प्रयास करना अति महत्वपूर्ण है। कुष्ठ रोग के अधिकतर रोगी ब्राजील, भारत और इंडोनेशिया में है। कुष्ठ रोग का उपचार संभव है यदि शुरुआत में ही उपचार प्रारंभ हो जाए तो विकलांगता से बचा जा सकता है।

विश्व कुष्ठ रोग निवारण दिवस की शुरुआत किसने की ?

कुष्ठ रोग निवारण दिवस को मनाने की शुरुआत फ्रांसीसी लेखक और परोपकारी राउल फोलेरो द्वारा 1954 में की गई। महात्मा गांधी को श्रद्धांजलि देने के लिए उनकी पुण्यतिथि 30 जनवरी के दिन का चयन उन्होंने किया था उन्होंने। अपने जीवन काल में महात्मा गांधी ने कुष्ठ रोगियों की मदद के लिए अथक प्रयत्न किए थे। राउल फोलेरो महात्मा गांधी से बहुत प्रभावित थे। इसलिए उन्होंने 30 जनवरी को कुष्ठ रोग निवारण दिवस के रूप में मनाने की शुरुआत की।

क्या है कुष्ठ रोग ?

कुष्ठ रोग को “हैनसेन” नाम से भी जाना जाता है। इसका नाम नार्वेजियन चिकित्सक गेरहार्ड हेनरिक आर्मोर हैनसेन के नाम पर रखा गया है। हैनसेन ने इसकी खोज 1873 में की थी। उन्होंने समाज में प्रचलित इस धारणा को खारिज कर दिया था कि कुष्ठ रोग एक वंशानुगत बीमारी है। कोढ़ को ही कुष्ठ रोग कहा जाता है। यह एक जीवाणु रोग है।यह दीर्घकालिक रोग माइकोबैक्टेरियम लेप्राइ और माइकोबैक्टेरियम लेप्रोमेटोसिस जैसे जीवाणुओं की वजह से होता है।
इस रोग का जिक्र भारतीय ग्रंथों में भी मिलता है। भारतीय ग्रंथों में 600 ईसापूर्व इस रोग का उल्लेख मिलता है। यह रोग मुख्य रूप से मानव त्वचा, परिधीय तंत्रिकाओं, ऊपरी स्वसन पथ की श्लेष्मिका, आंखों और शरीर के कुछ अन्य भागों को प्रभावित करता है। कुछ लोगों में यह भ्रांति है कि यह रोग वंशानुगत और दैवीय प्रकोप से होता है जबकि ऐसा कुछ भी नहीं है। यह रोग जीवाणु द्वारा होता है।
यह रोग भारत सहित अन्य पिछड़े हुए देशों के लिए एक गंभीर समस्या है। यह रोग लोगों को दिव्यांग बना देता है। पश्चिमी देशों में इसका अधिक प्रभाव नहीं है या ना के बराबर है। भारत में भी इसे काफी हद तक नियंत्रित किया जा चुका है।

कुष्ठ रोग निवारण में महात्मा गांधी का योगदान

महात्मा गांधी कुष्ठ रोग से पीड़ित व्यक्तियों से काफी स्नेह और सहानुभूति रखते थे क्योंकि इस रोग के सामाजिक आयाम से वे परिचित थे। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने कुष्ठ रोगियों की बहुत सेवा की और उन्हें समाज की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए अथक प्रयास किया।
आज यदि कुष्ठ रोगियों को सामाजिक बहिष्कार का सामना नहीं करना पड़ता तो वह गांधी जी के प्रयासों से ही संभव हो पाया है। आज समाज में लोग यह समझ चुके हैं कि कुष्ठ रोग दैवी आपदा नहीं अपितु एक बीमारी है जो किसी को भी हो सकती है
इस रोग का इलाज अब संभव है। गांधी जी द्वारा कुष्ठ रोगियों को समाज की मुख्यधारा से जोड़ने की वजह से ही 30 जनवरी को उनकी पुण्यतिथि के अवसर पर कुष्ठ रोग निवारण दिवस मनाया जाता है।

कुष्ठ रोग के संकेत व लक्षण

कुष्ठ रोग में त्वचा पर घाव हो जाता है। सही समय पर इसका उपचार नहीं होने पर यह पूरे शरीर में फैल सकता है। कुष्ठ रोग के पूरे शरीर में फैल जाने पर शरीर की त्वचा, आंखों, नसों और हाथ- पैरों सहित शरीर के कई भागों को क्षति पहुंचा सकता है। कुष्ठ रोग में त्वचा पर रंगहीन दाग हो जाते हैं। इन अंगों पर किसी भी चुभन का रोगी को कोई असर नहीं होता है। इस रोग के कारण शरीर के कई भाग सुन्न भी हो जाते हैं। कुष्ठ रोग से त्वचा के रंग और स्वरूप में परिवर्तन दिखाई देने लगता है।

कुष्ठ रोग का उपचार

यदि सही इलाज किया जाए तो रोगी कुष्ठ रोग से मुक्त होकर सामान्य जिंदगी जी सकता है। आज आधुनिक चिकित्सा प्रणाली इतनी आगे जा चुकी है कि कुष्ठ रोग का इलाज कई वर्ष पूर्व ही संभव हो गया था। वर्तमान में कुष्ठ रोग का उपचार 2 तरीके से होता है । पासी बैसिलरी कुष्ठ रोग का उपचार 6माह तक राईफैपिसिन और डैप्सोन से किया जाता है। जबकि मल्टी बैसिलिरी कुष्ठ रोग का इलाज क्लाफैजिमाईन, राईफैपिसिन और डैप्सन से किया जाता। है भारत में राष्ट्रीय जालमा कुष्ठ और अन्य माइकोबैक्टीरियल रोग संस्थान है जिसका कुष्ठ रोग निवारण के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान है।

रोकथाम

बीसीजी का टीका लगाने से कुष्ठ रोग से बचा जा सकता है।
मल्टी ड्रग थेरेपी की कुष्ठ रोग निवारण की रोकथाम में महत्वपूर्ण भूमिका है। कुष्ठ रोग का पता चलने पर उसका पूरा इलाज कराना चाहिए।इसे बीच में नहीं छोड़ना चाहिए। कुष्ठ रोग से संक्रामक रोग का उपचार शुरू होते ही कुछ ही दिनों में उसकी संक्रामकता खत्म हो जाती है
कुष्ठरोग से ज्यादातर मामले असंक्रामक होते हैं।
कुष्ठ रोग से संबंधित भ्रांतियां
कुष्ठ रोग को कुछ लोग वंशानुगत मानते हैं जबकि यह रोग वंशानुगतनहीं है।
कुछ लोग कुष्ठ रोग को संक्रामक मानते हैं लेकिन यह एक बहुत बड़ी भ्रांति है। अनुसंधान में यह पाया गया है कि 80% लोगों में कुष्ठ रोग असंक्रामक होता है।
कुछ लोग कुष्ठ रोग को दैवी प्रकोप, अशुद्ध रक्त, अनैतिक आचरण, पूर्व जन्म के पाप कर्म आदि कारणों से उत्पन्न मानते हैं लेकिन यह भी एक भ्रांति है यह एक जीवाणु रोग है।

कुछ लोग इसे एक लाइलाज बीमारी मानते हैं, लेकिन यह धारणा गलत है। कुष्ठ रोग का इलाज संभव है।