स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर जी की पुण्य तिथि पर जानिए उनकी उपलब्धियों के बारे में: Death Anniversary of Lata Mangeshkar

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स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर जी की पुण्य तिथि पर जानिए उनकी उपलब्धियों के बारे में (On the death anniversary Lata Mangeshkar, know about her achievements)

Death Anniversary of Lata Mangeshkar: स्वर कोकिला लता मंगेशकर (Lata Mangeshkar) एक ऐसा नाम है जिसे याद करते ही मधुर आवाज हमारे कानों में गूंजने लगती है। लता जी आज भले हमारे बीच नहीं है लेकिन उनकी आवाज में वह खनक और वह एहसास था जो उन्हें औरों से अलग बनाता था। लता जी के गायकी के दीवाने भारत में ही नहीं अपितु विश्व भर में है।

लता मंगेशकर (Lata Mangeshkar) ने गायकी के क्षेत्र में जो मुकाम हासिल किया है उस मुकाम तक शायद ही कोई गायक या गायिका पहुंच सके। संगीत के क्षेत्र में उनके अभूतपूर्व योगदान को सदियों तक याद किया जाएगा। लता मंगेशकर ने 36 भाषाओं में 50,000 से अधिक गानों को अपनी आवाज दी। आज 6 फरवरी को लता जी की दूसरी पुण्यतिथि है।

आईए जानते हैं लता मंगेशकर की पुण्यतिथि पर उनके जीवन की उपलब्धियों के बारे में-

लता मंगेशकर (Lata Mangeshkar)का जन्म मध्य प्रदेश के इंदौर में 28 सितंबर 1929 को हुआ था। उनके पिता दीनानाथ मंगेशकर एक कुशल रंगमांचीय गायक थे। 5 वर्ष की उम्र में ही दीनानाथ जी ने लता जी को संगीत सिखाना शुरू कर दिया था।

लताजी शुरू से ही ईश्वर द्वारा प्रदत्त सुरीली आवाज, वजनदार अभिव्यक्ति और बात को बहुत जल्द समझने वाली अविश्वसनीय क्षमता का उदाहरण रही 5 वर्ष की आयु में उन्हें एक नाटक में अभिनय का अवसर मिला लेकिन उनकी रुचि तो संगीत में थी।

छोटी उम्र में ही परिवार की जिम्मेदारी संभाली

कम उम्र में ही लता जी के ऊपर पूरे परिवार की जिम्मेदारी आ गई क्योंकि 1942 में उनके पिताजी का हृदय गति रुक जाने से निधन हो गया। नाजुक कंधों पर परिवार का भार लिए लता जी ने 1942 से 1948 के बीच हिंदी व मराठी में 8 फिल्मों में काम किया लेकिन उनकी चाहत तो संगीत थी। उनके मराठी फिल्म ‘कीती हसाल’ से 1942 में उनके पार्श्व गायन की शुरुआत हुई

संघर्षमय जीवन

लता जी ने जो मुकाम अपने जीवन में हासिल किया उसकी राह इतनी आसान नहीं थी। इस मुकाम तक पहुंचाने के लिए उन्हें कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। लता जी की आवाज पतली थी जिसके कारण कई संगीतकारों ने शुरू- शुरू में उन्हें काम देने से साफ इनकार कर दिया था लेकिन लता जी ने हिम्मत नहीं हारी और अपनी लगन और प्रतिभा के बल पर लता जी को काम मिलना शुरू हुआ।

संगीत में पहला कदम

लता जी ने 1942 में पहली बार पार्श्व गायन शुरू किया। 1943 में इन्हें पहले हिंदी गाना गाने का अवसर प्राप्त हुआ। 1947 में हिंदी फिल्मों में पार्श्वगायिका के रूप में पहला गीत गाया।1949 में आई फिल्म ‘बरसात’ ‘अंदाज’ ‘दुलारी’ और ‘ महल’ ने प्रसिद्धि दिलाई और 1950 में लता जी फिल्म संगीत जगत की सबसे ताकतवर महिला के रूप में उभरी।

इन गीतों से मिली प्रसिद्धि

लता जी की अद्भुत कामयाबी ने लता जी को फिल्म जगत की सबसे मजबूत महिला बना दिया था। लता जी का व्यक्तित्व उन्हीं के द्वारा गाए गए गीतों से झलकता है-

“नाम गुम जाएगा चेहरा ये बदल जाएगा
मेरी आवाज ही पहचान है गर याद रहे।”

लता जी का यह गीत आज भी लोग गुनगुनाते हैं और लता जी की आवाज भूल नहीं पाते। लता जी को सर्वाधिक गीत रिकॉर्ड करने का भी गौरव प्राप्त है। 1947 में फिल्म ‘आपकी सेवा में’ उन्हें एक गीत गाने का मौका मिला और यही से लता जी के सफलता की कहानी शुरू हुई और 1949 में लता जी द्वारा गाए गए गाने ‘आएगा आने वाला’ के बाद लता जी ने फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। उनके प्रशंसकों की संख्या दिनों दिन बढ़ने लगी।

इन संगीतकारों के साथ किया कम

लता जी ने अपने समय के प्रसिद्ध संगीतकारों के साथ काम किया जिनमें, अनिल विश्वास, सलिल चौधरी,शंकर जयकिशन, एस. डी. बर्मन, आर.डी. बर्मन, नौशाद, मदन मोहन, सी.रामचंद्र इत्यादि शामिल हैं।

अपनी आवाज की जादू से इन फिल्मों को बनाया लोकप्रिय

लता जी की सुरीली आवाज ने कई फिल्मों को हिट बनाया था। उन्होंने ‘दो आंखें बारह हाथ’ ‘दो बीघा जमीन’ ‘मदर इंडिया’ ‘मुग़ल-ए-आज़म’ ‘महल’ ‘बरसात’ ‘एक थी लड़की’ ‘बड़ी बहन’ जैसी फिल्मों को अपनी आवाज देकर उनकी लोकप्रियता में चार चांद लगा दिया।

लता जी के कुछ प्रसिद्ध गीत जो आज भी गुनगुनाए जाते हैं

अल्लाह तेरो नाम (हम दोनों – 1961)
एहसान तेरा होगा मुझ पर (जंगली- 1961)
ये समां (जब जब फूल खिले- 1965)
ए मेरे वतन के लोगों (1962)
नाम गुम जाएगा चेहरा ये बदल जाएगा
आजा रे परदेसी (मधुमती- 1958)

लता जी की देशभक्ति गीत

भारत चीन युद्ध के बाद 1962 में शहीदों के श्रद्धांजलि कार्यक्रम में लता जी ने ‘ए मेरे वतन के लोगों’ गीत गया था उस कार्यक्रम में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू भी मौजूद थे लता जी के इस गीत के भावपूर्ण और मर्मस्पर्शी स्वरों ने नेहरू की आंखों में भी आंसू ला दिया था। इस गीत को सुनकर जवाहरलाल नेहरू रोने पर विवश हो गए थे। आज भी देशभक्ति गीतों में लता जी के इस गीत को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है।

लता जी ने प्रत्येक क्षेत्र में अपनी कला बिखेरी वह चाहे शास्त्रीय संगीत पर आधारित धुन हो, पाश्चात्य धुन हो अथवा लोक धुन हो लता जी ने प्रत्येक धुन को अपनी आवाज से जीवंत बना दिया।

पुरस्कार

संगीत क्षेत्र में उपलब्धियों के लिए लता जी को अनेक पुरस्कार प्रदान किए गए। या यूं कहें की लता जी की सुरीली आवाज ने उनके लिए सम्मानों की झड़ी लगा दी। संगीत जगत में अविस्मरणीय योगदान के लिए लता जी को अनेकों पुरस्कार प्रदान किए गए

  • 1958, 1962, 1965, 1969, 1993 और 1994 में फिल्म फेयर पुरस्कार।
  • 1966 और 1967 में महाराष्ट्र सरकार पुरस्कार।
  • 1972 1975 और 1990 में राष्ट्रीय पुरस्कार।
  • 1969 में पद्म भूषण से सम्मानित
  • 1989 में फिल्म जगत का सर्वोच्च सम्मान ‘दादा साहब फाल्के पुरस्कार’
  • 1993 में फिल्म फेयर का लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार
  • 1996 में स्क्रीन का लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार
  • 1997 में राजीव गांधी पुरस्कार
  • 1999 में पद्म विभूषण एन.टी.आर और जी सिने का लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार
  • 2000 में आईआईएफ (आइफा)का लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार
  • 2001 में स्टारडस्ट का लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार, नूरजहां पुरस्कार, महाराष्ट्र भूषण पुरस्कार और
  • 2001 में लता जी की अद्भुत उपलब्धियों को सम्मानित करते हुए भारत सरकार ने देश के सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया।

निधन

लता जी का निधन 6 फरवरी 2022 को हुआ।मुंबई के ब्रिच कैंडी अस्पताल में 29 दिनों तक चले लंबे उपचार के बाद लता जी ने 6 फरवरी 2022 रविवार को सुबह 8:12 बजे आखिरी सांस ली।

भारत की ‘भारत रत्न’ स्वर कोकिला लता जी ने छः दशकों से भी ज्यादा संगीत की दुनिया को सुरों से नवाजा। उनकी आवाज को सुनकर किसी की आंखों में आंसू आए तो कभी सीमा पर खड़े जवानों को सहारा मिला। उन्होंने स्वयं को पूर्णत: संगीत को समर्पित कर दिया था।

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