Ambedkar Jayanti 2023 : भारतीय संविधान के जनक एवं दलितों के मसीहा, बाबा भीमराव अंबेडकर जयंती पर विशेष

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बाबा भीमराव अंबेडकर एक ऐसे व्यक्ति थे। जिसका संपूर्ण जीवन दलितों के लिए संघर्ष के लिए जाना जाता है। भीमराव अंबेडकर एक बौद्ध पुनरुत्थानवादी एवं एक बहुजन राजनीतिक नेता थे। भीमराव अंबेडकर को बाबासाहेब के नाम से भी जाना जाता है। अंबेडकर ने अपना संपूर्ण जीवन हिंदू धर्म चतुर्वर्ण प्रणाली और भारतीय समाज में सर्वत्र व्याप्त जाति व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष में व्यतीत कर दिया। अंबेडकर को बौद्ध महा शक्तियों के दलित आंदोलन को प्रारंभ करने का श्रेय भी जाता है। देश की अमूल्य सेवा एवं अपने महत्वपूर्ण उपलब्धियों के कारण ही अंबेडकर को ‘आधुनिक युग का मनु’ कह कर सम्मानित किया। डॉक्टर अंबेडकर को भारत के सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार भारत रत्न से भी सम्मानित किया जा चुका है।

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बाबा भीमराव अंबेडकर (Baba Bhim Rao Ambedkar)एक ऐसे व्यक्ति थे। जिसका संपूर्ण जीवन दलितों के लिए संघर्ष के लिए जाना जाता है। भीमराव अंबेडकर (Bhim Rao Ambedkar) एक बौद्ध पुनरुत्थानवादी एवं एक बहुजन राजनीतिक नेता थे। भीमराव अंबेडकर को बाबासाहेब के नाम से भी जाना जाता है। अंबेडकर ने अपना संपूर्ण जीवन हिंदू धर्म चतुर्वर्ण प्रणाली और भारतीय समाज में सर्वत्र व्याप्त जाति व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष में व्यतीत कर दिया। अंबेडकर (Ambedkar) को बौद्ध महा शक्तियों के दलित आंदोलन को प्रारंभ करने का श्रेय भी जाता है। देश की अमूल्य सेवा एवं अपने महत्वपूर्ण उपलब्धियों के कारण ही अंबेडकर को ‘आधुनिक युग का मनु’ कह कर सम्मानित किया। डॉक्टर अंबेडकर को भारत के सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार भारत रत्न से भी सम्मानित किया जा चुका है।
आइए जानते हैं इस महान पुरुष के जीवन के विषय में-

डॉक्टर अंबेडकर का जीवन परिचय

डॉक्टर भीमराव अंबेडकर (Dr. Bhimrao Ambedkar) का जन्म 14 अप्रैल 1891 में महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले के अंबावडे नगर के एक मराठी परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम रामजी मालोजी सकपाल और माता का नाम भीमाबाई मुरबादकर था। वे अपने माता-पिता की 14वीं एवं अंतिम संतान थे। अंबेडकर एक अछूत जाति महार से संबंध रखते थे। समकालीन राजनीतिज्ञों की तुलना में उनकी जीवन अवधि कुछ कम थी लेकिन इस कम अवधि में भी उन्होंने लेखन अध्ययन भाषण और संगठन के अनेक कार्य किए जिसका प्रभाव उस समय की एवं बाद की राजनीति पर भी स्पष्ट दिखाई देता है। अंबेडकर जी के पिता ने मराठी और अंग्रेजी में औपचारिक शिक्षा की डिग्री प्राप्त की थी और कुछ समय तक एक फौजी स्कूल में अध्यापक भी रहे। इसलिए वह शिक्षा का महत्व समझते थे और भीमराव की शिक्षा पर पूरा ध्यान दिया।

भीमराव अंबेडकर की शिक्षा

भीमराव को अपने स्कूली जीवन में अपमानजनक स्थितियों का सामना करना पड़ा क्योंकि वह एक अछूत समझे जाने वाली जाति के थे लेकिन इन विकट परिस्थितियों का उन्होंने धैर्य और वीरता से सामना किया और स्कूली शिक्षा समाप्त की। कॉलेज की पढ़ाई के प्रारंभ में ही उनके पिता के हाथ तंग हो गए और पैसे की कमी होने लगी। तब एक मित्र के सहयोग से बड़ौदा के शासक गायकवाड ने उनके लिए स्कॉलरशिप की व्यवस्था कर दी और इस प्रकार भीमराव ने अपने कॉलेज की पढ़ाई पूरी की। 1912 में एलफिंस्टन कॉलेज से वे ग्रेजुएट हुए।

गायकवाड स्कॉलरशिप के सहारे भीमराव ने अमेरिका के कोलंबिया विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र में एम.ए. में प्रवेश लिया। इसी समय अंबेडकर, प्रसिद्ध अमेरिकी अर्थशास्त्री, सेलिगमैन के प्रभाव में आए और इन्हीं के मार्गदर्शन में 1917 में कोलंबिया विश्वविद्यालय से पी.एच.डी. की उपाधि प्राप्त की थी। पी. एच.डी. में उनके शोध का विषय ‘ नेशनल डेवलपमेंट फॉर इंडिया; ए हिस्टोरिकल एंड एनालिटिकल स्टडी था। 1917 में ही उन्होंने लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स में प्रवेश किया लेकिन अपनी शिक्षा पूरी नहीं कर पाए और भारत आकर बड़ौदा राज के मिलिट्री सेक्रेटरी रहे और कुछ दिनों बाद वे बड़ौदा से मुंबई आकर मुंबई के सिडेनहैम कॉलेज में राजनीतिक अर्थशास्त्र के प्रोफेसर भी रहे। कुछ समय बाद लंदन जाकर लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स से अपनी अधूरी पढ़ाई पूरी की।
अनेक विकट परिस्थितियों का सामना करते हुए उन्होंने अपनी लगन और कठोर परिश्रम से एम. ए., पी.एच.डी., एम.एस.सी., बार- एट -लॉ की डिग्रियां प्राप्त की। बाबासाहेब अपने समय के सर्वाधिक पढ़े-लिखे राजनेता एवं विचारक थे। दलितों एवं अछूतों के प्रति उनकी गहरी सहानुभूति थी।

भीमराव अंबेडकर का राजनीतिक जीवन

डॉ.अंबेडकर (Dr. Ambedkar) विधानसभा के सदस्य के लिए 1926 में नामित किए गए और निर्वाचित भी हुए। येओला नासिक में उन्होंने 13 अक्टूबर 1935 को एक रैली को संबोधित संबोधित किया। 1936 में अंबेडकर ने स्वतंत्र लेबर पार्टी की स्थापना की।इस पार्टी ने 1937 के केंद्रीय विधानसभा चुनाव में 15 सीटें जीती। इसी वर्ष उन्होंने अपने न्यूयॉर्क में लिखे एक शोध पत्र पर आधारित पुस्तक ‘ जाति के विनाश’ भी प्रकाशित की। इस पुस्तक में अंबेडकर ने हिंदू धार्मिक नेताओं और जाति व्यवस्था की जमकर आलोचना की। अस्पृश्य समुदाय के लोगों को गांधी जी द्वारा रचित शब्द हरिजन पुकारने के कांग्रेस के फैसले की कड़ी निंदा की।
1941 और 45 के बीच में उन्होंने अत्यधिक विवादास्पद पुस्तकें और पर्चे भी प्रकाशित किएजिसमें ‘ थॉट्स ऑन पाकिस्तान’ भी शामिल है। उन्होंने एक अलग देश पाकिस्तान के मांग की आलोचना की।

‘ What Congress and Gandhi have done to the untouchables( कांग्रेस और गांधी जी ने अछूतों के लिए क्या किया)’ के जरिए उन्होंने गांधी और कांग्रेस दोनों को कटघरे में खड़ा कर दिया और उन पर ढोंग करने का आरोप लगाया। उन्होंने अपनी पुस्तक ‘ Who were the Shudras’ (शूद्र कौन थे) के द्वारा शूद्रों के अस्तित्व में आने की व्याख्या की। अंबेडकर भारत विभाजन के तो पक्षधर थे लेकिन मुस्लिम समाज में व्याप्त बाल विवाह प्रथा और महिलाओं के प्रति होने वाले दुर्व्यवहार के घोर निंदक थे। उन्होंने कहा कि मुस्लिम समाज में हिंदू समाज से भी अधिक सामाजिक बुराइयां हैं।
डॉ.अंबेडकर मोहम्मद अली जिन्ना और मुस्लिम लीग की विभाजनकारी सांप्रदायिक रणनीति के घोर आलोचक थे लेकिन फिर भी उनका तर्क था कि पाकिस्तान का गठन इसलिए आवश्यक है जिससे एक ही देश का नेतृत्व करने के लिए जातीय राष्ट्रवाद के चलते देश के भीतर और अधिक हिंसा न पनपे।

महात्मा गांधी और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के उग्र आलोचक

अंबेडकर महात्मा गांधी और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के तीव्र आलोचक थे। डॉक्टर अंबेडकर (Dr. Ambedkar) गांधी के विपरीत भारत और दलितों का भविष्य गांव की अपेक्षा नगरो एवं ग्रामीण शिल्पो या कृषि व्यवस्था की तुलना में पश्चिमी समाज के औद्योगिक विकास में देखते थे।1932 में ग्राम पंचायत बिल पर मुंबई की विधानसभा में बोलते हुए अंबेडकर ने कहा-
“बहुतों ने ग्राम पंचायतों की प्राचीन व्यवस्था की बहुत प्रशंसा की है। कुछ लोगों ने उन्हे ग्रामीण प्रजातंत्र कहा है। इन देहाती प्रजातंत्रो का गुण जो भी हो। मुझे यह कहने में जरा भी दुविधा नहीं है कि यह भारत में सार्वजनिक जीवन के लिए अभिशाप है। यदि भारत राष्ट्रवाद उत्पन्न करने में सफल नहीं हुआ, यदि भारत राष्ट्रीय भावनाओं के निर्माण में सफल नहीं हुआ तो इसका मुख्य कारण मेरी समझ में ग्राम व्यवस्था का अस्तित्व है।”

गांधीजी ने अस्पृश्यो को हरिजन कहकर पुकारा जिसे अंबेडकर ने सिरे से अस्वीकार कर दिया था।

अंबेडकर का छुआछूत के विरुद्ध संघर्ष

संपूर्ण भारत में दलित जाति के लोगों के लिए उनके मंदिरों में प्रवेश निषेध एवं इस तरह के अन्य प्रतिबंधों के विरुद्ध अनेक आंदोलन का सूत्रपात डॉ. अंबेडकर ने किया परंतु विदेशी शासन काल में अस्पृश्यता विरोधी संघर्ष पूरी तरह से सफल नहीं हो पाया।
1950 के संविधान द्वारा ही अंतिम रूप से अस्पृश्यता कोअवैध घोषित किया गया। 1920 के दशक में एक बार मुंबई में बोलते हुए उन्होंने साफ शब्दों में कहा था-

“जहां मेरे व्यक्तिगत हित और देश हित में टकराव होगा वहां में देश हित को प्राथमिकता दूंगा ,लेकिन जहां दलित जातियों के हित और देश के हित में टकराव होगा वहां में दलित जातियों को प्राथमिकता दूंगा।”

बाबासाहेब (Bhim Rao Ambedkar) ने जीवन पर्यंत अछूतोद्धार के लिए कार्य किया। अंतिम समय तक वे दलितों के मसीहा थे। अंबेडकर ने मंदिरों, स्कूलों में अछूतों के प्रवेश करने के अधिकार को लेकर भी संघर्ष किया। लंदन के गोलमेज सम्मेलन के शिष्टमंडल का सदस्य रहते हुए उन्होंने अछूतों के लिए अलग निर्वाचन मंडल की मांग की जिसका महात्मा गांधी ने हिंदू समाज में विभाजक मानते हुए विरोध किया।

भारतीय संविधान के निर्माता के रूप में

 सन 1947 में स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात अंबेडकर भारत जवाहरलाल नेहरु के मंत्रिमंडल में कानून मंत्री बने। भारतीय संविधान के प्रारूप समिति के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई भारत के संविधान के निर्माण में उनकी प्रमुख भूमिका थी। वह संविधान के विशेषज्ञ थे। उन्होंने अनेक देशों के संविधनों का अध्ययन किया था और भारतीय संविधान का मुख्य निर्माता उन्हीं को माना जाता है। भारतीय संविधान की रूपरेखा में प्रमुख भूमिका निभाते हुए अंबेडकर ने अछूतों के साथ भेदभाव को प्रतिबंधित किया और चतुराई से इसे संविधान सभा द्वारा पारित कराया। सरकार में अपनी महत्ता को कम होता देख उन्होंने 1951 में त्यागपत्र दे दिया। नागपुर के एक समारोह में सन 1956 में 2 हजार साथियों के साथ अंबेडकर ने हिंदू धर्म त्याग कर बौद्ध धर्म अपना लिया क्योंकि हिंदू धर्म से अभी भी छुआछूत समाप्त नहीं हुआ था।
अंबेडकर के इतने प्रयासों के बावजूद आज भी जाति प्रथा हमारे बीच जीवित है जो समाज और देश दोनों के लिए हानिकारक है।

डॉ. अंबेडकर की रचनावली

 बाबासाहेब ने दर्शन, इतिहास, राजनीति ,आर्थिक विकास आदि समस्याओं पर विचार किए। उनका लेखन केवल शूद्रों के लिए नहीं अपितु पूरे देश के लिए भी महत्वपूर्ण था। अंग्रेजी में उनकी ‘रचनावली’ ‘ डॉक्टर बाबासाहेब आंबेडकर राइटिंग एंड स्पीचेज’ के नाम से महाराष्ट्र सरकार ने प्रकाशित की। वही भारत सरकार ने हिंदी में उनकी रचनावली ‘ बाबासाहेब अंबेडकर संपूर्ण वांग्मय’ के नाम से प्रकाशित की।

भीमराव अंबेडकर की मृत्यु

भीमराव अंबेडकर (Dr. Bhimrao Ambedkar) 1948 में ही मधुमेह से पीड़ित हो गए थे। जून से अक्टूबर 1954 तक वे बहुत बीमार रहे। 1955 के दौरान उनके द्वारा लगातार काम किया जाना उनके स्वास्थ्य के लिए हानिकारक सिद्ध हुआ और राजनीतिक मुद्दों से परेशान डॉ.अंबेडकर का स्वास्थ से बदतर होता चला गया।
अपनी अंतिम पांडुलिपि बुद्ध और उनके धम्म को पूरा करने के 3 दिन बाद 6 दिसंबर 1956 को दलितों का यह मसीहा सदैव के लिए मृत्यु की निद्रा में चला गया। इनका अंतिम संस्कार चौपाटी समुद्र तट पर बौद्ध शैली के अनुसार हुआ।

मरणोपरांत भारत रत्न से सम्मानित

डॉक्टर भीमराव अंबेडकर (Dr. Bhimrao Ambedkar) को 1990 में मरणोपरांत भारत के सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार भारत रत्न से सम्मानित किया गया।
डॉक्टर अंबेडकर (Dr. Ambedkar) एक अर्थशास्त्री, धर्म और दर्शन के विद्वान, विधि विशेषज्ञ एवं इतिहास विवेचक थे। उनके लेखन में दिए गए सूत्रों के आधार पर इतिहास को हम पूंजीवादी विवेचको के दुष्प्रभाव से मुक्त कर सकते हैं। अंबेडकर द्वारा दिए गए तथ्यों से प्रमाणित होता है कि अंग्रेजों ने जाति बिरादरी की प्रथा को और कठोर बनाया। अंग्रेजों ने यहां का व्यापार नष्ट किय
यदि इंग्लैंड किसी तरह व्यापार में भारत से स्पर्धा नहीं कर सकता था, तो यह क्रांतिकारी स्थापना अंबेडकर की ही थी जिसकी वजह से भारत सामान तैयार करने वाले देश के रूप में इंग्लैंड से बढ़कर था।

डॉक्टर भीमराव अंबेडकर ने अपने अनुयायियों को संदेश दिया था-
शिक्षित बनो !!! संगठित रहो!!! संघर्ष करो!!!