हिरोशिमा दिवस (Hiroshima Day) : मानवीय बर्बरता का रिकॉर्ड तोड़ने वाला परमाणु हमला

6 अगस्त को हिरोशिमा दिवस के रूप में जाना जाता है। आज से 78 वर्ष पहले दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान 6 अगस्त 1945 को अमेरिका ने जापान के हिरोशिमा शहर पर ‘ लिटिल बॉय’ नामक यूरेनियम बम गिराया था। हिरोशिमा कि 3:30 लाख की आबादी में आधे लोग लगभग 1,40,000 लोग एक झटके में हीं मारे गए थे। इस बम ने13 वर्ग किलोमीटर में तबाही मचाई थी। मारे गए लोगों में ज्यादातर साधारण नागरिक बूढ़े बच्चे तथा स्त्रियां थी। सभी सैनिक ही नहीं थी।
इस हमले का प्रभाव अनेक वर्षों तक रहा अनगिनत लोग विकिरण के प्रभाव से मरते रहे लेकिन अमेरिका की कार्यवाही इस भयावह विनाश के बाद भी नहीं रुकी और इस अमानवीय विनाश के 3 दिन बाद ही 9 अगस्त को ‘ फैट मैन’ नामक प्लूटोनियम बम नागासाकी पर गिराया गया। इस हमले में भी विस्फोट और गर्मी से अनुमान: 75000 लोग मारे गए, जिसमें अधिकांश साधारण नागरिक थे।

Hiroshima Day 2023_Janpanchayat hidni Blogs

6 अगस्त को हिरोशिमा दिवस के रूप में जाना जाता है। आज से 78 वर्ष पहले दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान 6 अगस्त 1945 को अमेरिका ने जापान के हिरोशिमा शहर पर ‘ लिटिल बॉय’ नामक यूरेनियम बम गिराया था। हिरोशिमा कि 3:30 लाख की आबादी में आधे लोग लगभग 1,40,000 लोग एक झटके में हीं मारे गए थे। इस बम ने13 वर्ग किलोमीटर में तबाही मचाई थी। मारे गए लोगों में ज्यादातर साधारण नागरिक बूढ़े बच्चे तथा स्त्रियां थी। सभी सैनिक ही नहीं थी।
इस हमले का प्रभाव अनेक वर्षों तक रहा अनगिनत लोग विकिरण के प्रभाव से मरते रहे लेकिन अमेरिका की कार्यवाही इस भयावह विनाश के बाद भी नहीं रुकी और इस अमानवीय विनाश के 3 दिन बाद ही 9 अगस्त को ‘ फैट मैन’ नामक प्लूटोनियम बम नागासाकी पर गिराया गया। इस हमले में भी विस्फोट और गर्मी से अनुमान: 75000 लोग मारे गए, जिसमें अधिकांश साधारण नागरिक थे।

हिरोशिमा दिवस का इतिहास (History Of Hiroshima Day)

द्वितीय विश्व युद्ध के समय विश्व दो भागों में बांटा था, मित्र राष्ट्र और धुरी राष्ट्र। द्वितीय विश्व युद्ध के समय सामूहिक पूर्ण युद्ध का स्वरूप प्रचलन में आया। इस युद्ध में हिस्सा लेने वाले समस्त देश ने अपनी आर्थिक, औद्योगिक तथा वैज्ञानिक क्षमता इस युद्ध में झोंक दी थी। इस युद्ध में विश्व के विभिन्न राष्ट्रों के अनुमत: 10 करोड़ सैनिकों ने भाग लिया। यह युद्ध मानव इतिहास का सबसे विनाशकारी युद्ध था।
सत्ता, शक्ति, साधन, संपन्नता, अहंकार और महत्वाकांक्षा की अधिकता इतनी घातक हो सकती है, अमेरिका और जापान के दो प्रमुख नगर हिरोशिमा नागासाकी इसका ज्वलंत उदाहरण है। हिरोशिमा(Hiroshima )विश्व का पहला ऐसा शहर है जो महा शक्तियों की महत्वाकांक्षा का शिकार बना।
हिरोशिमा 6 अगस्त 1945 तक जापान के एक औद्योगिक नगर के रूप में जाना जाता था। दितीय विश्व युद्ध के दौरान हिरोशिमा में जापानी सेना की पांचवी डिवीजन का मुख्यालय तथा सैनिक छावनी थी और यह सैनिक आपूर्ति मार्ग का अहम पड़ाव था। द्वितीय विश्व युद्ध के प्रारंभ से 6 अगस्त तक इस नगर पर अमेरिका ने इसलिए बम नहीं गिराया, जिससे अणु बम से होने वाले नुकसान का सटीक आकलन किया जा सके।

अमेरिका की कार्यवाही

6 अगस्त 1945 को कमांडर कर्नल पॉल टीबेट्स के नेतृत्व में अमेरिकी सेवा के विमान एनोला गे(बी 29 )ने दक्षिणी प्रशांत की वायु सैनिक अड्डे टिनियन से दो अन्य b-29 विमानों के साथ उड़ान भरी। इस विमान का नाम पायलट पाल टिइबेट्स की मां के नाम पर रखा गया था। इन विमानों में एक का नाम ‘ ग्रेट आर्टिस्ट’था जिसे मेजर चार्ज स्वीनी उड़ा रहे थे और जो अणु बम का प्रभाव नापने वाले यंत्रों, उपकरणों से सुसज्जित था। एक दूसरे विमान का नाम ‘नेसेसरी इविल’ रखा गया जिसमें विश्व को अणु बम की संहारक क्षमता और अमेरिकी शक्ति के साक्ष्य जुटाने के लिए उच्च क्षमता के कैमरे लगे हुए थे, जिसके पायलट कैप्टन जॉर्ज मैक्वार्ड थे। इन तीनों विमानों ने टिनीयन से उड़ान भरने के बाद इवोजिमा होते हुए जापान की वायु सीमा में प्रवेश किया। विमान उस वक्त 8000 फीट की ऊंचाई पर उड़ रहे थे। लेकिन हिरोशिमा के पास पहुंचने पर विमान की ऊंचाई 32,300 फीट हो गई। जल सेना के कैप्टन विलियम पार्सन्स द्वारा उड़ान के दौरान ‘ लिटिलबॉय’ को विमान में फिट किया और उनके सहायक सेकंड लेफ्टिनेंट टिनेंट मॉरिस जैप्सन ने लक्ष्य पर पहुंचने के 30 मिनट पूर्व उस अणु बमपर लगे सुरक्षा उपकरणों को हटाकर उसको सक्रिय किया।

हीरोशिमा पर हमला (Attack on Hiroshima )

हिरोशिमा के राडार चालक ने हमले के 1 घंटे पूर्व दक्षिण जापान की ओर बढ़ रहे इन अमेरिकी विमानों को देखकर संभावित हवाई हमले की रेडियो से चेतावनी दे दी थी। लेकिन 8:00 बजे हिरोशिमा के रडार चालक ने जब सिर्फ तीन विमान देखे तो उसको लगा कि यह टोही विमान है। हमले की कोई आशंका नहीं है और यही सोच कर जापान ने अमेरिकी जहाजों पर प्रतिरोधी हमारी आक्रमण नहीं किया और स्थानीय समय के अनुसार 8:15 बजे बम गिराया गया।
60 किलोग्राम यूरेनियम- 235 वाला ‘ लिटिल बॉय’ नामक अणु बम हवा के विपरीत बहाव के कारण अपने निर्धारित लक्ष्य ‘ इयोई ब्रिज’ से करीब 800 फीट दूर ‘ शीमा सर्जिकल क्लीनिक’ के ऊपर फटा। इस बम को हवाई जहाज से फेंके जाने के बाद शहर से लगभग 2,000 फीट की फटने की ऊंचाई तक पहुंचने में 57 सेकंड का समय लगा। इस आक्रमण के बाद जो धमाका हुआ इसके परिणाम स्वरूप 1.6 किलोमीटर का इलाका पूरी तरह ध्वस्त हो गया। 11 वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र आग की लपटों में घिर कर जल गया। जापानी अधिकारियों के अनुसार हिरोशिमा नगर की 69% इमारतें पूर्णतया नष्ट हो गई थी। 6 से 7% भवनों को आंशिक क्षति पहुंची लेकिन इतने बड़े विनाश के पश्चात भी अमेरिकी वैज्ञानिकों के लिए यू-235 नाकाम रहा।
6 अगस्त के हमले के पश्चात 7 से 9 अगस्त के बीच जापान समर्पण की तैयारी कर रहा था। जापान के सम्राट हिरोहीतो और उनके युद्ध सलाहकार समिति समर्पण के स्वरूप और शर्तों पर विचार कर ही रही थी। लेकिन अमेरिका को विश्व में अपनी धाक जमानी थी और अपने एक और बम का परीक्षण कर उसके प्रभाव का सही आकलन करना था। अतः जापान समर्पण करने की तैयारी में है यह जानते हुए भी अमेरिका ने 9 अगस्त को दक्षिणी जापान के बंदरगाह नगर नागासाकी पर बम गिराया। ‘ फैट मैन’ नाम का यह दूसरा बम 6.4 किलो प्लूटोनियम- 239 का था जो 11:01 पर नागासाकी पर गिराया गया। जमीन से 1,540 फीट की ऊंचाई पर 47 मिनट बाद यह बम फटा। जिससे 21 किलोटन टी. एन. टी. के बराबर धमाका हुआ ।इस धमाके में 3,900 डिग्री सेल्सियस की उष्मा उत्पन्न हुई। हवा की गति 1005 किलोमीटर प्रति घंटे तक पहुंच गई। इस हमले में मरने वालों की संख्या 40,000 से 75,000 के बीच थी जो 1945 के अंत तक 80,000 तक जा पहुंची थी।

जापान का समर्पण

जापान पर तीसरा परमाणु हमला 17 या 18 अगस्त को होना था लेकिन लेकिन जापान के सम्राट स्थिति को तुरंत संभालना चाहते थे, क्योंकि सोवियत संघ ने जापान के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी।अंततःजापान ने 14 अगस्त को समर्पण कर दिया। यद्यपि युद्ध का अंतिम चरण तो जर्मनी की पराजय के साथ मई मेंप्रारंभ हो गया था किंतु जापान के समर्पण के साथ विश्व इतिहास के सर्वाधिक निर्मम आक्रमण और सर्वाधिक संहारक अस्त्र के परीक्षण का पटाक्षेप हुआ।
इस परमाणु हमले ने मानवीय बर्बरता के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए थे बच्चों और औरतों की हजारों लाशे शहरों की बर्बादी ने मानवता को कलंकित कर दिया था। इस बर्बरता को कभी भी उचित नहीं ठहराया जा सकता है। इस मामले पर अटल बिहारी वाजपेई की कविता स्मरणीय
मेरी नींद अचानक उचट जाती है
आंख खुल जाती है
मैं सोचने लगता हूं कि
जिन वैज्ञानिकों ने अणु अस्त्रों का
आविष्कार किया था
वे हिरोशिमा नागासाकी के भीषण
नरसंहार के समाचार सुनकर
रात को कैसे सोए होंगे ?
क्या उन्हें एक क्षण के लिए सही
यह अनुभूति नहीं हुई कि
उनके हाथों जो कुछ हुआ
अच्छा नहीं हुआ
यदि हुई, तो वक्त उन्हें कटघरे में खड़ा नहीं करेगा
किंतु यदि नहीं हुई तो इतिहास उन्हें
कभी माफ नहीं करेगा।”

   इस त्रासदी को घटित हुए 78 वर्ष बीत चुके हैं लेकिन जापान का यह हिस्सा आज भी उस आक्रमण से प्रभावित है। यहां उत्पन्न हो रही संतानों पर आज भी इस परमाणु हमले का दुष्प्रभाव देखा जा सकता है। वास्तविकता तो यह है कि इस परमाणु हमले के पीछे अमेरिका का उद्देश्य विश्व में स्वयं को सर्वोपरि सिद्ध करना था।

      इस परमाणु हमले से 6 माह पूर्व तक अमेरिका ने जापान के 67 शहरों पर भीषण बमबारी की थी। जापान की हार तो उसी समय सुनिश्चित हो गई थी। जापान का पलड़ा कमजोर हो गया था। लेकिन अमेरिका ने जानबूझकर परमाणु बम का प्रयोग किया क्योंकि वह रूस को बताना चाहता था कि युद्ध के बाद दुनिया के भाग्य का निर्णायक अमेरिका ही बनेगा। अपने इस महत्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए अमेरिका ने लाखों निरीह और निर्दोष जापानी नागरिकों के जीवन की बलि ले ली।

  यह दुर्भाग्य ही है कि इतने बड़े महाविनाश के पश्चात भी आज विश्व के छोटे बड़े देश अपनी भूखी नंगी जनता की आवश्यकताओं की कीमत पर परमाणु अस्त्रों के संग्रह में लगे हैं। नागासाकी हिरोशिमा पर प्रयोग किए गए बम की क्षमता मात्र 12 से 15 किलोटन थी लेकिन आज तो 50 से 100 किलो टन की क्षमता के आधुनिक तकनीक के बम हैं। यदि फिर से ऐसी घटना की पुनरावृत्ति होती है, अर्थात यदि तृतीय विश्व युद्ध होता है तो बस रिमोट का एक बटन दबाने की आवश्यकता होगी और संपूर्ण विश्व तबाह हो जाएगा।