Lok Sabha Election 2024 Updates: पंजाब में शिरोमणि अकाली दल के साथ चुनाव नहीं लड़ेगी भाजपा, टूट गया 27 वर्ष पुराना गठबंधन

Lok Sabha Election 2024 Updates: पंजाब में शिरोमणि अकाली दल के साथ चुनाव नहीं लड़ेगी भाजपा, टूट गया 27 वर्ष पुराना गठबंधन

भाजपा और शिरोमणि अकाली दल के पंजाब में अलग-अलग लोकसभा चुनाव लड़ने पर पंजाब में सियासी तस्वीर पूरी तरह बदलने वाली है। दोनों दलों में गठबंधन लगभग निश्चित माना जा रहा था लेकिन अकाली दल ने जो शर्तें रखी हैं उनको भाजपा किसी सूरत में नहीं मान सकती। अभी तक अकाली दल बिना शर्त भाजपा को समर्थन देता आया था लेकिन 24 वर्षों के बाद अकाली दल ने शर्त के साथ ही समझौता करने का फैसला लिया है।

पंजाब में भाजपा लोकसभा चुनाव अकेले लड़ने की तैयारी में है। मंगलवार को भाजपा प्रदेश अध्यक्ष सुनील जाखड़ ने एक वीडियो जारी किया जिसमें उन्होंने कहा कि अकाली दल के साथ चुनाव लड़ने का फैसला पार्टी हाई कमान ने प्रदेश इकाई, पार्टी नेताओं, कार्यकर्ताओं और प्रदेश की जनता की राय लेते हुए किया है।

भाजपा शिरोमणि अकाली दल के बीच गठबंधन की सभी अटकलें पर विराम लगाते हुए भाजपा के पंजाब प्रधान सुनील जाखड़ ने कहा है कि बीजेपी पंजाब की सभी 13 सीटों पर चुनाव लड़ेगी। जाखड़ ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी ने जिस तरह पंजाब के लिए बीते वर्षों में कार्य किए हैं उसके आधार पर हम जनता के बीच उतरेंगे।

शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल ने सुनील जाखड़ के बयान के बाद मंगलवार को अमृतसर में पार्टी का रुख साफ कर ट्वीट करते हुए कहा – “हमारी पार्टी उच्च सिद्धांतों पर कायम है और पंत और पंजाब की सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध है। पंजाब में गठबंधन न करके हम सभी सीटों पर अकेले ही चुनाव मैदान में उतरेंगे।

कब आए थे भाजपा- शिरोमणि अकाली दल साथ ?

एनडीए गठबंधन में शिरोमणि अकाली दल वह पहली पार्टी थी जिसने भाजपा के साथ गठबंधन किया था। 1996 में अकाली दल ने ‘मोगा डेक्लेरेशन’ पर साइन किया था। इससे पूर्व 1992 तक भाजपा और अकाली दल अलग-अलग चुनाव लड़ते थे और चुनाव के बाद अकाली दल भाजपा को समर्थन देता था।

क्या है ‘मोगा डेक्लेरेशन’ ?

1996 में अकाली दल ने मोगा डिक्लेरेशन पर साइन किया और 1997 में पहली बार अकाली दल और भाजपा ने साथ में चुनाव लड़ा था। तब से इनका साथ बरकरार था। ‘मोगा डेक्लेरेशन में तीन बातों पर जोर दिया गया था। पहली पंजाबी पहचान, दूसरा आपसी सौहार्द्र और तीसरा राष्ट्रीय सुरक्षा शामिल था। 1984 के दंगों के बाद आपसी सौहार्द्र का माहौल खराब होने के कारण दोनों पार्टियां साथ आई थी।

दोनो पार्टियों के साथ आने का एक कारण यह है कि अकाली दल अपने सिख वोट बैंक के साथ अकेले सत्ता में आने की स्थिति में नहीं था। ऐसे में अकाली दल ऐसी पार्टी की तलाश में था जो उनके वोट बैंक को बढ़ाए ना कि छीने। ऐसे में अकाली दल के पास एकमात्र विकल्प बीजेपी ही था। कांग्रेस उनके लिए गठबंधन का विकल्प नहीं हो सकती थी। यही वजह है की शहरी व ग्रामीण वोटरों का ऐसा तालमेल बना कि अकाली दल और भाजपा की सरकार 1997, 2007 और 2012 में पंजाब में बनी।

क्यों टूटा 27 वर्ष पुराना संबंध ?

अकाली दल और भाजपा की 27 साल पुराना गठबंधन कृषि कानून के खिलाफ किसानों के आंदोलन के बाद टूट गया और इसके बाद के पंजाब विधानसभा चुनाव में अकाली दल और भाजपा दो दो सीटों पर सिमट गई। अकाली दल पंजाब में अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है तो वहीं बीजेपी पंजाब में अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए संघर्ष कर रही है।