भारत की राजनीति को नई दिशा देने वाले लाल कृष्ण आडवाणी ‘भारत रत्न’ से सम्मानित (Lal Krishna Advani awarded by Bharat Ratna)

भारत की राजनीति को नई दिशा देने वाले लाल कृष्ण आडवाणी 'भारत रत्न' से सम्मानित (Lal Krishna Advani awarded by Bharat Ratna)

केंद्र की मोदी सरकार ने भाजपा के कद्दावर नेता और राम मंदिर आंदोलन में महत्वपूर्ण महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले लालकृष्ण आडवाणी (Lal Krishna Advani) को भारत रत्न देने का ऐलान किया है। लालकृष्ण आडवाणी को राम मंदिर आंदोलन को गति प्रदान करने का श्रेय जाता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने सोशल मीडिया हैंडल एक्स पर कहा है कि-

“श्री लालकृष्ण को ‘भारत रत्न’ दिया जाएगा। भारत के विकास में उनका योगदान बहुमूल्य है। उन्होंने देश में जमीन पर काम करके सेवा की और देश के उप प्रधानमंत्री बने। उन्होंने गृह मंत्री और सूचना प्रसारण मंत्री के तौर पर देश की सेवा की। उनके संसदीय योगदान को हमेशा याद किया जाएगा। आडवाणी जी ने दशकों तक देश की सेवा की। एकता, पारदर्शिता और राजनीतिक नैतिकता के मामले में उन्होंने उदाहरण प्रस्तुत किया। उन्हें भारत रत्न दिया जाना एक बेहद भावुक पल है। मैं अपने आप को सौभाग्यशाली मानता हूं कि मुझे उनके सान्निध्य में काम करने का मौका मिला। मैंने उनसे बहुत कुछ सीखा है।”

लाल कृष्ण आडवाणी(Lal Krishna Advani)को 2015 में भारत के दूसरे बड़े नागरिक सम्मान ‘पद्म विभूषण’ से सम्मानित किया गया था। लालकृष्ण आडवाणी को व्यापक रूप से महान बौद्धिक क्षमता, मजबूत सिद्धांतों और एक मजबूत एवं समृद्ध भारत के विचार के प्रति अटूट समर्थन वाले व्यक्ति के रूप में माना जाता है।लालकृष्ण आडवाणी अपने स्पष्ट और दृढ़ रूख के लिए जाने जाते हैं। 1980 में जनता पार्टी में दोहरी सदस्यता का मुद्दा उठाने पर जनसंघ धड़े से अलग होकर भाजपा का गठन करने और 2001 में आगरा में पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ के साथ शिखर वार्ता से मुशर्रफ को खाली हाथ भेजने में आडवाणी की अहम भूमिका रही थी। वह अपने से ज्यादा पार्टी एवं देश की सोच को आगे रखते थे। लेकिन क्या आप जानते हैं कि राष्ट्र के प्रति समर्पित लाल कृष्ण आडवाणी कौन थे? आइए जानते-

जन्म

लालकृष्ण आडवाणी (Lal Krishna Advani)का जन्म पाकिस्तान के कराची में 8 नवंबर 1927 को हुआ था। उनके पिता का नाम किशनचंद आडवाणी और माता का नाम ज्ञानी आडवाणी था। विभाजन से पूर्व वे सिंध में पले बढ़े। कराची सेंट पैट्रिक स्कूल में एक छात्र के रूप में उनके देशभक्ति पूर्ण आदर्श ने उन्हें मात्र 14 वर्ष की आयु में आरएसएस में शामिल होने के लिए प्रेरित किया और तभी उन्होंने अपना जीवन देश सेवा में समर्पित कर दिया।

आडवाणी जी की शिक्षा

लाल कृष्ण आडवाणी ने सेंट पैट्रिक स्कूल कराची से स्कूली शिक्षा प्राप्त की। 1942 में स्वयं सेवक के रूप में आरएसएस में शामिल हुए। डी.जी. नेशनल कॉलेज हैदराबाद से स्नातक इसके बाद गवर्नमेंट लॉ कॉलेज मुंबई से विधि स्नातक की पढ़ाई की। कराची के मॉडल हाई स्कूल में शिक्षक के रूप में नौकरी की

1947 में सिंध से दिल्ली आए

1947 में जब भारत आजाद हुआ उस समय देश में तो जश्न का माहौल था लेकिन आडवाणी के लिए यह जश्न अल्पकालिक था, क्योंकि वह भारत के विभाजन की त्रासदी के आतंक और रक्तपात के बीच अपनी मातृ भूमि से अलग होने वाले लाखों लोगों में से एक थे। बंटवारे का दंश लिए करीब 20 साल का यह नौजवान कराची से दिल्ली आया और भारत की राजनीति को नई दिशा देने वाला सारथी बन गया। लालकृष्ण आडवाणी को इस घटना ने एक धर्मनिरपेक्ष भारत बनाने की इच्छा से प्रेरित किया।

आडवाणी जी का पारिवारिक जीवन

लाल कृष्ण आडवाणी का विवाह कमला आडवाणी से 25 फरवरी 1965 में हुआ। आडवाणी जी के दो बच्चे हैं। एक पुत्र जिसका नाम जयंत है और वो दिल्ली में अपना कारोबार चलाते हैं। और दूसरी संतान प्रतिभा आडवाणी है जो प्रसिद्ध टीवी व्यक्तित्व हैं। प्रतिभा कई चैनलों पर प्रसारित किए जाने वाले कार्यक्रमों की एंकरिंग तथा प्रस्तुति करती हैं।

संघ प्रचारक के रूप में लाल कृष्ण आडवाणी

भारत की स्वतंत्रता और विभाजन के बाद लाखों लोगों की तरह लाल कृष्ण आडवाणी भी 12 सितंबर 1947 को साथी आरएसएस स्वयंसेवकों के साथ आश्रय की तलाश में और एक विभाजित भारत में एक नई शुरुआत करने के लिए दिल्ली रवाना हुए। कराची से दिल्ली तक कि उनकी यात्रा ने सिंध में उनके जीवन के एक प्रारंभिक चरण को अचानक समाप्त कर दिया और इस तरह उनके जीवन का अगला चरण राजस्थान में आरएसएस प्रचारक के रूप में शुरू हुआ।

आरएसएस नेताओं ने पाकिस्तान से आए स्वयं सेवकों को निर्देश दिया कि उनका मुख्य कार्य शरणार्थियों के प्रवास को सुचारू और व्यवस्थित करने में मदद करना है। 1947 के उत्तरार्ध में आडवाणी ने स्वयं को इस कार्य में पूरी तरह से समर्पित कर दिया। जोधपुर शिविर समाप्त होने के बाद उन्हें आरएसएस की गतिविधियों को जारी रखने के लिए राजस्थान के विभिन्न हिस्सों में भेजा गया। राजस्थान उनकी पहली कर्मभूमि रही।

आडवाणी जी का राजनीतिक जीवन

1957 में लालकृष्ण आडवाणी को अटल बिहारी वाजपेयी और जनसंघ के सांसदों की सहायता के लिए राजस्थान से दिल्ली स्थानांतरित किया गया और दिल्ली उनकी राजनीतिक गतिविधियों का केंद्र बन गया।

गठबंधन की राजनीति में पहला कदम

गठबंधन की राजनीति में आडवाणी ने दिल्ली के नगर पालिका चुनाव में पहली बार कदम बढ़ाया जब उन्हें जनसंघ की दिल्ली इकाई की देखभाल महासचिव के रूप में करने के लिए कहा गया था। कांग्रेस से मुकाबले में 80 सीटों के सदन में जनसंघ ने 25 सीटें जीती जो कांग्रेस से केवल दो कम थी। सीपीआई 8 सदस्य थे। पहले तो सीपीआई ने जनसंघ को बाहर रखने के लिए कांग्रेस से गठबंधन किया लेकिन यह गठबंधन 1 साल के भीतर टूट गया। इसके बाद जनसंघ और सीपीआई ने एक लिखित समझौता किया जिसके तहत मेयर और डिप्टी मेयर का पद दोनों पार्टियों द्वारा बारी-बारी से साझा किया जाएगा। लालकृष्ण आडवाणी के लिए यह राजनीतिक नेतृत्व और रणनीति बनाने की कला में एक उपयोगी शुरुआत थी। आडवाणी ने कहा कि-

“मैं विश्वास के साथ कह सकता हूं कि यहीं से मुझे गठबंधन की राजनीति में शुरुआती आधार मिला।”

राज्यसभा के सदस्य बने

लाल कृष्ण आडवाणी 1970 में राज्यसभा के सदस्य बने और 1989 तक इस पद पर बने रहे। राज्यसभा में अपने शुरुआती भाषणों में श्री लाल कृष्ण आडवाणी ने महत्वपूर्ण मुद्दों पर अपने विचार व्यक्त किया जिनमें-

  • देश की एकता और अखंडता को मजबूत करना,
  • हमारी लोकतांत्रिक संस्थाओं की सुरक्षा करना और उन्हें अधिक प्रभावी बनाना,
  • सत्तारूढ़ दल को विपक्ष की आवाज का सम्मान करना कैसे सीखना चाहिए और,
  • केंद्र राज्य संबंधों को सहज और सामंजस्य से पूर्ण कैसे बनाया जाए, प्रमुख मुद्दे थे।

जनसंघ के अध्यक्ष के रूप में आडवाणी जी

फरवरी 1968 में अटल बिहारी वाजपेयी पार्टी अध्यक्ष बने थे। लेकिन 1971 के आम चुनाव के बाद वे जनसंघ का अध्यक्ष पद छोड़ना चाहते थे, क्योंकि वे दूसरों को मौका देना चाहते थे। अतः 1972 में अटल बिहारी बाजपेयी ने लालकृष्ण आडवाणी को पार्टी अध्यक्ष बनने के लिए कहा। लेकिन आडवाणी खुद को महान वक्ता नहीं मानते थे और सार्वजनिक बैठकों में बोलने से घबरा जाते थे। अत: वे अध्यक्ष नहीं बनना चाहते थे। बाद में अटल बिहारी वाजपेयी के आग्रह के बाद लालकृष्ण आडवाणी ने सहमत होकर 1972 में भारतीय जनसंघ का अध्यक्ष पद औपचारिक रूप से ग्रहण किया।

मोरारजी देसाई की सरकार में बने सूचना एवं प्रसारण मंत्री

1973 से 1977 तक उन्होंने पार्टी की अध्यक्षता की। 24 मार्च 1976 को जब मोरारजी देसाई भारत के पांचवें प्रधानमंत्री बने। तब लालकृष्ण आडवाणी पूर्ववर्ती जनसंघ के उन तीन व्यक्तियों में से एक थे जो नई सरकार में शामिल हुए।अटल बिहारी वाजपेई को विदेश मंत्री और बृजलाल वर्मा को उद्योग विभाग दिया गया। प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने जब लालकृष्ण आडवाणी से पूछा कि उन्हें कौन सा विभाग चाहिए तो उन्होंने बिना किसी हिचकिचाहट के कहा कि उन्हें सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय चाहिए।

सूचना एवं प्रसारण मंत्री के रूप में उनका पहला काम आपातकाल के दौरान जनसंचार माध्यमों के दुरुपयोग पर संसद में एक श्वेत पत्र प्रस्तुत करना था। उन्होंने तुरंत अपने मंत्रालय के पूर्व सचिव की अध्यक्षता में एक विशेष समिति नियुक्त की, जिसने रिकॉर्ड समय में अपना कार्य पूरा किया और अगस्त 1977 में उन्होंने संसद में श्वेत पत्र प्रस्तुत किया।

सूचना एवं प्रसारण मंत्री रहते हुए उन्होंने राज्यसभा में आकाशवाणी और दूरदर्शन को स्वायत्तता देने की मांग उठाई और संसद के भीतर और बाहर दोनों जगह एक गंभीर बहस शुरू की।

1977 में उन्होंने संसद में प्रसार भारतीय (भारतीय प्रसारण निगम) विधेयक पेश किया। लेकिन कांग्रेस का सदन में बहुमत होने के कारण यह विधेयक राज्यसभा में पास नहीं हो सका।

भारतीय जनता पार्टी का गठन

मोरारजी देसाई सरकार के पतन के फल स्वरुप भारतीय जनसंघ का विभाजन हो गया। भारतीय जनसंघ ने आडवाणी और अटल के नेतृत्व में 1980 में एक राजनीतिक पार्टी ‘भारतीय जनता पार्टी’ का गठन किया। शुरुआत में तो भारतीय जनता पार्टी को नाम मात्र का जन समर्थन मिला और 1984 के संसदीय चुनाव चुनाव में यह लोकसभा की सिर्फ दो सीटें जीत पाई लेकिन आडवाणी जी ने पार्टी को लोकप्रिय बनाने तथा जनता को इसके उद्देश्य से अवगत कराने के लिए 1990 के दशक में कई रथ यात्राएं की। इनमें पहली यात्रा भगवान श्री राम पर केंद्रित थी

राम रथ यात्रा 1990 में जब देश को सबसे गंभीर संकटों में से एक का सामना करना पड़ा। एक तरफ जातिवादी ताकतों ने हमारे सामाजिक ताने-बाने को तोड़ने की धमकी दी दूसरी तरफ छद्म धर्मनिरपेक्षता वादियों की प्रतिस्पर्धी सांप्रदायिकता ने एक कई दरारें पैदा कर दी। उस समय जवाबी हमले का नेतृत्व करने के लिए लालकृष्ण आडवाणी आगे बढ़े। पहली बार एक प्राचीन परंपरा जनमत जताने का माध्यम बनी।

राम रथ यात्रा

लालकृष्ण आडवाणी ने अपने प्रसिद्ध रामरथ यात्रा की शुरुआत 25 सितंबर 1990 को सोमनाथ से की। आडवाणी की राम रथ यात्रा के सारथी बने वर्तमान प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी।इस यात्रा के माध्यम से भाजपा ने उन लोगों तक अपना संदेश पहुंचाया जो लोकतंत्र में अंतिम मध्यस्थ हैं। इस यात्रा का अंतिम लक्ष्य एक राष्ट्र मंदिर था जो ईंटों और गारे से नहीं बल्कि देशभक्ति के उत्साह और राष्ट्रवादी उत्साह से बनाया गया था। इस यात्रा को अभूतपूर्व सफलता मिली। इस यात्रा ने जनता द्वारा दर्शाई गई ‘लोकशक्ति’ और दिल्ली शासको द्वारा प्रस्तुत ‘राजशक्ति’ के बीच तुलना की और लोगों का ध्यान आकृष्ट किया।

जनादेश यात्रा

आडवाणी ने पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के नेतृत्व में देश की चारों दिशाओं से यात्रा आरंभ करने की योजना बनाई। यह चारों यात्रायें 11 सितंबर 1993 को स्वामी विवेकानंद के जन्मदिन से देश की चारों दिशाओं से आरंभ हुई। लालकृष्ण आडवाणी ने मैसूर से, भैरो सिंह शेखावत ने जम्मू से, मुरली मनोहर जोशी ने पोरबंदर से और कल्याण सिंह ने कोलकाता से यह यात्रा प्रारंभ की। जनादेश यात्रा को जबरदस्त सफलता मिली। इसके अतिरिक्त आडवाणी जी ने भारत सुरक्षा यात्रा, स्वर्ण जयंती यात्रा,,और भारत उदय यात्रा भी निकाली।

गृह मंत्री के रूप में लाल कृष्ण

1996 के आम चुनाव के बाद जब बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी तो राष्ट्रपति द्वारा सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया गया। उस समय अटल जी ने प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली। लेकिन यह सरकार केवल 13 दिनों तक ही चल सकी। 1999 में एक बार फिर से अटल बिहारी वाजपेई की सरकार बनी जिसने 5 वर्ष का कार्यकाल पूरा किया। एनडीए की इस पूर्णकालिक सरकार में आडवाणीजी ने गृह मंत्री का पद संभाला और बाद में वे उप प्रधानमंत्री बनाए गए। लालकृष्ण आडवाणीजी ने उस कठिन समय का साहसपूर्वक सामना किया जब भारत कथित तौर पर पाकिस्तान द्वारा समर्थित विद्रोही हमले के रूप में आंतरिक अशांति का सामना कर रहा था। 2004 से 2009 तक लालकृष्ण आडवाणी विपक्ष के नेता रहे।

पीएम पद के उम्मीदवार बने

2009 के चुनाव से पहले संसदीय लोकतंत्र में विपक्ष का नेता होने के नाते आडवाणी जी को 16 मई 2009 को समाप्त होने वाले आम चुनावों के लिए भाजपा के प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया गया क्योंकि अटल बिहारी वाजपेयी के बाद आडवाणी भाजपा में सबसे शक्तिशाली नेता रहे। लेकिन 2009 में कांग्रेस और उसके सहयोगियों ने जीत हासिल की। 2013 में आडवाणीजी ने अपने सभी पदों से इस्तीफा दे दिया।

भारतीय जनता पार्टी को भारतीय राजनीति में एक प्रमुख पार्टी बनाने में आडवाणी जी का योगदान सर्वोपरि कहा जा सकता है। 1980 के दशक के आरंभ में भारत के राजनीतिक मानचित्र पर वस्तुतः अस्तित्वहीन भारतीय जनता पार्टी आडवाणी के प्रयासों से भारत की सबसे मजबूत राजनीतिक शक्ति के रूप में उभरी है।