Lokmanya Balgangadhar Tilak Jayanti : भारतीय क्रांति के जनक लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक जयंती पर विशेष

Lokmanya Balgangadhar Tilak Jayanti 2023 भारतीय क्रांति के जनक, ‘ लोकमान्य’ बाल गंगाधर तिलक के जन्म दिवस पर विशेष: भारत की स्वतंत्रता की नींव रखने में सहायता करने वाले, बाल गंगाधर तिलक, विद्वान, गणितज्ञ ,दार्शनिक और उग्र राष्ट्रवादी व्यक्ति थे। बाल गंगाधर तिलक ने सन 1916 ईस्वी में इंडियन होमरूल लीग की स्थापना की। जिसके वे अध्यक्ष भी रहे। तिलक एक संघर्षशील और परिश्रमशील व्यक्ति थे। त्याग की प्रबल भावना उनमें कूट-कूट कर भरी थी।
आइए जानते हैं इस महान स्वतंत्रता सेनानी बाल गंगाधर तिलक के जीवन के विषय में-

Bal Gangadhar Tilak Jayanti 2023_Janpanchayat Hindi Blogs

बाल गंगाधर तिलक जयंती || Birth Anniversary of Lokmanya Balgangadhar Tilak || 23 July 2023

Birth anniversary of Lokmanya Balgangadhar Tilak : भारत की स्वतंत्रता की नींव रखने में सहायता करने वाले, बाल गंगाधर तिलक, विद्वान, गणितज्ञ ,दार्शनिक और उग्र राष्ट्रवादी व्यक्ति थे। बाल गंगाधर तिलक ने सन 1916 ईस्वी में इंडियन होमरूल लीग की स्थापना की। जिसके वे अध्यक्ष भी रहे। तिलक एक संघर्षशील और परिश्रमशील व्यक्ति थे। त्याग की प्रबल भावना उनमें कूट-कूट कर भरी थी।

आइए जानते हैं इस महान स्वतंत्रता सेनानी बाल गंगाधर तिलक के जीवन के विषय में-

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक का जन्म

राजद्रोह के सबसे खतरनाक अग्रदूतों में से एक, भारतीय असंतोष के वास्तविक जनक, भारत के बेताज बादशाह एवं ‘लोकमान्य’ के नाम से प्रसिद्ध बाल गंगाधर तिलक का जन्म कोंकण तट के रत्नागिरी नामक स्थान पर उच्च जाति के चितपावन ब्राह्मण के घर में 23 जुलाई 1856 को हुआ था। इनका पूरा नाम लोकमान्य श्री बाल गंगाधर तिलक था। उनके पिता का नाम श्री गंगाधर रामचंद्र तिलक था। उनके पिता अपने समय के लोकप्रिय शिक्षक थे किंतु अपने पुत्र की शिक्षा दीक्षा पूरी करने के लिए अधिक समय तक जीवित नहीं रहे और सन 1872 ईस्वी में लोकमान्य तिलक के पिता की मृत्यु हो गई।

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक की शिक्षा

बाल गंगाधर तिलक(Lokmanya Balgangadhar Tilak) 16 वर्ष की आयु में ही अनाथ हो गए लेकिन आपने शिक्षा को बिना किसी रूकावट के प्रारंभ रखा। पिता की मृत्यु के 4 महीने के अंदर मैट्रिक की परीक्षा पास की। सन 1876 ईस्वी में डेक्कन कॉलेज से बीए ऑनर्स की परीक्षा उत्तीर्ण की। सन 1879 ईस्वी में उन्होंने मुंबई विश्वविद्यालय से एल.एल.बी. की परीक्षा उत्तीर्ण की। इसी दौरान उनकी मित्रता आगरकर से हो गई। दोनों मित्रों ने अनेक रातें देश वासियों की सेवा के लिए सर्वोत्तम योजनाएं बनाने में गुजार दी।
अंततः उन्होंने निश्चय किया कि वह नई पीढ़ी को अच्छी और सस्ती शिक्षा प्रदान करने के लिए एक प्राइवेट हाई स्कूल और कॉलेज चलाएंगे। उन्होंने सरकारी नौकरी स्वीकार न करने का संकल्प लिया। दोनों मित्रों की आदर्शवादी बातों पर उनके साथी छात्र उनका मजाक उड़ाते थे। लेकिन इन उपहासो और बाह्य कठिनाइयों से भी उनका उत्साह कम नहीं हुआ।

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक की सार्वजनिक सेवा

अपनी पढ़ाई पूरी करने के पश्चात श्रीबाल गंगाधर तिलक (Lokmanya Balgangadhar Tilak) ने अपना अधिकांश समय सार्वजनिक सेवा में लगाने का निश्चय किया। उसी समय लड़कियों के विवाह के लिए सहमति से उम्र बढ़ाने का विधेयक वायसराय की परिषद के सामने लाया जा रहा था। सहमति की आयु का विधेयक भले ही इसके उद्देश्य कितने भी प्रशंसनीय रहे हो लेकिन वास्तव में यह हिंदू समाज में सरकारी हस्तक्षेप से सुधार लाने का प्रयास था। तिलक इस क्षेत्र में जोर जबरदस्ती के विरुद्ध थे। अतः पूरे उत्साह से वे इस विवाद में कूद पड़े।

विद्यालय की स्थापना

उसी समय तिलक से ‘ विष्णु शास्त्री’ के नाम से प्रसिद्ध विष्णु कृष्ण चिपलुणकर मिले, जिन्होंने अफसरों से तालमेल न होने के कारण सरकारी नौकरी से इस्तीफा दे दिया था। चिपलुणकर एक बुजुर्ग व्यक्ति थे और पुणे में प्राइवेट हाई स्कूल चलाना चाहते थे। तिलक,आगरकर और विष्णु शास्त्री के साथ असाधारण बुद्धि और ऊर्जा से परिपूर्ण व्यक्ति एमबी नामजोशी भी शामिल हो गया। 2 जनवरी सन 1880 को तिलक और चिपलुणकर ने नामजोशी की सहायता से पुणे में ‘ न्यू इंग्लिश स्कूल’ शुरू किया।

प्लेग बीमारी में देशवासियों की सेवा

प्लेग की बीमारी के दौरान तिलक ने देश वासियों की सेवा नि:स्वार्थ भाव से की ।जहां पुणे के अधिकांश नेता प्लेग की बीमारी के दौरान नगर छोड़कर भाग गए, तिलक वहीं डटे रहे। पुणे में प्लेग के लक्षण प्रकट होते ही तिलक ने हिंदू प्लेग अस्पताल शुरू किया। और इसके लिए धन जुटाने का कार्य किया। वह खोजी दलों के साथ स्वयंसेवक के रूप में गए। शिविरों में नि:शुल्क रसोई की व्यवस्था की। अस्पताल का प्रबंध किया और जनता की कठिनाइयों को गवर्नर के सामने लाते रहे।प्लेग की समाप्ति के लिए सरकार द्वारा उठाए गए विभिन्न कदमों का उन्होंने दृढ़ता से समर्थन किया और इन उपायों को सहानुभूति पूर्ण और मैत्रीपूर्ण ढंग से लागू करने की सलाह दी तथा जनता को भी अनावश्यक विरोध न करने की सलाह दी।

समाचार पत्र का प्रकाशन

तिलक ने अपने मित्र चिपलुणकर और आगरकर के सहयोग से दो साप्ताहिक समाचार पत्रों अंग्रेजी में ‘ द मराठा’ और मराठी में ‘केसरी’ का संपादन किया। इन समाचार पत्रों को के माध्यम से तिलक ने देशवासियों की राजनीतिक चेतना को जगाने का काम किया। इन समाचार पत्रों के माध्यम से तिलक में उन लोगों की कटु आलोचना की जो पश्चिमी तर्ज पर सामाजिक सुधारों एवं संवैधानिक तरीके से राजनीतिक सुधारों का पक्ष लेते थे। केसरी और मराठा में प्रकाशित कुछ लेखों में कोल्हापुर के तत्कालीन महाराजा शिवाजी राव के साथ किए गए व्यवहार की कठोर आलोचना की गई। जिसके कारण तिलक और आगरकर पर मानहानि का मुकदमा चला दिया गया। जिसमें तिलक और आगरकर को 4 महीने की साधारण कैद की सजा सुनाई गई।

‘ डेक्कन एजुकेशन सोसाइटी’ का गठन और ‘ फार्ग्युसन कॉलेज’ की स्थापना

इस मुकदमे से उनके समाचार पत्रों की लोकप्रियता और अधिक बढ़ गई और लोगों ने स्वेच्छा से सहायता प्रदान करना शुरू कर दिया। 1884 के उत्तरार्ध में स्वयं को कानूनी अस्तित्व देने के लिए तिलक ने ‘ डेक्कन एजुकेशन सोसायटी’ पुणे, का गठन किया और इस सोसाइटी के पहले आजीवन सदस्य बने। 1885 मे डेक्कन एजुकेशन सोसायटी के तत्वावधान में फार्ग्यूसन कॉलेज की स्थापना की गई।

उग्र दल के नेता

सन 1889 ईस्वी में तिलक ने कांग्रेस में प्रवेश किया। उन्होंने बिपिन चंद्र पाल एवं लाला लाजपत राय के सहयोग से राष्ट्रवादी दल का गठन किया। बाल गंगाधर तिलक के विचार भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नरम दल के लिए ज्यादा ही उग्र थे। तिलक का लक्ष्य छोटे-मोटे सुधार नहीं अपितु स्वराज था। उन्होंने अपने उग्र विचारों को स्वीकार करने के लिए कांग्रेस को राजी करने का प्रयास किया। इसी मामले में कांग्रेस के सूरत अधिवेशन में नरम दल के साथ उनका संघर्ष भी हुआ।1908 में राष्ट्रवादी शक्तियों में फूट का लाभ उठाकर तथा तिलक द्वारा केसरी पत्रिका में ‘ देश का दुर्भाग्य’ में सरकार की गलत नीतियों पर प्रकाश डालने के कारण तिलक पर राजद्रोह और आतंकवाद फैलाने का आरोप लगाकर उन्हें 6 वर्ष के कारावास की सजा दे दी गई। 6 वर्ष के कठोर कारावास के अंतर्गत वे मांडले वर्मा वर्तमान में म्यांमार जेल में बंद कर दिया गया।
मांडले जेल में कारावास के दौरान ही तिलक ने ‘ आर्कटिक होम आफ द वेदास’ और ‘ भगवत गीता रहस्य’ की रचना की जो हिंदुओं की सबसे पवित्र पुस्तक का मूल टीका है।
1950 में भारत के वायसराय लॉर्ड कर्जन द्वारा किए गए बंगाल विभाजन को रद्द करने की बंगालियों की मांग का तिलक ने जोरदार समर्थन किया। तिलक द्वारा शुरू की गई राजनीति गतिविधियां विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार और सत्याग्रह को बाद में मोहनदास करमचंद गांधी ने अंग्रेजो के साथ अहिंसक असहयोग आंदोलन में अपनाया था।

' इंडियन होम रूल लीग' की स्थापना

सन 1914 में प्रथम विश्वयुद्ध के ठीक पहले तिलक जेल से रिहा हुए और पुनः राजनीति में प्रवेश करते हुए
“स्वराज हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूंगा।” के नारे के साथ इंडियन होम रूल लीग की स्थापना 1916 में की। 1916 में वह फिर से कांग्रेस में शामिल हुए और हिंदुओं और मुसलमानों के बीच हुए ऐतिहासिक लखनऊ समझौते पर हस्ताक्षर किया। यह समझौता पाकिस्तान के भावी संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना और तिलक के बीच हुआ था। 1918 में तिलक इंडियन होम रूल लीग के अध्यक्ष के रूप में इंग्लैंड गए। जहां उन्होंने ब्रिटेन की लेबर पार्टी के नेताओं के साथ संबंध बनाया। क्योंकि उन्होंने महसूस किया कि ब्रिटेन की राजनीति में लेबर पार्टी उदीयमान शक्ति है। तिलक की दूर दृष्टि सत्य सिद्ध हुई और 1947 में लेबर सरकार ने भारत की स्वतंत्रता को मंजूरी दी।
तिलक प्रथम ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने कहा था कि ‘ भारतीयों को विदेशी शासन के साथ सहयोग नहीं करना चाहिए।’

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक लेखक के रूप में

तिलक ने अपने खाली समय का सदुपयोग अपनी प्रिय पुस्तकों भगवत गीता और ऋग्वेद के पाठन में किया। वेदों के काल निर्धारण संबंधित अनुसंधान के परिणाम स्वरूप उन्होंने वेदों की प्राचीनता पर निबंध लिखें। यह निबंध गणित ज्योतिषी अवलोकन के प्रमाणों पर आधारित था। इस निबंध का सारांश इंटरनेशनल कांग्रेस ऑफ ओरिएंटलिस्ट के पास भेजा जो 1892 में लंदन में प्रकाशित हुई। इस पूरे निबंध को दी ओरियन या रिसर्च इन टू द एक्टिविटीज ऑफ द वेदाज के अंतर्गत प्रकाशित किया गया। इस पुस्तक में तिलक ने ओरिआन की ग्रीक परंपरा और लक्षत्रपुंज के संस्कृत अर्थ अग्रायण या अग्रहायण के बीच संबंध को ढूंढा है। इस पुस्तक की प्रशंसा यूरोप और अमेरिकी विद्वानों ने की। तिलक के निष्कर्षों को लगभग सभी ने स्वीकार किया।

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक पर राजद्रोह का मुकदमा

बाल गंगाधर तिलक की सार्वजनिक सेवाएं उन्हें मुकदमे और उत्पीड़न से नहीं बचा सके।प्लेग की बीमारी के दौरान संकट की घड़ी में जनता को भाग्य के भरोसे छोड़ देने के लिए तिलक ने पुणे के नेताओं की कड़ी आलोचना की। जिस कारण उन पर राजद्रोह का मुकदमा चला। फिर जेल भेज दिया गया। इस मुकदमे के कारण उन्हें “लोकमान्य” की उपाधि मिली।
26 जुलाई को मुंबई सरकार ने तिलक पर मुकदमा चलाने की मंजूरी प्रदान की। 27 जुलाई की रात में तिलक को मुंबई में गिरफ्तार किया गया। 29 जुलाई को जमानत की अर्जी उच्च न्यायालय में दाखिल की गई जिसे अस्वीकार कर दिया गया। 12 अगस्त को यह केस हाईकोर्ट सेशन के सुपुर्द कर दिया गया और अध्यक्ष न्यायाधीश न्यायमूर्ति बदरुद्दीन तैयब जी के सामने जब जमानत अर्जी दाखिल की गई तो न्यायाधीश ने तिलक को जमानत दे दी।
17 सितंबर सन 1897 ईस्वी को उच्च न्यायालय से यह प्रमाण पत्र जारी करने का अनुरोध किया गया कि यह केस प्रिवी काउंसिल में अपील करने योग्य है। प्रिसी काउंसिल में न्याय के लिए अपील की गई। 19 नवंबर 1897 को तिलक की अपील पर श्री एस्क्विथ ने, जो बाद में इंग्लैंड के प्रधानमंत्री हुए, बहस की। एस्क्विथ ने अपनी बहस में इस बात पर जोर दिया कि न्यायमूर्ति स्ट्रैची ने जूरी को गलत दिशा निर्देश दिए हैं। लेकिन प्रिवी काउंसिल में अपील करने की अनुमति देने का प्रार्थना पत्र खारिज कर दिया गया।
इस प्रकार तिलक के लिए न्याय के सारे दरवाजे बंद हो गए। लेकिन ब्रिटेन की जनता पर इस घटना का गहरा प्रभाव पड़ा। सर विलियम हंटर और प्रोफेसर मैक्स मूलर ने जो एक विशाल ह्रदय थे ने महारानी को महत्वपूर्ण व्यक्तियों के हस्ताक्षर वाला प्रतिवेदन भेजा। जिसमें तिलक के प्रति इस आधार पर दया प्रदर्शित करने का अनुरोध किया गया, क्योंकि वे एक विद्वान हैं और उनकी रिहाई के पक्ष में बहुत कुछ कहा जा सकता है। इस प्रार्थना पत्र का असर हुआ और बातचीत के बाद तिलक औपचारिक शर्तें मानने के लिए तैयार हो गए। मंगलवार 6 सितंबर 1998 को मुंबई के गवर्नर के आदेश पर उन्हें छोड़ दिया गया।

ताई महाराज का मुकदमा

इन विषम परिस्थितियों के अतिरिक्त तिलक एक और मुकदमे ताई महाराज के केस में फंसे हुए थे। इस केस ने 1901 से तिलक का सारा समय ले लिया। इस केस के कारण उन्हें न केवल यंत्रणा दायक शारीरिक कष्ट बल्कि मानसिक उत्पीड़न भी भोगना पड़ा और हजारों रुपए की आर्थिक हानि भी उठानी पड़ी।
इस केस में तिलक के विरुद्ध साथ आपराधिक आरोप लगाए गए। इस पूरे दौर में तिलक अपना मानसिक संतुलन खोए बगैर बिना किसी बाधा के किस प्रकार अपना सामान्य कामकाज कर सके? उन्होंने कैसे प्रसन्नता भाव बनाए रखा? और अपने कानूनी सलाहकारों के लिए बौद्धिक प्रेरणा स्रोत बने। उनके जेष्ठ पुत्र की मृत्यु ने उनकी गहरी चिंताओं को और उग्र कर दिया था। फिर भी किस प्रकार वे अपने मस्तिष्क को मुक्त और अलग- थलग रख सके? जिससे अपने साहित्यिक अध्ययन के कार्य को जारी रख सकें और अपनी पुस्तक ‘ द आर्कटिक होम इन वेदास’ को प्रकाशित कर सकें- यह सभी शोध का विषय हैं।

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक का दृष्टिकोण

तिलक ने एंग्लो इंडियन अधिकारियों की नीतियों का जबरदस्त विरोध किया। आम जनता पर तिलक के प्रभाव का अधिकारियों ने भी अनुभव किया था। सांप्रदायिक दंगों के बारे में तिलक का दृष्टिकोण स्पष्ट और निर्भ्रांत था। उनका कहना था कि कुछ अदूरदर्शी एंग्लो इंडियन अधिकारियों द्वारा गुप्त रूप से लोगों को भड़काया जा जाना हिंदू-मुस्लिम दंगों का कारण है। उन्होंने कहा कि इस दंगे की जड़ लॉर्ड डफरिन द्वारा शुरू गई ‘ फूट डालो राज करो’ की नीति है। उन्होंने कुछ वर्ग के अधिकारियों के विरुद्ध पक्षपात का प्रत्यक्ष आरोप लगाया। तिलक के इन विचारों से अधिकारी नाराज थे। लेकिन तिलक सरकारी नाराजगी से डरने और दबने वाले व्यक्ति नहीं थे। अपने पत्र ‘ केसरी’ के जरिए तिलक आम जनता में देशभक्ति और स्वतंत्रता की भावना विकसित कर रहे थे।

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक का सामाजिक और राजनीतिक दर्शन

तिलक का नाम ‘ गणपति पूजन’ और ‘ शिवाजी’ के जीवन प्रसंगों पर महोत्सव के आयोजन से घनिष्ठ रूप से जुड़ा हुआ है। तिलक का मानना था कि विदेशी विचारों और प्रथाओं के अंधानुकरण से नई पीढ़ी में अधार्मिकता पैदा हो रही है और उसका विनाशक प्रभाव भारतीय युवकों के चरित्र पर पड़ रहा है। अतः उनका दृढ़ विश्वास था कि पुराने देवी देवताओं और राष्ट्रीय नेताओं की स्वस्थ वंदना से लोगों में सच्ची राष्ट्रीयता और देश प्रेम की भावना विकसित होगी। नैतिक दिवालियेपन की स्थिति से राष्ट्र को उबालना एक गंभीर समस्या थी। जिसके लिए सरकार ने भारतीय स्कूलों में नैतिक शिक्षा की पाठ्य पुस्तकों की पढ़ाई शुरू करने का फैसला लिया। लेकिन तिलक के विचार में भारतीय युवकों को स्वावलंबी और अधिक ऊर्जावान बनाने के लिए आत्मसम्मान का प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए और यह तभी संभव है जब उन्हें अपने धर्म और पूर्वजों का अधिक आदर करना सिखाया जाए। तिलक पर सामाजिक सुधारों के मामले में अस्थिरता और ढोंग का आरोप लगाया गया लेकिन वे अपनी तरह के व्यावहारिक समाज सुधारक थे।
श्री बाल गंगाधर तिलक मौलिक विचारों के व्यक्ति थे। वे संघर्षशील और परिश्रमशील थे।उनके अंदर त्याग की भावना प्रबल थी। वह आसानी से सब कुछ त्याग कर सकते थे। जब उन्हें कठिन चुनौतियों का सामना करना पड़ता तो वे अधिक प्रसन्नता का अनुभव करते थे। उनकी एकमात्र इच्छा थी लोगों की भलाई के लिए कार्य करना। उनके कार्य परोपकार की भावना से भरे होते थे। अपनी इस इच्छा को उन्होंने काफी हद तक पूरा भी किया। बाल गंगाधर तिलक में योग्यता, व्यवसाय, उद्यमशीलता और देशप्रेम का अनूठा संगम था। जिससे अंग्रेज सरकार हमेशा तिलक से चौकस रहती थी।

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक की मृत्यु

जब बाल गंगाधर तिलक कांग्रेस की अमृतसर की बैठक में 1919 में हिस्सा लेने के लिए स्वदेश लौटे तो इतने नरम हो गए थे कि उन्होंने लेजिसलेटिव काउंसिल के चुनाव बहिष्कार की गांधीजी की नीतियों का विरोध नहीं किया। उन्होंने क्षेत्रीय सरकार में भारतीयों की भागीदारी की शुरुआत करने वाले सुधारों को लागू करने के लिए प्रतिनिधियों को सलाह दी कि वे प्रत्युत्तर पूर्ण सहयोग की नीति का पालन करें। लेकिन नए सुधारों को निर्णायक दिशा देने से पहले ही 1 अगस्त 1920 ईस्वी में मुंबई में तिलक की मृत्यु हो गई।
बाल गंगाधर तिलक को गांधी जी ने
“आधुनिक भारत का निर्माता”
और नेहरू जी ने
“भारतीय क्रांति के जनक” की उपाधि दी है।