‘महामना’ की उपाधि से विभूषित पहले और अंतिम व्यक्ति पं. मदन मोहन मालवीय जी की जयंती पर विशेष: Birth Anniversary of Madan Mohan Malviya

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Mahamana Madan Mohan Malaviya Jayanti 2023_पं. मदन मोहन मालवीय जी की जयंती

पंडित मदन मोहन मालवीय(P.Madan Mohan Malviya) एक महान शिक्षाविद, अग्रणी, ओजस्वी वक्ता और राष्ट्रीय नेता थे। मालवीय जी एक स्वतंत्रता सेनानी होने के साथ-साथ एक बड़े समाज सुधारक भी थे। मदन मोहन मालवीय जी का संपूर्ण जीवन देश के आर्थिक और सामाजिक विकास, शिक्षा, धर्म,समाज सेवा, हिंदी भाषा के विकास और राष्ट्र के प्रति समर्पित था। इसलिए महात्मा गांधी ने इन्हें ‘महामना’ की उपाधि दी तो भारत के द्वितीय राष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने इन्हें ‘कर्मयोगी’ का दर्जा दिया। पंडित मदन मोहन मालवीय की जयंती 25 दिसंबर को मनाई जाती है।

आईए जानते हैं उनकी जयंती के अवसर पर उनके जीवन के विषय में:

मालवीय जी का जीवन परिचय जीवन

पंडित मदन मोहन मालवीय जी का जन्म 25 दिसंबर 1861 को इलाहाबाद में हुआ था। उनके पिता का नाम ब्रजनाथ और माता का नाम भूना देवी था। मालवा के मूल निवासी होने के कारण यह मालवीय कहलाए।

शिक्षा

मदन मोहन मालवीय जी की प्रारंभिक शिक्षा इलाहाबाद के ही धर्मज्ञानोपदेश पाठशाला में हुई। इस पाठशाला में सनातन धर्म की शिक्षा दी जाती थी। 1879 में इलाहाबाद जिला स्कूल से एंट्रेंस की परीक्षा और म्योर सेंट्रल कॉलेज से एफ. ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की। मालवीय जी की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी जिसके कारण कभी-कभी फीस जमा करने में भी कठिनाई होती थी। अपनी आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण मालवीय जी ने बी.ए. करने के बाद ही 40 रुपए मासिक वेतन पर एक सरकारी विद्यालय में पढ़ाना शुरू कर दिया।

मालवीय जी ने 1884 में उच्च शिक्षा प्राप्त की। अध्यापन कार्य के दौरान अवसर मिलने पर वे किसी पत्र इत्यादि के लिए लेख भी लिखा करते थे। शीघ्र ही मालवीयजी ने वकालत शुरू कर दी। उन्होंने 1893 ई. में इलाहाबाद हाईकोर्ट में वकील के रूप में अपना नाम दर्ज कराया। मालवीय जी ने पत्रकारिता के क्षेत्र में भी कार्य किया। 1885 और 1907 ई के बीच ‘हिंदुस्तान’, ‘इंडियन यूनियन’ और ‘अभ्युदय’ का संपादन किया।

दांपत्य जीवन

मदन मोहन मालवीय जी का विवाह कुंदन देवी के साथ 16 वर्ष की आयु में हुआ था। कुंदन देवी मिर्जापुर के पंडित नंदलाल जी की पुत्री थीं।

मालवीय जी का राजनीतिक जीवन

जीवन के प्रारंभिक दिनों से ही मालवीय जी की राजनीति में अभिरुचि थी। अपनी इसी अभिरुचि के कारण वे 1886 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के दुसरे अधिवेशन में सम्मिलित हुए। 1902 में वे उत्तर प्रदेश ‘इंपीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल’ के सदस्य और बाद में ‘सेंट्रल लेजिसलेटिव असेंबली’ के सदस्य चुने गए। मदन मोहन मालवीय चार बार भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए। मालवीय जी ने स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेकर कई वर्षों तक कांग्रेस की सेवा कर राष्ट्र सेवा में अपना योगदान दिया। मालवीय जी 1909 में लाहौर, 1918 और 1930 में दिल्ली और 1932 में कोलकाता में कांग्रेस अधिवेशन के अध्यक्ष रहे। चौरी- चौरा कांड में ब्रिटिश सरकार ने लगभग 170 लोगों को फांसी सुनाई थी। उस समय पंडित मदन मोहन मालवीय ने मुकदमों की पैरवी कर 151 लोगों को बचाया था।

मालवीय जी ब्रिटिश सरकार के निर्भीक आलोचक थे। उन्होंने पंजाब की दमन नीति की तीव्र आलोचना की। उन्होंने सविनय अवज्ञा आंदोलन और असहयोग आंदोलन में प्रमुख भूमिका निभाई। मालवीय जी ने वर्ष 1931 में प्रथम गोलमेज सम्मेलन में देश का प्रतिनिधित्व किया और वर्ष 1937 में राजनीति से संन्यास लेकर समाज सेवा से जुड़ गए।

हिंदी के विकास में मालवीय जी का योगदान

हिंदी भाषा के विकास में मदन मोहन मालवीय जी का अमूल्य योगदान रहा है। मालवीय जी ने हिंदी पत्रकारिता से ही जीवन के कर्मक्षेत्र में प्रवेश किया, या यूं कहें कि पत्रकारिता को ही उन्होंने हिंदी प्रचार का मुख्य साधन बना लिया और हिंदी भाषा को ऊंचाइयों तक पहुंचाया।

उत्तर प्रदेश की अदालतों और दफ्तरों में हिंदी को व्यवहार योग्य भाषा के रूप में स्वीकृत करने के लिए उन्होंने सन 1890 ई. में आंदोलन चलाया। इससे पहले सरकारी दफ्तर और अदालतों की भाषा केवल उर्दू थी। मालवीय जी ने शासको को जो आवेदन पत्र भेजा उसमें लिखा कि

“पश्चिमी उत्तर प्रदेश तथा अवध की प्रजा में शिक्षा का फैलना इस समय सबसे आवश्यक कार्य है। गुरुतर प्रमाणों से यह सिद्ध किया जा चुका है कि इस कार्य में सफलता तभी प्राप्त होगी जब कचहरियों और सरकारी दफ्तरों में नागरी अक्षर जारी किए जाएंगे। आतएव अब इस शुभ कार्य में जरा सा भी विलंब नहीं होना चाहिए।”

गवर्नर ने सन 1900 में उनका आवेदन पत्र स्वीकार कर लिया और इस प्रकार सरकारी कामकाज में हिंदी का प्रयोग शुरू हुआ।

कुलपति के रूप में काशी हिंदू विश्वविद्यालय दीक्षांत समारोह में मालवीय जी हिंदी में ही भाषण करते थे। शिक्षा का माध्यम हिंदी हो या अंग्रेजी इस विषय में मालवीय जी के विचार बहुत स्पष्ट थे। शिक्षा के माध्यम पर अपने एक भाषण में उन्होंने कहा था कि

“भारतीय विद्यार्थियों के मार्ग में आने वाली वर्तमान कठिनाइयों का कोई अंत नहीं है। सबसे बड़ी कठिनता यह है कि शिक्षा का माध्यम हमारी मातृभाषा ना होकर एक अत्यंत दुरूह विदेशी भाषा है। सभ्य संसार के किसी भी अन्य भाग में जन समुदाय की शिक्षा का माध्यम विदेशी भाषा नहीं है।”

प्राचीन संस्कृति के घोर समर्थक

मालवीय जी का सार्वजनिक जीवन में पदार्पण ही अंग्रेजी और उर्दू के बढ़ते हुए प्रभाव के कारण हिंदी भाषा को क्षति न पहुंचे इसके लिए जनमत संग्रह करने और भारतीय सभ्यता और संस्कृति के मूल तत्वों को प्रोत्साहन देने के कारण हुआ। मालवीय जी प्राचीन संस्कृति के घोर समर्थक थे।

संपादक के रूप में मालवीय जी

हिंदी के विषय में मालवीय जी ने बालकृष्ण भट्ट के ‘हिंदी प्रदीप’ में बहुत कुछ लिखा था। कालाकांकर के राजा रामपाल सिंह से मालवीय जी का परिचय कांग्रेस के दुसरे अधिवेशन के अवसर पर 1886 में हुआ। राजा साहब ने मालवीय जी की भाषा से प्रभावित होकर उन्हें दैनिक ‘हिंदुस्तान’ का संपादक बने के लिए मना लिया। यहीं से मालवीय जी के पत्रकार जीवन का श्री गणेश हुआ। पत्रकार के रूप में उन्होंने ‘अभ्युदय’ (साप्ताहिक पत्र), ‘लीडर’ (समाचार पत्र), ‘ मर्यादा’ (पत्रिका) और ‘सनातन धर्म’ (साप्ताहिक पत्र) का संपादन किया।

मालवीय जी पत्रों द्वारा जनता के प्रचार में बहुत विश्वास रखते थे। मालवीय जी विविध सम्मेलनों,सार्वजनिक सभाओं आदि में भाग लेते रहे।कई साहित्य एवं धार्मिक संस्थाओं से उनका संपर्क हुआ। इसके अतिरिक्त मालवीय जी सनातन धर्म सभा के नेता थे। अतः देश के विभिन्न भागों में सनातन धर्म महाविद्यालयों की स्थापना मालवीय जी की सहायता से हुई।

धार्मिक और सामाजिक विषयों पर आर्य समाज से मतभेद

यद्यपि मालवीय जी आर्य समाज के प्रवर्तकों तथा अन्य कार्यकर्ताओं द्वारा की गई हिंदी की सेवा की कद्र करते थे किंतु धार्मिक और सामाजिक विषयों पर उनका आर्य समाज से मतभेद था। आर्य समाज जहां कर्मकांड एवं मूर्ति पूजा का विरोध करता था, वही मालवीय जी समस्त कर्मकाण्ड यू, रीति रिवाज एवं मूर्ति पूजा को हिंदू धर्म का मौलिक अंग मानते थे। आर्य समाज की विचारधारा का विरोध करने के लिए उन्होंने जनमत संगठित करना आरंभ कर दिया।

काशी नागरी प्रचारिणी सभा के प्रवर्तक में एक थे मालवीय जी

मदन मोहन मालवीय जी काशी नागरी प्रचारिणी सभा के प्रवर्तकों में से एक थे। उन्होंने सन 1893 ई. में काशी नागरी प्रचारिणी सभा की स्थापना में पूर्ण योगदान दिया। मालवीय जी ने आजीवन नागरी प्रचारिणी सभा का मार्गदर्शन किया।

विशुद्ध हिंदी के पक्षधर

हिंदी के प्रचार प्रसार में मदन मोहन मालवीय जी का नाम सबसे ऊपर आता है।वे हिंदी आंदोलन के सर्वप्रथम नेता थे। हिंदी साहित्य की अभिवृद्धि के लिए सन 1910 में इलाहाबाद प्रयागराज में “अखिल भारतीय हिंदी साहित्य सम्मेलन” की स्थापना मालवीय जी की सहायता से हुई। अक्टूबर 1910 में काशी में हुए भारतीय हिंदी साहित्य सम्मेलन के प्रथम अधिवेशन का सभापतित्व मालवीय जी ने किया। मालवीय जी विशुद्ध हिंदी के पक्षधर थे। शिक्षा के क्षेत्र में उन्होंने अद्वितीय कार्य किया।

उच्च कोटि के वक्ता और लेखक

मालवीय जी ने हिंदी की असाधारण सेवा की। हिंदी साहित्य सम्मेलन जैसी साहित्यिक संस्था तथा काशी हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना एवं सार्वजनिक रूप से हिंदी को सरकारी दफ्तरों में स्वीकृत कराकर मालवीय जी ने हिंदी के उत्थान में जो योगदान दिया वह अद्वितीय है। उनके प्रयासों से ही हिंदी इतनी समृद्ध हुई। लेकिन हिंदी और संस्कृत का ज्ञान विरासत में प्राप्त होने के बावजूद उन्होंने एक भी स्वतंत्र रचना नहीं की। उनकी शैली और ओजपूर्ण अभिव्यक्ति के परिचायक के रूप में उनके अग्रलेखों, भाषणों तथा धार्मिक प्रवचनों के संग्रह ही उपलब्ध हैं। संभवत कई कार्य एक साथ करने के कारण उन्हें पुस्तक रचना का समय नहीं मिला। बावजूद इसके नि:संदेह वे उच्च कोटि के विद्वान, वक्ता और लेखक भी थे। यद्यपि हिंदी के लिए उनका अमूल्य योगदान हिंदी प्रेमियों के लिए पर्याप्त है किंतु उनकी निजी रचनाओं का अभाव सदैव खटकता है। मालवीय जी अपने युग के प्रधान नेताओं में थे जिन्होंने हिंदी, हिंदू और हिंदुस्तान को सर्वोच्च स्थान पर प्रस्थापित किया।

असहयोग आंदोलन में लिया भाग

मालवीय जी ने गांधी जी के असहयोग आंदोलन और सविनय अवज्ञा आंदोलन में उत्साह पूर्वक हिस्सा लिया। 1928 में साइमन कमीशन के खिलाफ लाला लाजपत राय, जवाहरलाल नेहरू और अन्य स्वतंत्रता सेनानियों के साथ मिलकर मालवीय जी ने देशभर में जन जागरण चलाया।

तुष्टिकरण की नीति के खिलाफ थे मालवीय जी

मालवीय जी तुष्टिकरण की नीति के खिलाफ थे। उन्होंने 1916 के लखनऊ पैक्ट के तहत मुसलमान के लिए अलग निर्वाचक मंडल का विरोध किया क्योंकि वह देश को विभाजित नहीं होने देना चाहते थे। उन्होंने गांधी जी को भी आगाह किया था कि देश के बंटवारे की कीमत पर स्वतंत्रता स्वीकार न करें।

सत्यमेव जयते का नारा दिया

पंडित मदन मोहन मालवीय जी ने ही “सत्यमेव जयते” के नारे को जन-जन में लोकप्रिय बनाया। हालांकि यह वाक्यांश मूल रूप से ‘मंडुकोपनिषद’ से लिया गया है लेकिन अब यह भारत का राष्ट्रीय आदर्श वाक्य है जो भारत के राष्ट्रीय प्रतीक चिन्ह के नीचे अंकित है।

पंडित मदन मोहन मालवीय जी के सामाजिक कार्य

  • पंडित मदन मोहन मालवीय जी कई संस्थाओं के संस्थापक रहे उन्होंने कई पत्रिकाओं का संपादन किया।
  • सन 1884 ईस्वी में वे हिंदी उद्धारिणी प्रतिनिधि सभा के सदस्य बने।
  • सन 1885 ई. में ‘इंडियन यूनियन’ का संपादन किया।
  • सन 1887 ईस्वी में ‘भारत धर्म महामंडल’ की स्थापना कर सनातन धर्म के प्रचार का कार्य किया।
  • सन 1889 ईस्वी में ‘हिंदुस्तान’ का संपादन किया।
  • सन 1891 में ‘इंडियन ओपिनियन’ का संपादन कर उन्होंने पत्रकारिता को नई दिशा दी।
  • सन 1891 में इलाहाबाद हाईकोर्ट में वकालत करते हुए अनेक महत्वपूर्ण व विशिष्ट मामलों में अपना लोहा बनवाया।
  • देश को स्वतंत्र देखने के लिए 1913 ईस्वी में वकालत छोड़कर राष्ट्रसेवा का व्रत लिया।
  • प्रयागराज में म्युनिसिपालिटी के सदस्य रहकर सन 1916 तक सहयोग किया।
  • 1919 ईस्वी में कुंभ मेले के अवसर पर प्रयाग में तीर्थ यात्रियों की देखभाल के लिए ‘प्रयाग सेवा समिति’ बनाई।
  • अंग्रेजों द्वारा हरिद्वार के भीमगोडा में गंगा के प्रवाह को पूरी तरह से अवरुद्ध करने की संभावना से आशंकित होकर उन्होंने 1905 में गंगा महासभा की स्थापना की।
  • कैरेबियन में भारतीय गिरमिट प्रणाली को समाप्त करने में उनकी भूमिका के लिए याद किया जाता है।

मालवीय जी निरंतर स्वास्थ्य स्वार्थ रहित कार्यों के पथ पर अग्रसर रहे। उन्होंने महाभारत के निम्न वाक्य को अपने जीवन का आदर्श बनाया

“ न त्वहं कामये राज्यं न स्वर्गं न पुनर्भवम् ।
कामये दुःख तप्तानाम् प्राणिनामार्तनाशनम् ।।”

काशी हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना

‘काशी हिंदू विश्वविद्यालय’ (BHU)की स्थापना मालवीय जी की शिक्षा और साहित्य सेवा का अमिट शिलालेख है। उनके द्वारा स्थापित काशी हिंदू विश्वविद्यालय कालांतर में एशिया का सबसे बड़ा विश्वविद्यालय बना। हिंदुस्तान में शिक्षा के प्रचार प्रसार हेतु दृढ़ प्रतिज्ञ रही आयरिश महिला डॉक्टर एनी बेसेंट का पंडित मदन मोहन मालवीय जी के व्यक्तित्व पर अभूतपूर्व प्रभाव पड़ा। एनी बेसेंट ने वाराणसी नगर के कमच्छा नामक स्थान पर सन 1889 ईस्वी में सेंट्रल हिंदू कॉलेज की स्थापना की जो आगे चलकर काशी हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना का केंद्र बना।

मालवीय जी ने तत्कालीन काशी नरेश प्रभु नारायण सिंह की सहायता से सन 1904 ईस्वी में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना का विचार बनाया। 1905 में श्री डी. एन. महाजन की अध्यक्षता में एक प्रस्ताव पारित किया गया। सन 1911 ईस्वी में डॉक्टर एनी बेसेंट की सहायता से एक प्रस्तावना को मंजूरी दिलाई। जिसने 28 नवंबर 1911 ई को एक सोसायटी का स्वरूप लिया जिसका उद्देश्य था ‘बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी’ की स्थापना करना। सर हरकोर्ट बटलर ने इंपीरियल लेजिस्लेटिव असेंबली में 25 मार्च 1915 ई को एक बिल लाया जो की 1 अक्टूबर 1915 ई को एक्ट के रूप में मंजूर कर लिया गया और 4 फरवरी सन 1916 ई.(माघ प्रतिपदा संवत 1972) को काशी हिंदू विश्वविद्यालय की नींव रख दी गई।

निजाम ने मदद के रूप में दी अपनी जूती

काशी हिंदू विश्वविद्यालय के निर्माण के लिए मालवीय जी ने देशभर से चंदा इकट्ठा किया। इसी सिलसिले में वह हैदराबाद के निजाम के पास आर्थिक मदद के लिए पहुंचे लेकिन निजाम ने मदद के बदले उनका अपमान करते हुए कहा कि दान देने के लिए उनके पास सिर्फ जूती है। मदन मोहन मालवीय जी बिना कुछ कहे जूती को चुपचाप दान में लेकर चल दिए और इसे भरे बाजार में नीलाम करने की कोशिश की। लेकिन जब हैदराबाद के निजाम को यह पता चला तो उन्हें लगा कि यह उनकी इज्जत की नीलामी होगी। अतः निजाम ने मालवीय जी को बुलाकर उन्हें बड़ी मात्रा में दान दिया।

काशी हिंदू विश्वविद्यालय निर्माण के लिए मदन मोहन मालवीय जी को 1360 एकड़ जमीन दान में मिली थी, जिसमें 11 गांव ,70,000 पेड़,100 पक्के कुंए ,20 कच्चे कुएं ,40 पक्के मकान 860 कच्चे मकान एक मंदिर और एक धर्मशाला शामिल है।

गांधी जी ने दी ‘महामना की उपाधि

महात्मा गांधी ने मदन मोहन मालवीय के सरल स्वभाव का जिक्र करते हुए कहा था-

“जब मैं मालवीय जी से मिला, वे मुझे गंगा की धारा की तरह निर्मल और पवित्र लगे। मैने तय किया, मैं उसी निर्मल धारा में गोता लगाऊंगा।” महात्मा गांधी मालवीय जी को बड़े भाई की तरह मानते थे। गांधी जी ने ही मालवीय जी को ‘ महामना’ की उपाधि दी थी। महामना की उपाधि पाने वाले मालवीय जी पहले और अंतिम व्यक्ति हैं।

मालवीय जी को मिलने वाले सम्मान एवं पुरस्कार

पंडित मदन मोहन मालवीय जी को मरणोपरांत 2014 में देश के सर्वोच्च पुरस्कार “भारत रत्न” से सम्मानित किया गया। भारतीय रेलवे के नेता के सम्मान में 2016 में वाराणसी- नई दिल्ली ‘महामना’ एक्सप्रेस सेवा शुरू की गई।

मालवीय जी का निधन

मालवीय जी का संपूर्ण जीवन राष्ट्र सेवा एवं हिंदी भाषा के उत्थान के प्रति समर्पित रहा। पंडित मदन मोहन मालवीय जी का 84 वर्ष की उम्र में प्रयागराज में 12 नवंबर , 1946 ई. को निधन हो गया।

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Reference: https://en.wikipedia.org/wiki/Madan_Mohan_Malaviya