Uniform Civil Code (UCC) : क्या है समान नागरिक संहिता और इसे लागू करना क्यों है आवश्यक ?

23 नवंबर 1948 को समान नागरिक संहिता(Uniform Civil Code)को लेकर संसद भवन में विचार विमर्श किया गया कि समान नागरिक संहिता(UCC )को संविधान में शामिल किया जाए या नहीं लेकिन अंततः इस पर कोई नतीजा नहीं निकला। आज इस बात को 75 वर्ष बीत गए हैं लेकिन समान नागरिक संहिता भारत में आज भी एक विवादित और राजनीतिक रूप से ज्वलंत मुद्दा बना हुआ है।
आज देश में भाजपा की सरकार है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार अपने सख्त फैसलों के लिए जानी जाती है। अपने चुनावी घोषणापत्र में भाजपा ने तीन प्रमुख बातें कही थी। पहला राम मंदिर का निर्माण, दूसरा कश्मीर से धारा 370 की समाप्ति और तीसरा समान नागरिक संहिता अर्थात UCC।सरकार ने अपने दो वादे तो पूरी कर दिए हैं। राम मंदिर का निर्माण प्रारंभ हो चुका है और कश्मीर से धारा 370 हटा दिया गया है। और अब बारी है UCC लागू करने की, लेकिन पहले दो मुद्दों की अपेक्षा UCC लागू करना सरकार के लिए टेढ़ी खीर साबित हो रहा है। कुछ लोग इसका विरोध कर रहे हैं तो कुछ लोग समर्थन। UCC लागू करने को लेकर भाजपा सरकार प्रतिबद्ध है और 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले इसे लागू करना अब वर्तमान सरकार का मुख्य लक्ष्य है।

Uniform Civil Code UCC_Janpanchayat Hindi Blogs_समान नागरिक संहिता

Uniform Civil Code(UCC) : 23 नवंबर 1948 को समान नागरिक संहिता(Uniform Civil Code)को लेकर संसद भवन में विचार विमर्श किया गया कि समान नागरिक संहिता(UCC )को संविधान में शामिल किया जाए या नहीं लेकिन अंततः इस पर कोई नतीजा नहीं निकला। आज इस बात को 75 वर्ष बीत गए हैं लेकिन समान नागरिक संहिता भारत में आज भी एक विवादित और राजनीतिक रूप से ज्वलंत मुद्दा बना हुआ है।
आज देश में भाजपा की सरकार है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार अपने सख्त फैसलों के लिए जानी जाती है। अपने चुनावी घोषणापत्र में भाजपा ने तीन प्रमुख बातें कही थी। पहला राम मंदिर का निर्माण, दूसरा कश्मीर से धारा 370 की समाप्ति और तीसरा समान नागरिक संहिता अर्थात UCC।सरकार ने अपने दो वादे तो पूरी कर दिए हैं। राम मंदिर का निर्माण प्रारंभ हो चुका है और कश्मीर से धारा 370 हटा दिया गया है। और अब बारी है UCC लागू करने की, लेकिन पहले दो मुद्दों की अपेक्षा UCC लागू करना सरकार के लिए टेढ़ी खीर साबित हो रहा है। कुछ लोग इसका विरोध कर रहे हैं तो कुछ लोग समर्थन। UCC लागू करने को लेकर भाजपा सरकार प्रतिबद्ध है और 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले इसे लागू करना अब वर्तमान सरकार का मुख्य लक्ष्य है।
समान नागरिक संहिता क्या है? इसे लागू करने को लेकर इतना विरोध क्यों हो रहा है? UCC से किसको नुकसान होगा किसको फायदा? और यूसीसी से क्या-क्या बदल जाएगा? आइए जानते हैं-

क्या है समान नागरिक संहिता (What is Uniform Civil Code)?

 समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code)का अर्थ है भारत में रहने वाले प्रत्येक नागरिक के लिए समान कानून चाहे वह किसी भी धर्म जाति का हो। समान नागरिक संहिता लागू होने पर विवाह, विवाह- विच्छेद और जायदाद के बंटवारे सभी के लिए एक ही कानून लागू होगा। समान नागरिक संहिता का अर्थ है एक निष्पक्ष कानून। इसका किसी धर्म से कोई संबंध नहीं है।
समान नागरिक संहिता का उल्लेख भारतीय संविधान के अनुच्छेद 44 में ‘ राज्य के नीति निदेशक तत्व’ के अंतर्गत किया गया है। संविधान के अनुच्छेद 44 के अनुसार
“राज्य भारत के समस्त राज्य क्षेत्र में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता प्राप्त कराने का प्रयास करेगा।”
संविधान में उल्लेखित नीति निदेशक तत्व नीति निर्माण में राज्य का मार्गदर्शन करते हैं यद्यपि यह तत्व कानूनी रूप से प्रवर्तनीय नहीं होते हैं। भारत में अभी तक समान नागरिक संहिता केवल गोवा राज्य में लागू है जिसे गोवा नागरिक संहिता के रूप में जाना जाता है। शेष भारत में पर्सनल लॉज का पालन किया जाता है। यह पर्सनल लॉज धार्मिक व सामुदायिक आधार पर बनाए गए हैं।
समान नागरिक संहिता(UCC ) का कुछ लोगों द्वारा इसे धार्मिक स्वतंत्रता और विविधता के लिए खतरा बताकर इसका विरोध किया जाता रहा है लेकिन कुछ लोग राष्ट्रीय अखंडता और लैंगिक न्याय के लिए समान नागरिक संहिता को अनिवार्य मान रहे हैं।
समान नागरिक संहिता एक धर्मनिरपेक्ष कानून है जैसा कि भारतीय संविधान की प्रस्तावना में “धर्मनिरपेक्ष राज्य” की बात कही गई है अतः एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के लिए UCC अनिवार्य है क्योंकि यह सभी धर्मों पर समान रूप से लागू होता है। वर्तमान में भारत में प्रत्येक धर्म के लोग अपने पर्सनल लॉ के अधीन विवाह, विवाह- विच्छेद, जमीन जायदाद आदि का बंटवारा करते हैं।हिंदू सिविल लॉ के तहत हिंदू, सिख, जैन और बौद्ध आते हैं, जबकि मुस्लिम पारसी और इसाई समुदाय के अपने पर्सनल लॉ हैं।

क्या है हिंदू पर्सनल लॉ (What is Hindu Personal Law) ?

भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा भारत में हिंदुओं के लिए हिंदू कोड बिल लाया गया लेकिन जब इसका विरोध होने लगा तो इस बिल को चार हिस्सों में बांट दिया गया।
1- हिंदू मैरिज एक्ट
2- हिंदू सकसेशन एक्ट
3- हिंदू एडॉप्शन एंड मेंटेनेंस एक्ट
4- हिंदू माइनॉरिटी एंड गार्जियनशिप एक्ट
इस कानून के तहत स्त्रियों को पति और पिता की संपत्ति में अधिकार मिलता है। इसके अतिरिक्त अंतरजातीय विवाह करने का भी अधिकार है, लेकिन एक पत्नी के रहते हुए कोई व्यक्ति दूसरी शादी नहीं कर सकता है।

क्या है मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (What is Muslim Personal Law Board) ?

मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत एक मुस्लिम पुरुष अपनी पत्नी को तीन बार तलाक कहकर तलाक दे सकता है। मुस्लिम पर्सनल लॉ के तलाक के और भी तरीके हैं, लेकिन तीन तलाक को भी तलाक माना जाता है तलाक के पश्चात यदि पत्नी फिर से विवाह करना चाहती है तो महिला को पहले किसी और पुरुष के साथ विवाह करके उसके साथ शारीरिक संबंध बनाना पड़ता है, जिसे हलाला कहा जाता है। और इस पुरुष से तलाक के बाद वह अपने पहले पति से विवाह कर सकती है।
मुस्लिम पर्सनल लॉ में स्त्रियों को पति से किसी भी प्रकार के गुजारे भत्ते या संपत्ति का अधिकार नहीं दिया गया है। बल्कि तलाक के बाद मेहर अदायगी का नियम है। तलाक लेने के बाद मुस्लिम महिला को इद्दत के निश्चित दिन गुजारने पड़ते हैं। जबकि मुस्लिम पुरुष तुरंत विवाह कर सकता है।

क्यों आवश्यक है समान नागरिक संहिता (Why is Uniform Civil Code Compulsory)

समान नागरिक संहिता(UCC )लागू हो जाने पर देश में एकता और अखंडता होगी। अलग-अलग धर्मों के अलग-अलग कानून के कारण न्यायपालिका की कार्यप्रणाली भी प्रभावित होती है। UCC लागू हो जाने पर अदालत में वर्षों से लंबित पड़े मामलों का जल्द निपटारा होगा और न्यायपालिका का बोझ कम होगा।
समान नागरिक संहिता(UCC )लागू होने से प्रत्येक धर्म के विवाह, विवाह- विच्छेद, गोद लेना और जायदाद के बंटवारे सबके लिए एक जैसा कानून होगा। जब कानून में समानता होगी तो देश में एकता होगी, और देश में नागरिकों में एकता होने पर किसी प्रकार का वैमनस्य नहीं होगा, और राष्ट्र विकास के पथ पर तेजी से अग्रसर होगा। समान नागरिक संहिता लागू हो जाने पर राजनीतिक दल वोट बैंक वाले राजनीति नहीं कर सकेंगे और वोटों का ध्रुवीकरण नहीं होगा।
विश्व के किसी भी देश में जाति या धर्म के आधार पर अलग कानून नहीं है लेकिन भारत में प्रत्येक धर्म के अपने मैरिज एक्ट हैं जिसके कारण सामाजिक असमानता है। इसलिए भारत को भी एक ऐसे कानून की आवश्यकता है जो प्रत्येक धर्म जाति संप्रदाय को एक ही प्रणाली में ले आए और वह कानून है समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code)।जब तक भारत के संविधान में यह सुधार नहीं होगा भारत के धर्मनिरपेक्ष होने का अर्थ ही स्पष्ट नहीं होगा।

समान नागरिक संहिता पर सर्वोच्च न्यायालय का रुख

समान नागरिक संहिता को लेकर सर्वोच्च न्यायालय ने भी अलग-अलग प्रकरणों पर अपना तर्क रखा है। सर्वोच्च न्यायालय के हिसाब से न्याय प्रक्रिया में समानता के लिए UCC अनिवार्य हैं। कुछ प्रकरण इस प्रकार है-

शाहबानो बनाम अहमद खान 1985
शाहबानो प्प्रकरण में सर्वोच्च न्यायालय ने मुस्लिम महिला के लिए इद्दत की समय सीमा समाप्त के बाद भी Crpc की धारा 125 के तहत अपने पति से भरण-पोषण का दावा करने के अधिकार की पुष्टि करते हुए यह माना की विचारधारा पर आधारित विरोधाभासो को दूर करने में समान नागरिक संहिता(UCC मदद करेगा।

सरला मुद्गल केस 1995

इस केस में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि “संविधान के अनुच्छेद 44 के अंतर्गत व्यक्त की गई संविधान निर्माताओं की इच्छा को पूरा करने में सरकार कितना समय लेगी? देश में समान नागरिक संहिता को अनिश्चितकाल के लिए निलंबित करने का कोई औचित्य नहीं है। धर्म के नाम पर मानवाधिकारों का गला घोटना में निर्दयता है। राष्ट्रीय एकता एवं अखंडता के लिए समान नागरिक संहिता नितांत आवश्यक है”

सायरा बानो केस 2017

     इस केस में सुप्रीम कोर्ट ने कहा “हम सरकार को निर्देशित करते हैं कि उचित कानून पर विचार करें। सुप्रीम कोर्ट ने तीन तलाक को असंवैधानिक और मुस्लिम महिलाओं की गरिमा एवं समानता का उल्लंघन करार देते हुए कहा कि ‘ संसद को मुस्लिम विवाह और तलाक को खारिज करने के लिए एक कानून का निर्माण करना चाहिए।

समान नागरिक संहिता के लाभ (Benefits of UCC)

  • समान नागरिक संहिता (UCC) राष्ट्रीय एकता और धर्मनिरपेक्षता को बढ़ावा देगी । यह सभी नागरिकों के बीच समान पहचान और अपनेपन की भावना पैदा करेगी जिससे पर्सनल लॉज के कारण उत्पन्न होने वाले सांप्रदायिक विवादों में कमी आएगी। यह सब के लिए समानता, बंधुत्व और गरिमा के संवैधानिक मूल्यों को संतुष्ट करेगा।
  • समान नागरिक संहिता महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव और उत्पीड़न को दूर करेगी जिससे लैंगिक न्याय और समानता सुनिश्चित होगी। इसके अंतर्गत मुस्लिम महिलाओं को सबसे अधिक फायदा होगा।
  • मुस्लिम महिलाओं के लिए UCC आने से शादी विवाह की उम्र समान हो जाएगी, क्योंकि मुसलमानों में लड़कियों की शादी की उम्र माहवारी की शुरुआत से मानी जाती है। यदि लड़की की माहवारी 9 वर्ष में आती है तो वह शादी के योग्य मानी जाती है UCC आने से मुस्लिम लड़कियों को शादी की उम्र भी समान हो जाएगी।
  • विवाह विच्छेद की प्रक्रिया भी समान हो जाएगी अभी तक मुस्लिम पुरुष तीन तलाक कह कर अपनी पत्नी को तलाक दे सकता था। लेकिन UCC आने के बाद मुस्लिमों का तलाक भी कोर्ट के आधार पर होगा।
  • अभी तक मुस्लिम औरतों को गुजारा भत्ता नहीं मिलता था लेकिन UCC आने के बाद गुजारा भत्ता मिलने लगेगा।
    *मुस्लिम महिला को गोद लेने का अधिकार मिल जाएगा।
    बच्चे की भरण पोषण का अधिकार मिल जाएगा।
    “अभी तक संपत्ति में मुस्लिम महिलाओं को समान अधिकार नहीं प्राप्त था UCC आने पर उन्हें संपत्ति में समान अधिकार मिलेगा।
  • मुस्लिमों में बहुविवाह प्रथा है UCC लागू होने पर एक पति एक पत्नी का नियम लागू होगा।
  • यूसीसी आने से हिंदुओं के लिए विवाह का रजिस्ट्रेशन अनिवार्य हो जाएगा।
  • क्रिश्चियन को UCC आने से दो फायदा होगा, विवाह का रजिस्ट्रेशन अनिवार्य होगा और कूलिंग पीरियड कम हो जाएगा, अर्थात क्रिश्चियन में जब तलाक के लिए अर्जी दी जाती है तो 2 वर्ष इंतजार करना पड़ता है। जबकि हिंदू में 6 महीने ही इंतजार करना पड़ता है। UCC लागू होने पर क्रिश्चियन को भी तलाक के लिए सिर्फ 6 महीने इंतजार करना पड़ेगा।
  • पारसी समुदाय को भी UCC से तीन फायदा होगा पहला विवाह का रजिस्ट्रेशन अनिवार्य होगा, कूलिंग पीरियड कम हो जाएगा। गैर पारसी विवाह के पश्चात संपत्ति का अधिकार समाप्त हो जाता है। लेकिन UCC के बाद संपत्ति का अधिकार समाप्त नहीं होगा।

समान नागरिक संहिता को लागू करने की राह में क्या है बाधाएं ( What are obstacles to apply Uniform Civil Code,)

व्यक्तिगत कानून एवं प्रथाएं
भारत एक विविध धार्मिक परंपराओं और संस्कृतियों का देश है। और प्रत्येक धर्म, समुदाय के अपने व्यक्तिगत कानून और रीति रिवाज है। यह कानून और प्रथाएं विभिन्न क्षेत्रों, संप्रदायों और समूहों में भिन्न-भिन्न है ।इस विविधता और असमानता के बीच एक समान आधार और एकरूपता को प्राप्त करना अत्यंत कठिन और जटिल है

राजनीतिक इच्छाशक्ति और सर्वसम्मति का अभाव

समान नागरिक संहिता(UCC,) लागू करने के लिए सरकार, विधायिका, न्यायपालिका और नागरिक समाज के बीच राजनीतिक इच्छाशक्ति और सर्वसम्मति अनिवार्य है लेकिन इस चीज का अभी अभाव है। ऐसी आशंका व्यक्त की जा रही है से समाज में सांप्रदायिक तनाव और संघर्ष भड़क सकता है

अल्पसंख्यक एवं धार्मिक समूहों का प्रतिरोध


समान नागरिक संहिता(Uniform Civil Code )को कई धार्मिक और अल्पसंख्यक समुदाय अपनी धार्मिक स्वतंत्रता एवं सांस्कृतिक स्वायत्तता के उल्लंघन के रूप में देख रहे हैं। उन्हें समान नागरिक संहिता से अपनी पहचान एवं विविधता की उपेक्षा का भय है। इसके लिए इन समुदायों द्वारा अनुच्छेद 25 का तर्क दिया जाता है अनुच्छेद 25 के अनुसार
“अंत:रण और धर्म के अबाध रूप से मानने, आचरण और प्रचार करने की स्वतंत्रता प्राप्त है।”अनुच्छेद 25 के अंतर्गत प्राप्त संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन करता है

व्यावहारिक कठिनाइयां


समान नागरिक संहिता लागू करने के लिए व्यापक कवायद की आवश्यकता होगी। जैसे विभिन्न पर्सनल लॉज का मसौदा तैयार करना। उन्हें संहिताबद्ध करना उनके बीच सामंजस्य लाना एवं उन्हें तर्कसंगत बनाना आता है। इसके लिए सभी धार्मिक नेताओं, कानूनी विशेषज्ञों, महिला संगठनों की व्यापक परामर्श और भागीदारी की आवश्यकता होगी। समान नागरिक संहिता(UCC )के अनुपालन और स्वीकृति को सुनिश्चित करने के लिए प्रवर्तन एवं जागरूकता फैलाने के लिए एक सुदृढ़ तंत्र की आवश्यकता होगी।

UCC पर किसने दायर की याचिका?

सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता और एक्टिविस्ट अश्विनी उपाध्याय ने सुप्रीम कोर्ट में समान नागरिक संहिता लागू किए जाने को लेकर याचिका दायर की थी ।उनका कहना है कि किसी भी धर्मनिरपेक्ष देश में धार्मिक आधार पर अलग-अलग कानून नहीं होते हैं। देश एक संविधान से चलता है। एक ऐसा कानून जो सभी धर्मों और संप्रदायों पर एक समान लागू हो ।अतः समान नागरिक संहिता अनिवार्य तौर पर लागू होनी चाहिए।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 29(1) सभी नागरिकों की विशिष्ट संस्कृति का संरक्षण करता है। हमारा संविधान सांस्कृतिक स्वायत्तता के अधिकार की पुष्टि करता है। अतः समुदायों को यह विचार करने की आवश्यकता है कि मनमाने ढंग से एकतरफा तलाक और बहुविवाह जैसी प्रथाएं सांस्कृतिक मूल्यों के अनुरूप है या नहीं ।आत: समान नागरिक संहिता लाना आवश्यक है ।जिससे समानता और न्याय स्थापित हो