Atal Bihari Vajpayee Jayanti 2023: बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी अटल बिहारी वाजपेयी जी की जयंती पर विशेष

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 Atal Bihari Vajpayee Birth Anniversary_ Atal Bihari Vajpayee 2023_ अटल बिहारी वाजपेयी जयंती

भारत रत्न श्री अटल बिहारी वाजपेई एक प्रसिद्ध राजनीतिज्ञ, एक सच्चे राष्ट्रवादी, पत्रकार, कवि और देश के प्रथम पूर्णतः गैर कांग्रेसी प्रधानमंत्री थे। अटल बिहारी वाजपेई का नाम सर्वाधिक लोकप्रिय प्रधानमंत्रियों में लिया जाता है। अटल बिहारी वाजपेई की जयंती 25 दिसंबर को मनाई जाती है। उनकी जयंती को “सुशासन दिवस” के रूप में भी मनाया जाता है। आईए जानते हैं अटल बिहारी वाजपेई जी की जीवनयात्रा के बारे में-

जन्म (Birth)

अटल बिहारी बाजपेयी का जन्म 25 दिसंबर 1924 को ग्वालियर मध्य प्रदेश में हुआ था। उनके पिता पंडित कृष्ण बिहारी वाजपेई अध्यापक और माता कृष्णा देवी गृहणी थी। अटल जी सात भाई बहनों में सबसे छोटे थे। उनके तीन बड़े भाई और तीन बहने थी। अटल बिहारी वाजपेई बहुमुखी प्रतिभा संपन्न और अंतर्मुखी स्वभाव के थे। ‘ शिंके का बाड़ा’ मोहल्ले में जन्म लेने वाला यह बालक बहुत बड़ा भाग्य लेकर पैदा हुआ था।

विद्यार्थी जीवन (Student Life of Atal Ji)

अटल बिहारी वाजपेयी जी के पिता पंडित कृष्ण बिहारी वाजपेई अध्यापन का कार्य करते थे, जिसके कारण उन्हें कई स्थानों पर जाना पड़ा, लेकिन इनकी प्रारंभिक शिक्षा गोरखी विद्यालय, बड़नगर में हुई, जहां से उन्होंने आठवीं तक की शिक्षा प्राप्त की। बड़नगर के इसी विद्यालय से इन्हे वक्ता के रूप में पहचान मिली, जब इन्होंने कक्षा 5 में पहली बार भाषण दिया था। बड़नगर में उच्च शिक्षा व्यवस्था न होने के कारण इन्हें ग्वालियर जाना पड़ा, जहां विक्टोरिया कॉलेजिएट स्कूल में इनका नामांकन हुआ और यहां से इंटरमीडिएट तक की पढ़ाई पूरी की।

इंटरमीडिएट करने के पश्चात स्नातक की शिक्षा ग्रहण करने के लिए इन्होंने विक्टोरिया कॉलेज में प्रवेश लिया। स्नातक में उनके तीनों विषय संस्कृत, हिंदी एवं अंग्रेजी भाषा पर आधारित थे।अपनी साहित्यिक प्रकृति के कारण अटल जी का आकर्षण इन तीनों भाषाओं के प्रति था। कॉलेज के समय में इन्होंने कविताओं की रचना आरंभ कर दी थी और इसी समय उनकी साहित्यिक अभिरुचि परिवहन चढ़ी। कॉलेज में होने वाले अखिल भारतीय स्तर की कवि सम्मेलनो के आयोजन के कारण अटल जी को कविता की गहराई समझने में काफी मदद मिली।

छात्र जीवन से वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक भी बने। स्नातक की शिक्षा ग्वालियर से प्राप्त करने के पश्चात अटल जी ने कानपुर के डीएवी कॉलेज से राजनीति शास्त्र में एम. ए. की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। इसके बाद इन्होंने कानपुर से ही पिता के साथ एलएलबी की पढ़ाई की।

पत्रकार के रूप में अटल जी

अटल जी शिक्षा के महत्व को अच्छी तरह जानते थे क्योंकि वे एक शिक्षक पिता की संतान थे। इसीलिए वह पीएचडी करने के लिए वकालत की पढ़ाई छोड़ कर लखनऊ आ गए, लेकिन पत्रकारिता से जुड़ने के कारण अटल जी को अध्ययन के लिए समय नहीं मिल पाता था। अतः पीएचडी में सफलता प्राप्त नहीं कर सके। लखनऊ में पंडित दीनदयाल द्वारा संपादित ‘ राष्ट्रधर्म’ नामक समाचार पत्र के सह संपादक के रूप में अटल जी नियुक्त किए गए। अटल जी के आने के बाद ‘ राष्ट्रधर्म’ समाचार पत्र अत्यधिक प्रसिद्ध हो गया। जिसके लिए स्वयं की प्रेस का प्रबंध किया गया। इस प्रेस का नाम ‘भारत प्रेस’ रखा गया।

‘ भारत प्रेस’ से ही दूसरा समाचार पत्र “पांचजन्य” भी प्रकाशित होने लगा, लेकिन देश आजाद होने के बाद जब 30 जनवरी 1948 को महात्मा गांधी की हत्या हो गई तो नाथूराम गोडसे का संबंध राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ होने के कारण भारत सरकार ने आरएसएस को प्रतिबंधित कर दिया और आरएसएस के प्रभाव क्षेत्र में होने के कारण भारत प्रेस को बंद कर दिया गया। लेकिन अटल जी की पत्रकारिता में अत्यधिक रुचि होने के कारण उन्होंने इलाहाबाद में ‘क्राइसिस टाइम्स’ नामक अंग्रेजीसाप्ताहिक में अपनी सेवाएं देना प्रारंभ कर दिया। आरएसएस पर लगा प्रतिबंध हट जाने के बाद अटल जी पुनः लखनऊ आ गए और उनके संपादन में दैनिक पत्र “स्वदेश” निकलना आरंभ हुआ। स्वदेश कुछ ही दिनों में लोकप्रिय हो गया लेकिन लगातार हानि के कारण स्वदेश को भी बंद करना पड़ा। इसके पश्चात अटल जी ने दिल्ली से प्रकाशित होने वाले समाचार पत्र “वीर अर्जुन” का संपादन किया। वीर अर्जुन के संपादन ने अटल जी को एक पत्रकार के रूप में काफी प्रतिष्ठा और सम्मान दिलाया और अटल जी को एक कवि और पत्रकार के रूप में प्रसिद्धि मिली।

अटल जी का राजनीतिक जीवन (Political Life of Atal Ji)

अटल बिहारी वाजपेयी जी अपने छात्र जीवन के दौरान पहली बार राष्ट्रवादी राजनीति में आए जब उन्होंने 1942 में ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ , जिसने ब्रिटिश उपनिवेशवाद का अंत किया, में भाग लिया। वह राजनीति विज्ञान और विधि के छात्र थे और कॉलेज के दिनों में ही उनकी रुचि विदेशी मामलों के प्रति बढ़ी। उनकी यह रूचि अंत समय तक बनी रही।

वाजपेयी जी ने अपना करियर पत्रकार के रूप में शुरू किया था और 1951 में ‘ भारतीय जन संघ’ में शामिल होने के बाद उन्होंने पत्रकारिता छोड़ दी। आरएसएस के हिंदुत्व वादी विचारधारा को भारत सरकार अलगाववादी विचारधारा का पोषक मानती थी। इसलिए आरएसएस पर कई तरह के प्रतिबंध लगा दिए गए थे। ऐसे में आरएसएस ने राजनीतिक विचारधारा वाले एक दल “भारतीय जन संघ” का गठन किया। भारतीय जन संघ का जन्म संघ परिवार की राजनीतिक संस्था के रूप में हुआ और डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी इसके अध्यक्ष बने। इसी समय अटल जी इस संस्था के संगठनात्मक ढांचे से जुड़ गए। इसीलिए अटल जी को जनसंघ का सबसे पुराना व्यक्ति माना जाता था ।

1952 के आम चुनाव में भारतीय जनसंघ ने पहली बार भाग लिया लेकिन कोई विशेष कामयाबी नहीं प्राप्त हुई। डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने अटल जी के साथ जम्मू- कश्मीर के लोगों को जागरूक करने का कार्य किया क्योंकि उस समय भी कश्मीर का मामला अत्यंत संवेदनशील था। कश्मीर के हिंदुओं को अपने अधिकारों के लिए जाग्रत करने का कार्य डॉक्टर मुखर्जी और अटल जी ने किया, लेकिन इसी समय तत्कालीन सरकार ने डॉक्टर मुखर्जी को सांप्रदायिक गतिविधियों को बढ़ावा देने का आरोप लगाकर जेल में डाल दिया, जहां 23 जून 1953 को मुखर्जी जी की जेल में मृत्यु हो गई।

1957 के दूसरी आम चुनाव के दौरान अटल जी जनसंघ का कार्य प्रमुख रूप से देख रहे थे। 1957 के दूसरे आम चुनाव में जन संघ को चार स्थानों पर जीत हासिल हुई। अटल जी ने इस चुनाव में तीन स्थान बलरामपुर, लखनऊ और मथुरा से नामांकन पत्र दाखिल किया लेकिन सिर्फ बलरामपुर सीट से विजयी होकर पहली बार लोकसभा में पहुंचे। इस चुनाव में 10,000 मतों से विजयी होकर अटल जी लोकसभा में पहुंचे थे। इस चुनाव में भारतीय जन संघ को 6% वोट प्राप्त हुए थे।

कश्मीर मुद्दे को संसद में उठाया

लोकसभा के लिए निर्वाचित होने के पश्चात उन्होंने संसद में कश्मीर पर अपने विचार प्रकट करते हुए कहा कि “कश्मीर का मामला संयुक्त राष्ट्र में नहीं जाना चाहिए था क्योंकि वहां से कोई समाधान प्राप्त नहीं होगा। भारत को अपने स्तर पर ही प्रयास करके पाकिस्तान के अधिकार वाले कश्मीर के विषय में सोचना होगा।

1962 में राज्यसभा के लिए हुए निर्वाचित

1962 के आम चुनाव में अटल जी पुनः बलरामपुर की सीट से भारतीय जन संघ के टिकट पर खड़े हुए लेकिन इस बार का चुनाव विवादास्पद रहा क्योंकि कांग्रेस प्रत्याशी ने उचित, अनुचित सभी प्रकार से चुनाव जीतने का प्रयास किया और परिणामत :अटल जी चुनाव हार गए। इसकी एक वजह सांप्रदायिक सौहार्द बिगड़ना भी था, जिसके कारण भयवश कई हिंदू महिलाओं ने अपने मताधिकारों का प्रयोग नहीं किया। 1962 के चुनाव में जनसंघ के 14 प्रतिनिधि सांसद में पहुंचे। इस संख्या के आधार पर राज्यसभा के लिए जनसंघ को दो सदस्य मनोनीत करने का अधिकार प्राप्त हुआ, जिसके आधार पर अटल बिहारी वाजपेई और पंडित दीनदयाल उपाध्याय राज्यसभा में भेजे गए। चूंकि राज्यसभा के पदेन सभापति राष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन थे। उन्होंने अटल बिहारी वाजपेई को राज्यसभा की प्रथम दीर्घा में बैठने के लिए अनुप्रेरित किया। अटल जी ने राज्यसभा में अपने दायित्वों का निर्वहन योग्यता के साथ किया।

1967 में चौथे आम चुनाव में अटल जी ने पुनः बलरामपुर सीट से चुनाव लड़ा और 32,000 वोटो से कांग्रेस प्रत्याशी को हराकर जीत दर्ज की। अपने इस कार्यकाल में अटल जी ने यह सिद्ध कर दिया कि वह पूर्ण रूप से धर्मनिरपेक्षता के समर्थक हैं। अटल जी ने मजहबी आधार पर गुट बनाने की प्रवृत्ति को खतरनाक बताया। उन्होंने भारत सरकार को भी इस बारे में आगाह किया। अटल जी ने धारा “370” समाप्त करने की मांग की।

अमेरिका वियतनाम युद्ध पर अटल जी की भविष्यवाणी

विदेशी राजनीति में अटल जी की गहरी रुची थी। उन्होंने वियतनाम पर अमेरिका द्वारा किए गए हमले की कड़ी निंदा करते हुए वियतनाम को लेकर संयुक्त राष्ट्र संघ की खामोशी को भी निशाना बनाया। अमेरिका वियतनाम युद्ध के परिणाम की भविष्यवाणी करते हुए अटल जी ने कहा था कि “वियतनाम की जनता अपनी स्वाधीनता के लिए लड़ रही है और अमेरिका अपना उपनिवेश बनाने के लिए वियतनाम को युद्ध में तबाह करना चाहता है। अंतत: अमेरिकी फौजियों को वहां से जाना ही होगा।” अटल जी की यह भविष्यवाणी पूर्णत: सत्य साबित हुई और उस युद्ध में अमेरिका को पराजय का मुंह देखना पड़ा। अमेरिका के महाशक्ति की छवि पर वियतनाम युद्ध आज भी एक धब्बे की भांति है।

आपातकाल के दौरान जेल में की काव्य रचना

अटल जी की साहित्य और काव्य की प्रति गहरी रुची थी।अटल जी के नाम कई साहित्यिक और कलात्मक कृतियां हैं। सन 1972 में अटल जी ने अपने गृह नगर ग्वालियर से चुनाव लड़ा और पांचवी बार लोकसभा में पहुंच गए। इस समय इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनी थी और 1975 में उन्होंने आपातकाल लागू कर विपक्ष के नेताओं को जेल में डाल दिया, जिनमें अटल जी भी थे। अटल जी ने जेल में रहते हुए अपने समय का सदुपयोग किया और आपातकाल के यथार्थ को व्यंग के माध्यम से अपने काव्य में वर्णित किया। जेल में अटल जी के स्वास्थ्य खराब होने पर अखिल भारतीय आयुर्वेद विज्ञान संस्थान में भर्ती कराया गया। अपनी जेल यात्रा के दौरान अटल जी ने कई काव्य रचनाएं की। अटल जी की प्रकाशित कृतियां निम्न है-

  1. मेरी सांसद यात्रा(चार खंडों में),
  2. मेरी 51 कविताएं
  3. संकल्प काल
  4. शक्ति से शांति
  5. संसद में चार दशक (तीन खंडों में भाषण)
  6. लोकसभा में अटल जी (भाषणों का संग्रह)
  7. मृत्यु या हत्या
  8. अमर बलिदानी
  9. कैदी कविराज की कुंडलियां (आपातकाल के दौरान जेल में लिखी गई कविताओं का संग्रह)
  10. भारत की विदेश नीति के नए आयाम (1977- 1989 के दौरान विदेश मंत्री के रूप में दिए गए भाषणों का संग्रह)
  11. जनसंघ और मुसलमान
  12. संसद में तीन दशक(हिंदी)
  13. संसद में भाषण 1957 – 1992 तीन खंड और
  14. अमर आग है (कविताओं का संग्रह 1994)

“मेरी इक्यावन कविताओं” की एक कविता “परिचय” के कुछ अंश जो अटल जी की हिंदुत्ववादी विचारधारा को दर्शाती हैं-

हिंदू तन मन, हिंदू जीवन, रग रग हिंदू मेरा परिचय

मैं अखिल विश्व का गुरु महान, देता विद्या का अमर दान।
मैंने दिखलाया मुक्ति मार्ग, मैंने सिखलाया ब्रह्म ज्ञान।
मेरे वेदों का ज्ञान अमर, मेरे वेदों की ज्योति प्रखर।
मानव के मन का अंधकार, क्या कभी सामने सका ठहर।
मेरा स्वर नभ में घहर घहर, सागर के जाल में छहर छहर।
इस कोने से उसे कोने तक, कर सकता जगती सौरभमय।
हिंदू तन मन, हिंदू जीवन, रग रग हिंदू मेरा परिचय।।

मोरारजी देसाई के प्रधानमंत्रित्व काल में बने विदेश मंत्री

आपातकाल समाप्त होने पर जब छठवीं लोकसभा के गठन हेतु चुनाव घोषित हुए उस समय विपक्ष के नेता जेल में बंद थे। उनमें वैचारिक मंथन हुआ और इस अवधि में संगठित होने में विपक्ष सफल रहा और इंदिरा गांधी की इस चुनाव में हार हुई तथा संगठित विपक्ष द्वारा जनता पार्टी की सरकार बनी, जिसमें मोरारजी देसाई को प्रधानमंत्री बनाया गया और अटल बिहारी वाजपेई विदेश मंत्री बनाए गए। अटल जी विदेशी मामलों के विशेषज्ञ माने जाते थे। उन्होंने कई देशों की यात्राएं करने के दौरान भारत का पक्ष रखा। मोरारजी देसाई ने उनकी विदेश यात्रा पर उन्हें कहा था कि “कभी-कभी देश में भी रहा करो”। विदेश मंत्री रहते हुए अटल जी की उपलब्धियां इस प्रकार हैं-

  • अटल बिहारी वाजपेई पहले ऐसे भारतीय नागरिक, नेता और विदेश मंत्री थे, जिन्होंने 4 अक्टूबर 1977 को संयुक्त राष्ट्र संघ के अधिवेशन में हिंदी में संबोधन दिया। इससे पहले किसी भारतीय नागरिक ने ऐसा नहीं किया था।
  • अटल जी ने पाकिस्तान के तत्कालीन फौजी शासन जिया उल हक से वार्तालाप के दौरान फरक्का- गंगाजल बंटवारे का मसौदा तय किया।
  • भारत-पाकिस्तान के मध्य रेल सेवा की बहाली तय की गई।
  • अटल जी बांग्लादेश के साथ भी गंगाजल के वितरण समझौते पर आगे बढ़े।
  • भारतीय अणु शक्ति के संबंध में नीति स्पष्ट कर इसे भारत के लिए आवश्यक बताया।
  • नेपाल के विदेश मंत्री के साथ व्यापार और पारगमन की नई नीति के संबंध में भी चर्चा की।

1886 में फिर राज्यसभा के लिए चुने गए

1980 में भारतीय जन संघ को भारतीय जनता पार्टी के रूप में गठित किया गया, जिसका चुनाव चिन्ह “कमल का फूल” रखा गया। उस समय अटल जी भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेता थे। 1996 तक अटल जी विपक्ष में रहे। 1986 में उन्हें फिर से राज्यसभा के लिए चुना गया।

पहली बार 13 दिनों के लिए बने प्रधानमंत्री

1996 के चुनाव में जब बीजेपी सबसे बड़े दल के रूप में उभरी तो अटल जी को संसदीय दल के नेता के रूप में प्रधानमंत्री बनाया गया। उन्होंने 21 मई 1996 को प्रधानमंत्री के पद एवं गोपनीयता की शपथ ग्रहण की। लेकिन विपक्ष संगठित न होने के कारण अटल जी अंतिम रूप से बहुमत सिद्ध नहीं कर पाए और मात्र 13 दिनों में ही भारतीय जनता पार्टी की सरकार अल्पमत में आ गई और अटल जी मात्र 13 दिन तक प्रधानमंत्री रहे।

दूसरी बार 13 महीने के लिए बने प्रधानमंत्री

1998 से 1999 तक 13 महीने की अवधि के लिए दूसरी बार प्रधानमंत्री बने। जयललिता के समर्थन वापस लेने के कारण 13 महीने में ही यह सरकार गिर गई। 1998- 99 में प्रधानमंत्री रहते हुए अटल जी ने पोखरण परमाणु परीक्षण करके दृढ़ नेतृत्व का परिचय दिया और विश्व को परमाणु क्षमता का एहसास कराया था।

1999 में प्रधानमंत्री का कार्यकाल किया पूरा

1999 में चुनाव के पश्चात एनडीए को स्पष्ट बहुमत प्राप्त हुआ और राष्ट्रपति के आर नारायण ने अटल जी को प्रधानमंत्री के रूप में पद एवं गोपनीयता की शपथ 13 अक्टूबर 1999 को दिलाई। अटल जी अपने पहले के दो कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए थे, लेकिन तीसरी बार उन्होंने प्रधानमंत्री का कार्यकाल पूरा किया।

धर्मनिरपेक्षता के पक्षधर

अटल जी यद्यपि हिंदूत्ववादी पार्टी भाजपा के शीर्ष नेता थे लेकिन भाजपा धर्मनिरपेक्षता का सिद्धांत भी स्वीकार करती है। अटल जी सदैव धर्मनिरपेक्षता के पक्षधर रहे।

अटल जी के कार्य ( Work of Atal ji

यद्यपि अटल जी की सरकार ने 5 वर्ष का कार्यकाल पूर्ण किया लेकिन एनडीए के सभी घटकों को एक साथ लेकर चलने के लिए अटल जी को काफी पापड़ बेलने पड़े। 27 छोटी बड़ी पार्टियों को साथ लेकर चलना यह किसी चुनौती से काम नहीं था। अटल जी के प्रधानमंत्रित्व काल की विशेषताएं निम्न है-

  • अटल जी ने अपने प्रधानमंत्रित्व काल में पाकिस्तान और चीन के विरोधी रवैये को देखते हुए पोखरण परमाणु विस्फोट कर अपनी परमाणु नीति को स्पष्ट किया। हालांकि अमेरिका और उसके मित्र देशों को यह बात नागवार गुजरी लेकिन अटल जी ने इसकी परवाह नहीं की। उन्होंने संतुलित विदेश नीति का पालन करते हुए यह स्पष्ट कर दिया था कि भारत अगला परमाणु परीक्षण नहीं करेगा और परमाणु बम का उपयोग भारत द्वारा तभी किया जाएगा जब भारत के विरुद्ध ऐसा किया जाएगा।
  • अटल जी ने सदैव पाकिस्तान के साथ संबंध सुधारने की दिशा में कार्य किया लेकिन पाकिस्तान कभी अपने वादों पर खरा नहीं उतरा। कारगिल युद्ध इसका स्पष्ट उदाहरण है।
  • अटल जी ने कांग्रेस के प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव के द्वारा शुरू गई की गई आर्थिक सुधारो की नीति को जारी रखा क्योंकि उन्हें इस नीति के सकारात्मक तथ्यों का ज्ञान था। इस नीति से अर्थव्यवस्था के सुधार का लाभ अटल जी की सरकार को तो प्राप्त हुआ ही साथ ही सर्वहारा वर्ग की आर्थिक उन्नति भी हुई।
  • अटल जी ने आर्थिक विकास के लिए “स्वर्णिम चतुर्भुज योजना” का आरंभ किया। उनकी इस योजना से जहां आम व्यक्ति की यात्रा सुविधाजनक हुई वहीं व्यापारिक और कारोबारी गतिविधियों को भी प्रोत्साहन मिला।
  • अटल जी ने पाकिस्तान के अपदस्थ प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की रिहाई के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन से वार्ता की, ताकि पड़ोसी देश में प्रजातंत्र की हत्या ना हो सके। उनके इस साझा प्रयास से ही नवाज शरीफ की रिहाई संभव हो पाई।

अटल जी की उपलब्धियां (Achievement of Atal Ji)

1998 से 99 के अपनी 14 महीने के द्वितीय प्रधानमंत्रित्व काल में अटल जी ने निम्न उपलब्धियां प्राप्त की-

  1. अटल जी ने परमाणु शक्ति को देश के लिए आवश्यक बात कर 11 मई 1998 को पोखरण में पांच परमाणु परीक्षण किया। उन्होंने भारत की सुरक्षा को महत्व देते हुए देश को परमाणु बम से लैस किया और देश की स्वतंत्रता और संप्रभुता का नारा दिया।
  2. अटल जी ने पोखरण में “जय जवान, जय किसान” का नारा दिया और संपूर्ण विश्व के समक्ष अपने इरादे जाहिर कर दिए कि भारत भी एक परमाणु संपन्न देश है।
  3. पोखरण परमाणु परीक्षण पर जब अमेरिका और मित्र राष्ट्रों ने भारत पर प्रतिबंध लगा दिया तब अटल जी ने स्पष्ट रूप से कह दिया कि भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत है उन्हें आर्थिक प्रतिबंधों की कोई भी परवाह नहीं है। अटल जी ने भारत को स्वावलंबी राष्ट्र बनाने की दिशा में कार्य किया।
  4. अटल जी ऐसे उदारमना थे कि उन्होंने विपक्ष की नीतियों को भी सराहा। उन्होंने परमाणु कार्यक्रम की आधारशिला रखने वाली भूतपूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी को भी धन्यवाद दिया।
  5. अटल जी ने सेना का मनोबल ऊंचा उठाने का कार्य किया।

अटल जी को प्राप्त होने वाले पुरस्कार(Awards given to Atal Ji)

पूर्वप्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई को राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने दिनांक 27 मार्च 2015 को उनके घर जाकर देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान “भारत रत्न” से सम्मानित किया था। इसके अतिरिक्त

  • 1952 में पद्म विभूषण
  • 1993 में डी.लिट.(कानपुर विश्वविद्यालय)
  • 1994 में लोकमान्य तिलक पुरस्कार
  • 1994 में श्रेष्ठ सांसद पुरस्कार
  • 1994 में “भारत रत्न पंडित गोविंद बल्लभ पंत पुरस्कार” प्रदान किए गए।

अटल जी का निधन (Death of Atal Bihari Vajpayee)

अटलजी ने स्वास्थ्य खराब होने की वजह से सार्वजनिक जीवन से संन्यास ले लिया था। 11 जून 2018 को उन्हे किडनी में संक्रमण और सीने में जकड़न के कारण एम्स में भर्ती कराया गया जहां 16 अगस्त 2018 को 93 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया।

अटल बिहारी वाजपेई जी एक प्रतिष्ठित राष्ट्रीय नेता, प्रखर राजनितिज्ञ,नि:स्वार्थ सामाजिक कार्यकर्ता, सशक्त वक्ता,कवि, साहित्यकार, पत्रकार और बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी थे। अटल जी के द्वारा किए गए कार्य एवं उनकी नीतियां देश के लिए सदैव प्रेरणा स्रोत रहेगी।