Pandit Deendayal Upadhyaya Jayanti 2023 : ‘भारतीय जनसंघ’ के संस्थापक पंडित दीनदयाल उपाध्याय जयंती पर विशेष

पंडित दीनदयाल उपाध्याय जयंती (Birth Anniversary of Pt. Deendayal Upadhyaya) 25 सितंबर,2023 : पंडित दीनदयाल उपाध्याय एक ऐसे नेता थे जिन्होंने जीवन पर्यंत अपनी व्यक्तिगत ईमानदारी और सत्यनिष्ठा को महत्व दिया। दीनदयाल उपाध्याय एक प्रखर विचारक, उत्कृष्ट संगठनकर्ता थे। उन्होंने ही भारतीय जनसंघ की नींव डाली थी। मजहब और संप्रदाय के आधार पर भारतीय संस्कृति का विभाजन करने वालों को पंडित दीनदयाल उपाध्यायजी देश के विभाजन का जिम्मेदार मानते थे। हिंदू राष्ट्रवादी होने के साथ ही पंडित दीनदयाल उपाध्याय भारतीय राजनीति के पुरोधा भी थे। भारतीय जनता पार्टी के लिए पंडित जी वैचारिक मार्गदर्शन और नैतिक प्रेरणा के स्रोत रहे हैं।

Birth Anniversary of Pt. Deendayal Upadhyaya jayanti 2023_पंडित दीनदयाल उपाध्याय जयंती

पंडित दीनदयाल उपाध्याय जयंती (Birth Anniversary of Pt. Deendayal Upadhyaya) 25 सितंबर,2023

Pandit Deendayal Upadhyaya Jayanti 2023 : पंडित दीनदयाल उपाध्याय एक ऐसे नेता थे जिन्होंने जीवन पर्यंत अपनी व्यक्तिगत ईमानदारी और सत्यनिष्ठा को महत्व दिया। दीनदयाल उपाध्याय एक प्रखर विचारक, उत्कृष्ट संगठनकर्ता थे। उन्होंने ही भारतीय जनसंघ की नींव डाली थी। मजहब और संप्रदाय के आधार पर भारतीय संस्कृति का विभाजन करने वालों को पंडित दीनदयाल उपाध्यायजी देश के विभाजन का जिम्मेदार मानते थे। हिंदू राष्ट्रवादी होने के साथ ही पंडित दीनदयाल उपाध्याय भारतीय राजनीति के पुरोधा भी थे। भारतीय जनता पार्टी के लिए पंडित जी वैचारिक मार्गदर्शन और नैतिक प्रेरणा के स्रोत रहे हैं।

‘एकात्म मानववाद’ और ‘अंत्योदय’ के जिस दर्शन को भाजपा अपनाए हुए हैं उसके प्रणेता दीनदयाल उपाध्यायजी थे। आइए जानते हैं पंडित दीनदयाल उपाध्याय की जयंती पर उनके जीवन के विषय में- 

 

पंडित दीनदयाल उपाध्याय का जीवन परिचय (Biography of Pandit Deendayal Upadhyay)

पंडित दीनदयाल उपाध्याय (Pandit Deendayal Upadhyaya) का जन्म ब्रज के पवित्र क्षेत्र मथुरा जिले के छोटे गांव नगला चंद्रभान में 25 सितंबर 1916 को हुआ था। पंडित दीनदयाल के पिता रेलवे में नौकरी करते थे। अतः उनका अधिकतर समय बाहर बीतता था। कुछ समय बाद दीनदयाल के भाई शिवदयाल का जन्म हुआ। इनके पिताजी ने अपनी पत्नी और बच्चों को मायके भेज दिया। पंडित दीनदयाल के मामा का परिवार बहुत बड़ा था। ममेरे भाइयों के साथ ही उनका बचपन बीता। लेकिन मात्र 3 वर्ष की अवस्था में दीनदयाल पिता के प्रेम से वंचित हो गए। और 7 वर्ष की कोमल अवस्था में ही 8 अगस्त सन 1924 को उनकी माता का क्षय रोग के कारण निधन हो गया। 7 वर्ष की उम्र में माता-पिता के प्रेम से वंचित पंडित दीनदयाल के भाई का भी 1934 में देहांत हो गया।

पंडित दीनदयाल उपाध्याय की शिक्षा (Education of Pandit Deendayal Upadhyay)

पंडित दीनदयाल उपाध्याय की प्रारंभिक शिक्षा बड़े कठिनाइयां से पूरी हुई। पंडित जी के पास पढ़ने के लिए पुस्तक नहीं थी। उनके मामा का लड़का भी उनके साथ पढ़ता था। जब उनके मामा का लड़का सो जाता था तब वह उसकी किताबों से पढ़ते थे। हाई स्कूल की परीक्षा के कुछ माह पूर्व वह बीमार पड़ गए थे। इसके बावजूद उन्होंने न सिर्फ प्रथम श्रेणी में परीक्षा उत्तीर्ण की बल्कि कई रिकॉर्ड भी बनाया।उन्होंने हाई स्कूल की शिक्षा वर्तमान राजस्थान के सीकर से प्राप्त की। पढ़ाई में उत्कृष्ट होने के कारण सीकर के तत्कालीन नरेश ने बालक दीनदयाल को स्वर्ण पदक किताबों के लिए 250 रुपए और ₹10 की मासिक छात्रवृत्ति से पुरस्कृत किया।
इसके बाद दीनदयाल कॉलेज की पढ़ाई के लिए पिलानी चले गए
वहां सभी अध्यापक इनके विनम्र स्वभाव लगन और प्रखर बुद्धि से बड़े प्रभावित थे। सन 1937 में इंटर की परीक्षा में भी दीनदयाल ने सर्वाधिक अंक प्राप्त किया। बिड़ला कॉलेज में इससे पहले इतने अंक किसी छात्र ने नहीं प्राप्त किए थे। इस सूचना पर घनश्याम दास बिड़ला बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने दीनदयाल जी को स्वर्ण पदक प्रदान किया। बिड़ला जी ने दीनदयाल जी को अपने संस्था में नौकरी देने की बात कही तो पंडित जी ने बड़े विनम्रता से उनका धन्यवाद किया और आगे पढ़ने की इच्छा व्यक्त की। बिड़लाजी दीनदयाल जी के उत्तर से बहुत प्रसन्न हुए और कहा यह अच्छी बात है कि तुम आगे की पढ़ाई करना चाहते हो लेकिन तुम्हारे लिए मेरी संस्था में एक नौकरी हमेशा खाली रहेगी, जब चाहो आ सकते हो और उन्होंने दीनदयाल जी को छात्रवृत्ति प्रदान की

कॉलेज की शिक्षा

बी. ए.की शिक्षा ग्रहण करने के लिए वे कानपुर आ गए वहां उन्होंने सनातन धर्म कॉलेज में दाखिला लिया जहां उनका संपर्क श्री सुंदर सिंह भंडारी बलवंत महासिंघे जैसे कई लोगों से हुआ।बलवंत महासिंघे की प्रेरणा से सन् 1937 में वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में सम्मिलित हो गए। राजनीतिक गतिविधियों के बावजूद उन्होंने बी. ए. की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की।
इसके पश्चात एम. ए. की पढ़ाई के लिए वे आगरा आ गए। यहां पर श्री नानाजी देशमुख और भाऊ जुगाडे के साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की गतिविधियों में भाग लेने लगे। इस बीच दीनदयाल की चचेरी बहन रामादेवी बीमार पड़ गई और इलाज कराने आगरा पहुंची जहां उनकी मृत्यु हो गई। यह दीनदयाल जी के लिए गहरा आघात था। इस घटना के कारण वे एम. ए. की परीक्षा नहीं दे सके और सीकर के महाराज और बिड़ला से मिलने वाली छात्रवृत्ति बंद कर दी गई।

राष्ट्रधर्म प्रशासन संस्थान की स्थापना

पंडित दीनदयाल जी ने लखनऊ में ‘राष्ट्रीय धर्म प्रकाशन’ नामक प्रकाशन संस्थान की स्थापना की और एक मासिक पत्रिका “राष्ट्रधर्म” की शुरुआत की जिसमें वे अपने विचारों को प्रस्तुत करते थे।

भारतीय जनसंघ की स्थापना

21 सितंबर 1951 को पंडित दीनदयाल जी ने उत्तर प्रदेश का एक राजनीतिक सम्मेलन आयोजित किया और नई पार्टी की राज्य इकाई ‘भारतीय जनसंघ’ की नींव डाली। 21 अक्टूबर 1991 को आयोजित प्रथम अखिल भारतीय सम्मेलन की अध्यक्षता डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने की और पंडित दीनदयाल जी इसके पीछे की सक्रिय शक्ति थे।

दीनदयाल उपाध्याय को कैसे मिला पंडित उपनाम

सरकार द्वारा संचालित प्रतियोगी परीक्षा में दूसरे उम्मीदवार पश्चिमी सूट पहन के आए थे। जबकि दीनदयाल जी अपनी चाची के कहने पर धोती, कुर्ता और सर पर टोपी लगाकर परीक्षा में सम्मिलित हुए। अन्य उम्मीदवार उन्हें मजाक में पंडित जी कह कर बुलाते थे
लेकिन यह उपनाम उनके सम्मान का द्योतक बन गया। पंडित जी का यह उपनाम लाखों लोगों द्वारा बाद के वर्षों में भी सम्मान और प्यार से इस्तेमाल किया जाता था। प्रतियोगी परीक्षा में भी उन्होंने सर्वोपरि स्थान प्राप्त किया। इसके पश्चात प्रयाग से उन्होंने बेसिक ट्रेनिंग (BT) पुरी की और इसके बाद वे पूरी तरह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यों में जुट गए। सन 1955 में दीनदयाल उपाध्याय उत्तर प्रदेश में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रांतीय प्रचारक बन गए।

पार्टी के सर्वोच्च अध्यक्ष पद को किया सुशोभित

पंडित जी की संगठनात्मक कुशलता बेजोड़ थी। 1968 में इस अत्यधिक सरल और विनीत नेता को पार्टी के सर्वोच्च अध्यक्ष पद पर बैठाया गया। यह दिन भारतीय जनसंघ के इतिहास में चिरस्मरणीय बन गया।

दीनदयाल जी की देश सेवा

पंडित दीनदयाल जी देश सेवा को सर्वोपरि मानते थे। 1953 से 1968 तक वे भारतीय जनसंघ के नेता रहे। एक गंभीर दार्शनिक एवं गहन चिंतक होने के साथ-साथ वह एक ऐसे समर्पित संगठनकर्ता और नेता थे जिन्होंने सार्वजनिक जीवन में व्यक्तिगत सुचिता एवं गरिमा के उच्चतम आयाम स्थापित किए। पंडित दीनदयालजी घरगृहस्थी की तुलना में देश की सेवा को अधिक श्रेष्ठ मानते थे। उन्होंने कहा था

” हमारी राष्ट्रीयता का आधार भारत माता है, केवल भारत ही नहीं। माता शब्द हटा दिया जाए तो भारत केवल जमीन का टुकड़ा मात्र है बनकर रह जाएगा।”

लेखन क्षमता

पंडित दीनदयाल जी ने अपने जीवन के एक-एक क्षण को पूरी रचनात्मकता और विश्लेषणात्मक गहराई से जिया है। पंडित जी ने राजनीतिक लेखन को भी दीर्घकालिक विषयों से जोड़कर रचना कार्य को सदा के लिए उपयोगी बनाया है। उन्होंने बहुत कुछ लिखा है जिनमें ‘एकात्मक मानववाद’, ‘लोकमान्य तिलक की राजनीति,’ ‘जनसंख्या का सिद्धांत और नीति,’ ‘ जीवन का अध्याय,’ ‘ राष्ट्र जीवन की समस्याएं’ ,’राष्ट्रीय अनुभूति’, ‘कश्मीर’ ‘अखंड भारत’ ‘ भारतीय राष्ट्रीय धारा का पुनः प्रवाह’ ‘भारतीय संविधान’ ‘इनको भी आजादी चाहिए’ ‘बेकरी समस्या और हल’ ‘टैक्स या लूट’ ‘भारतीय अर्थनीति’ अमेरिकी अनाज’ ‘द टू प्लान्स, आदि। भारत की विश्व पटल पर लगातार पुनर्प्रतिष्ठा और विश्व विजय उनके लेखन का एकमात्र लक्ष्य था।

अंत्योदय का सिद्धांत

अंत्योदय का सिद्धांत दीनदयाल द्वारा ही दिया गया था। उन्होंने कहा था
“वे लोग जिनके सामने रोजी-रोटी का संकट है। जिन्हें न रहने के लिए मकान है और न तन ढकने के लिए कपड़ा। अपने मैले कुचैले बच्चों के बीच जो दम तोड़ रहे हैं शहरों के उन करोड़ों निराशा भाई बहनों को सुखी व संपन्न बनाना हमारा लक्ष्य है। व्यक्तिवाद अधर्म है राष्ट्र के लिए काम करना धर्म है।

पंडित दीनदयाल जी की रहस्यमयी मौत

11 फरवरी सन 1968 को 52 वर्ष की आयु में मुगलसराय के पास रेल गाड़ी में यात्रा करते समय विलक्षण बुद्धि सरल व्यक्तित्व एवं नेतृत्व के अनगिनत गुणों के स्वामी पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी की हत्या हो गई। उनकी मृत्यु रहस्यमय परिस्थितियों में हुई। 11 फरवरी को प्रातः 3:45 बजे सहायक स्टेशन मास्टर को खंभा नंबर 1276 के पास कंकड़ पर पड़ी हुई लाश की सूचना मिली। इस शव की पहचान जब जनसंघ के संस्थापक पंडित दीनदयाल उपाध्याय के रूप में हुई तो लोग चौंक गए।इसकी सीबीआई जांच भी हुई सीबीआई ने दो आरोपियों के हवाले से दावा किया की चोरी का विरोध करने पर दीनदयाल को चलती ट्रेन से नीचे फेंक दिया गया था। दीनदयाल की मौत को राजनीतिक हत्या भी कहा जाता है। आज तक उनके रहस्यमई मौत से पर्दा नहीं उठाया जा सका है।

भारतीय राजनीतिक क्षितिज के इस प्रकाशमान सूर्य ने भारतवर्ष में सभ्यता मूलक राजनीतिक विचारधारा का प्रयास एवं प्रोत्साहन करते हुए अपने प्राण राष्ट्र को समर्पित कर दिया। उनकी मान्यता थी कि हिंदू कोई धर्म या संप्रदाय नहीं बल्कि भारत की राष्ट्रीय संस्कृति है।

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