June 25, 2024

Vaisakhi 2023 : वैशाखी पर्व का इतिहास एवं इससे जुड़े विशेष तथ्य

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वैशाखी सिक्खो का प्रमुख त्योहार है। यह भारत के पंजाब राज्य में सिख समुदाय द्वारा बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। वैशाखी पर्व पर गेहूं की कटाई शुरू हो जाती है। गेहूं की फसल देखकर किसानों का मन नाचने लगता है। पंजाबी किसान के लिए गेहूं की फसल सोना होती है। वैशाखी के अवसर पर देश-विदेश विशेषकर पंजाब में मेला लगता है। वैशाखी पर्व को अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग नामों से मनाया जाता है। जैसे दक्षिण में यह पर्व ‘ बिशु’, केरल, तमिलनाडु, असम में ‘बिहू ‘ और बंगाल में ‘पैला (पीला)बैशाख’ के नाम से मनाया जाता है।

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 वैशाखी सिक्खो का प्रमुख त्योहार है। यह भारत के पंजाब राज्य में सिख समुदाय द्वारा बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। वैशाखी पर्व पर गेहूं की कटाई शुरू हो जाती है। गेहूं की फसल देखकर किसानों का मन नाचने लगता है। पंजाबी किसान के लिए गेहूं की फसल सोना होती है। वैशाखी के अवसर पर देश-विदेश विशेषकर पंजाब में मेला लगता है। वैशाखी पर्व को अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग नामों से मनाया जाता है। जैसे दक्षिण में यह पर्व ‘ बिशु’, केरल, तमिलनाडु, असम में ‘बिहू ‘ और बंगाल में ‘पैला (पीला)बैशाख’ के नाम से मनाया जाता है।

कब मनाया जाता है बैसाखी का पर्व ?

 बैसाखी का पर्व सूर्य तिथि के अनुसार मनाया जाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार सिक्खों के गुरु गोविंद सिंह ने वैशाख माह की षष्ठी तिथि के दिन खालसा पंथ की स्थापना की थी और इसी दिन मकर संक्रांति भी थी। प्राय: 13 या 14 अप्रैल को सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता है। इसलिए वैशाखी 13 या 14 अप्रैल को मनाई जाती है।

वैशाखी पर्व का क्या है इतिहास ?

 गुरु गोविंद सिंह ने 1699 ई. में बैसाखी पर्व को विशेष गौरव देने के उद्देश्य से उसी दिन श्री आनंदपुर साहिब में विशेष समागम किया। देशभर की संगत ने इस ऐतिहासिक अवसर पर अपना सहयोग दिया। गुरु गोविंद सिंह ने संगत को ललकार कर कहा-
“देश को गुलामी से आजाद करने के लिए मुझे एक शीश चाहिए”।
गुरु गोविंद सिंह की ललकार सुनकर पांच वीर अपना शीश भेंट करने को तैयार हो गए। दया सिंह खत्री, धर्म सिंह जट, मोहकम सिंह छींवा, साहिब सिंह और हिम्मत सिंह ने अपने शीश गुरु गोविंद सिंह जी को भेंट कर दिया। इन्हीं पांच सिंहो को गुरु साहिब के ‘पंच प्यारे’ कहा जाता है। गुरु गोविंद सिंह ने इनको अमृत पान करवा कर इनसे अमृत पान किया। इस प्रकार 1699 ईस्वी में वैशाखी के अवसर पर खालसा पंथ का जन्म हुआ। इसी खालसा पंथ ने मुगल साम्राज्य के विरुद्ध संघर्ष किया और उत्तर भारत में मुगल साम्राज्य को समाप्त कर दिया।
बैसाखी का त्यौहार बलिदान का भी त्यौहार है। 1699 ई. को वैशाखी पर्व से लेकर आज भी प्रत्येक वर्ष वैशाखी देश की सुरक्षा के लिए भी प्रेरित करती आई है। गुरु गोविंद सिंह ने खालसा पंथ की स्थापना उस समय में की थी जब मुगल शासक औरंगजेब ने अत्याचार, अन्याय और जुल्म की हद पार करते हुए दिल्ली के चांदनी चौक पर श्री गुरु तेग बहादुर सिंह जी को शहीद कर दिया था।
1919 में वह 13 अप्रैल का ही दिन था जब अमृतसर के जलियांवाला बाग में वैशाखी के पवित्र अवसर पर देश के सैकड़ों लोग देश की आजादी के लिए जनरल डायर के सैनिकों के समक्ष नि:शस्त्र सीना ताने खड़े रहे और शहीद हो गए।

वैशाखी कैसे मनाई जाती है ?

 वैशाखी पर्व फसल कटने की खुशी में मनाया जाता है। वैशाखी पर्व पर किसान का घर फसल से भर जाता है। वैशाखी पर्व की खुशी मनाने के लिए ढोल बजाए जाते हैं। बूढ़े, बच्चे जवान सभी भांगड़ा करते हैं।
वैशाखी के पर्व पर पंजाब में सबसे बड़ा मेला लगता है। यह पर्व पंजाबियों का एक कौमी जश्न है। इस दिन लोग घर में हो या जंग में, देश में हो या परदेस में वैशाखी के नाम पर ही लोगों के तन थिरकने लगते हैं। भांगड़ा होने लगता है। वैशाखी पर्व पर लोग रंग-बिरंगे नए कपड़े पहनते हैं और खुशियां मनाते हैं। वैशाखी का पर्व एक नए उत्साह का संचार करता है।
ढोल पंजाबियों का सदैव से साथी रहा है। तभी तो आज भी फसल की कटाई के समय ढोल बजने लगता है। ढोल की धुन पर लोग भांगड़ा और गिद्दा नित्य करने लगते हैं। पहले के जमाने में आक्रमणकारियों को होशियार करने के लिए ढोल बजाए जाते थे गुरु गोविंद सिंह ने दुश्मनों से लोगों को होशियार करने के लिए नगाड़ा बनवाया था।

कब मनाया जाता है बैसाखी का पर्व ?

 बैसाखी का पर्व सूर्य तिथि के अनुसार मनाया जाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार सिक्खों के गुरु गोविंद सिंह ने वैशाख माह की षष्ठी तिथि के दिन खालसा पंथ की स्थापना की थी और इसी दिन मकर संक्रांति भी थी। प्राय: 13 या 14 अप्रैल को सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता है। इसलिए वैशाखी 13 या 14 अप्रैल को मनाई जाती है।

वैशाखी से जुड़े कुछ विशेष तथ्य

  •  वैशाखी पर्व पर श्रद्धालु अरदास के लिए गुरुद्वारे में जाते हैं। जहां खालसा पंथ की नींव रखी गई थी
    वहां (आनंदपुर साहिब) में विशेष अरदास और पूजा होती है।
  • गुरु ग्रंथ साहब को दूध और जल से प्रतीक रूप से स्नान करवाकर तख्त पर प्रतिष्ठित किया जाता है। इसके बाद पंचबानी का गायन पंच प्यारे द्वारा किया जाता है।
  • पंच प्यारों और गुरु गोविंद सिंह के सम्मान में पूरे दिन शबद और कीर्तन गाए जाते हैं। गुरु साहब को कड़ा प्रसाद का भोग लगाया जाता है। इस दिन लंगर का भी आयोजन किया जाता है जिसमें सभी भक्त। गुरु जी के लंगर में भोजन ग्रहण करते हैं और अपनी सेवा देते हैं
  • वैशाखी के दिन रात्रि के समय आग जलाकर उसके चारों तरफ इकट्ठा होकर नई फसल की खुशियां मनाई जाती है। नया अन्न अग्निदेव को समर्पित किया जाता है। इस दिन पंजाबियों का परंपरागत नृत्य भांगड़ा और गिद्दा किया जाता है।
  •  वैशाखी के दिन ही जलियांवाला बाग नरसंहार में शहीद हुए लोगों को श्रद्धांजलि भी दी जाती है।