एक देश, एक चुनाव(One Nation One Election) : चुनाव सुधार की दिशा में क्रांतिकारी कदम

One Nation One Election (एक देश, एक चुनाव): एक देश एक चुनाव का विचार इस पर आधारित है कि लोकसभा और सभी राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव एक साथ हों।वर्तमान में लोकसभा यानी आम चुनाव और विधानसभा चुनाव 5 वर्षों के अंतराल पर होते हैं।एक देश एक चुनाव नई धारणा नहीं है। आजाद भारत के पहले चार आम चुनाव ऐसे ही हुए थे।

क्या है “एक देश, एक चुनाव” का विचार? कहां से हुई इसकी शुरुआत? विश्व के किन-किन देशों में होते हैं एक साथ चुनाव? क्या है इस कदम के फायदे? और क्या है इसकी राह में चुनौतियां?आइए जानते हैं।

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ONE NATION, ONE ELECTION (एक देश, एक चुनाव)

देश में एक साथ एक चुनाव कराए जाने की मांग हो रही है। जिसके लिए गंभीर प्रयास भी किये जा रहे हैं लेकिन यह मांग पहली बार नहीं उठ रही है। संविधान लागू होने के 16 वर्षों तक लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराए जाते थे। लेकिन अलग-अलग कारणों से कुछ राज्यों में राजनीतिक अस्थिरता के कारण एक साथ चुनाव कराने का यह क्रम टूट गया। 1883 में पहली बार एक साथ चुनाव कराने की मांग उठी। चुनाव आयोग ने एक साथ चुनाव कराने का विचार रखा। आयोग ने अपनी पहली वार्षिक रिपोर्ट में सात प्रमुख कारण बताते हुए लोकसभा और विधानसभा के लिए एक साथ चुनाव कराने के लिए सिफारिश रखी। इसके बाद भी समय-समय पर अलग-अलग मंचों से देश में एक साथ चुनाव कराने की मांग उठती रही है।
क्या है “एक देश, एक चुनाव” का विचार? कहां से हुई इसकी शुरुआत? विश्व के किन-किन देशों में होते हैं एक साथ चुनाव? क्या है इस कदम के फायदे? और क्या है इसकी राह में चुनौतियां?आइए जानते हैं।

क्या है एक देश एक चुनाव (What is One Nation One Election) ?

एक देश एक चुनाव का विचार इस पर आधारित है कि लोकसभा और सभी राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव एक साथ हों।वर्तमान में लोकसभा यानी आम चुनाव और विधानसभा चुनाव 5 वर्षों के अंतराल पर होते हैं।एक देश एक चुनाव नई धारणा नहीं है। आजाद भारत के पहले चार आम चुनाव ऐसे ही हुए थे।
एक देश एक चुनाव की बहस हाल के समय में 2015 में विधि आयोग के एक मसौदा रिपोर्ट के बाद शुरू हुई। इस रिपोर्ट में एक साथ चुनाव के पक्ष में आर्थिक वजहों समेत कई कारणों को गिनाया गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 2014 में सत्ता में आने के बाद से ही लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ करने पर जोर देते रहे हैं। और अब सरकार ने इसमें एक कदम और आगे बढ़ते हुए ‘ एक देश एक चुनाव’ की संभावनाएं तलाशने के लिए पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया है।

एक देश एक चुनाव के लिए समिति(Committee for One Nation One Election)

एक देश और एक चुनाव की दिशा में एक कदम आगे बढ़ते हुए पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में कमेटी गठित कर दी गई है।
इस समिति में अध्यक्ष होंगे पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद। इनके अतिरिक्त समिति के सदस्यों में गृह मंत्री अमित शाह, लोकसभा में कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी, 15 वें वित्त आयोग के पूर्व अध्यक्ष एनके सिंह। लोकसभा के पूर्व महासचिव सुभाष कश्यप, वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे, पूर्व मुख्य सतर्कता आयुक्त संजय कोठारी समिति के सदस्य हैं।
केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल विशेष आमंत्रित के तौर पर समिति की बैठक में शामिल होंगे। इस उच्च स्तरीय समिति का सचिव विधि कार्य विभाग के सचिव को बनाया गया है।हालांकि कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी ने समिति का सदस्य बनने से इनकार कर दिया है।

समिति के कार्य(Work of Committee)

  • समिति को भारत के संविधान और अन्य कानूनी उपबंधों के अधीन मौजूद ढांचे को ध्यान में रखते हुए लोकसभा, विधानसभाओं, नगर पालिकाओं और पंचायतो के साथ-साथ निर्वाचन आयोजित करने की पड़ताल करना और सिफारिश करना शामिल है।
  • समिति इसके लिए संविधान लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम और इनसे जुड़े नियमों और किसी अन्य कानून को जिनमे साथ-साथ निर्वाचन आयोजित करने के प्रयोजन के लिए संशोधन की अपेक्षा होगी उसे पर विचार करना और संशोधन करने के लिए सिफारिश करेगी।
  • अगर संविधान के संशोधन राज्यों के समर्थन की अपेक्षा हों तो उस पर विचार और सिफारिश करना, त्रिशंकु सदन, अविश्वास प्रस्ताव को स्वीकार करने या दल बदल या ऐसी किसी अन्य घटना के कारण साथ-साथ निर्वाचनों के परिदृश्य में संभव समाधान के लिए विश्लेषण और सिफारिश करने का कार्य भी समिति करेगी।
  • चुनाव को साथ-साथ कराने के लिए फ्रेमवर्क का सुझाव देना और अगर उन्हें साथ-साथ आयोजित नहीं किया जा सकता है तो चरणों और समय सीमा जिसमें निर्वाचनों को साथ-साथ आयोजित किया जा सकता है उसका भी सुझाव देना होगा और संविधान और अन्य विधियों में संबद्ध में किन्ही संशोधनों का भी सुझाव देना समिति के कार्यों में शामिल है। साथ ही ऐसे नियमों का प्रस्ताव करना जो ऐसी परिस्थितियों के अपेक्षित हो।
  • साथ साथ चुनाव निर्वाचनों के चक्र के निरंतरता को सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक सुरक्षा उपायों की सिफारिश करना, संविधान में आवश्यक संशोधनों की सिफारिश करना भी समिति के कार्यों में शामिल है। इसके अलावा साथ-साथ चुनाव आयोजित करने के लिए अपेक्षित लॉजिस्टिक और जनशक्ति की जांच करना जिसमें EVM और VVPAT शामिल है।
  • समिति के कार्यों में सभी चुनाव मतदाताओं की पहचान करने के लिए एकल निर्वाचक नामावली और निर्वाचन पहचान पत्रों के उपयोग की जांच करना और इसके तरीकों के सिफारिश करना भी शामिल है।

देश में पहले भी एक देश एक चुनाव (One Nation One Election)की संभावनाएं तलाशने का प्रयास हुआ है ।न्यायमूर्ति बीपी जीवन रेड्डी की अध्यक्षता वाली विधि आयोग ने 1999 में अपनी 170वी रिपोर्ट में कहा था,
“प्रत्येक वर्ष चुनाव के चक्र को समाप्त किया जाना चाहिए। हमें उस स्थिति में वापस जाना चाहिए जहां लोकसभा और सभी विधानसभाओं के चुनाव एक साथ करने का प्रयास हों।”

एक देश एक चुनाव की चुनौतियां(Challenges of One Nation One Election)

वर्ष 2015 15 में डॉक्टर ए एम सुदर्शन नचिअप्पन की अध्यक्षता में कार्मिक लोक शिकायत कानून और न्याय के लिए संसदीय स्थाई समिति बनाई गई जिसमें लोकसभा और राज्यविधान सभाओं में एक साथ चुनाव कराने की व्यवहारिकता पर अपनी रिपोर्ट सामने रखी। समिति ने इस मुद्दे पर निर्वाचन आयोग की तरफ से दिए गए सुझाव का हवाला दिया। समिति ने एक साथ चुनाव को लेकर कई चुनौतियों की ओर ध्यान आकर्षित किया है जो इस प्रकार हैं।

  • एक साथ चुनाव के संचालन के लिए भारी खर्च
  • लंबे समय तक चुनाव आदर्श आचार संहिता लागू होने से नीतियों के अमल में देरी
  • आवश्यक सेवाओं की आपूर्ति पर प्रभाव
  • एक साथ चुनाव के लिए करने होंगे संशोधन।

एक साथ चुनाव कराना सस्ता और व्यावहारिक विकल्प है लेकिन इसके लिए संविधान में कई बदलाव करने पड़ेंगे।
इन संशोधनों में लोकसभा का कार्यकाल तय करने वाले और राज्यसभा सदस्यों का कार्यकाल तय करने वाले अनुच्छेद 83 का संशोधन शामिल है।
अनुच्छेद 83 के अलावा संसदीय सत्र को स्थगित करने वाले और खत्म करने वाले अनुच्छेद 85, विधानसभा का कार्यकाल निर्धारित करने वाले अनुच्छेद 172 और विधानसभा सत्र को स्थगित और खत्म करने वाले अनुच्छेद 174 में संशोधन आवश्यक है। इसके साथ ही राष्ट्रपति शासन लगाने के प्रावधान वाले अनुच्छेद 356 में भी संशोधन आवश्यक है।
इन संशोधनाे के लिए सदन में दो तिहाई बहुमत आवश्यक है। इसके साथ ही इस बात पर भी राजनीतिक सहमति बनाना आवश्यक है कि सभी विधानसभाये या तो समय से पहले भंग की जाएं।
जिन विधानसभाओं का समय पूरा हो जाए उनके यहां तय अवधि से आगे चुनाव रोके रखने के लिए संवैधानिक प्रावधान आवश्यक है।

एक देश एक चुनाव के फायदे (Advantage of One Nation One Election)

एक देश एक चुनाव के कई फायदे हैं जैसे –

  • एक साथ एक चुनाव कराने से न सिर्फ मतदाताओं का उत्साह बना रहेगा बल्कि इससे धन की भी बचत होगी जिससे प्रशासनिक प्रयासों की पुनरावृत्ति से बचा जा सकेगा।
  • राजनीतिक दलों के खर्चों पर नियंत्रण लगेगा।
  • चुनाव में काला धन खपाने जैसी समस्या पर लगाम लगेगी।
  • बार-बार चुनाव आचार संहिता लगने की जरूरत नहीं होगी।
  • इससे जनहित से जुड़े काम प्रभावित नहीं होंगे।
  • सरकारी अधिकारियों कर्मचारियों और शिक्षकों की बार-बार चुनावी ड्यूटी नहीं लगानी पड़ेगी जिससे बच्चों की पढ़ाई और प्रशासनिक कार्य प्रभावित नहीं होंगे।
  • सरकारी मशीनरी की कार्य क्षमता बढ़ेगी और इसका सबसे अधिक फायदा आम जनता को होगा।

वर्ष 2018 में विधि आयोग ने एक साथ चुनाव पर अपनी मसौदा रिपोर्ट जारी की। इसमें एक साथ चुनाव संबंधी कानूनी और संवैधानिक मुद्दों पर गौर किया गया। आयोग का सुझाव था कि इसके लिए संविधान और विभिन्न कानूनों में संशोधन करके इसे लागू किया जा सकता है। आयोग का मानना था कि एक साथ चुनाव कराने से सार्वजनिक धन की बचत होगी सुरक्षा बलों और प्रशासनिक ढांचे पर बोझ कम होगा। सरकारी नीतियों का त्वरित कार्यान्वयन सुनिश्चित होगा और यह सुनिश्चित होगा कि प्रशासनिक मशीनरी चुनाव प्रचार के बजाय विकास गतिविधियों में लगी रहे।

बार- बार चुनाव के कारण बढ़ता है आर्थिक बोझ

देश में पहले आम चुनाव 1952 में हुए थे जिन्हें जिन्हें सफलतापूर्वक संपन्न कराने में चुनाव आयोग ने आधिकारिक रूप से करीब साढे 10 करोड रुपए खर्च किए थे। जबकि 2014 में जारी लोकसभा चुनाव के लिए चुनाव आयोग को लगभग 5000 करोड रुपए खर्च करने पड़े। 2019 में राजनीतिक दलों ने चुनावी खर्च के पिछले सभी रिकॉर्ड तोड़ दिए 2019 के लोकसभा चुनाव में करीब 55000 करोड रुपए खर्च किए गए। जिसके बाद चुनाव खर्च के मामले में दुनिया भर के देशों में सभी रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए।। यह खर्च 2016 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव से भी अधिक था।
वर्ष 2019 में हुए लोकसभा चुनाव में बीजेपी और अधिक प्रचंड बहुमत से सत्ता में आई और नरेंद्र मोदी दोबारा प्रधानमंत्री बने इस चुनाव को लेकर मीडिया स्टडी रिपोर्ट के अनुसार चुनाव खर्च पिछले 20 वर्ष में 1998 से लेकर 2019 तक 900 करोड़ से करीब 6 गुना बढ़कर 55000 करोड रुपए हो गया।
महंगे चुनाव का बोझ न सिर्फ सरकारी खजाने पर बल्कि राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों पर भी पड़ता जा रहा है। इसके अतिरिक्त बार-बार चुनाव कराने से सरकार का सामान्य काम काज ठहर जाता है।

कैसे टूटा एक देश एक चुनाव का क्रम

संवैधानिक प्रावधानों के मुताबिक जिन सरकारों को सदन में बहुमत हासिल नहीं है या जिन राज्यों में संवैधानिक मशीनरी चरमरा जाए वहां सदन समय से पहले भंग किया जा सकता है। सदन भंग होने पर 6 महीने के भीतर दोबारा चुनाव आवश्यक है। यही से शुरू होता है अलग-अलग राज्यों में चुनाव के आगे पीछे होने का सिलसिला।

आजाद भारत के पहले चार आम चुनाव ऐसे ही हुए थे, 1952, 1957, 1962, 1967 में देश के सभी चुनाव एक साथ हुए थे। यह क्रम तब टूटा जब 1968 और 1969 में कुछ राज्यों की विधानसभाएं अलग-अलग कारणों से समय से पहले भंग कर दी गई। इस बीच केंद्र में कई बार अल्पमत की सरकार बनी। 1971 में लोकसभा चुनाव भी समय से पहले हो गए। इसके चलते विधानसभा और लोकसभा चुनाव के बीच फासला बढ़ता गया। कई विधानसभायें अलग-अलग समय पर भंग हुई। इसलिए उनके कार्य कल का समय भी एक समान नहीं रहा और इस प्रकार एक देश एक चुनाव का क्रम टूट गया।

क्यों आवश्यक है चुनाव सुधार(Why is Election Reform Requirement)

देश में चुनाव सुधारो को लेकर समय-समय पर मांगे उठाती रही हैं। इस पर बहस और चर्चाएं भी होती रही हैं। इन्हीं सुधारो को लेकर ‘ एक देश एक चुनाव’ (One Nation One Election) का मुद्दा बार-बार उठाता रहा है। प्रत्येक 5 वर्ष पर होने वाले लोकसभा चुनाव के अलावा सभी विधानसभाओं के चुनाव और उपचुनाव जोड़ लिए जाए तो औसतन प्रत्येक महीने देश के किसी ने किसी हिस्से में चुनाव होता रहता है। यह सभी चुनाव देश के स्वस्थ लोकतंत्र को दर्शाते हैं लेकिन इन चुनावों को संपन्न कराने के लिए संसाधन समय और धन बड़ी मात्रा में खर्च होता है। और जब सभी विधानसभाओं का कार्यकाल 5 वर्ष है और लोकसभा का भी कार्यकाल 5 वर्ष है तो यह सब चुनाव साथ क्यों नहीं हो सकते हैं।
देश की जनसंख्या बढ़ने के साथ-साथ तकनीक और अन्य संसाधनों का भी विकास हुआ है। इसलिए एक देश एक चुनाव (One Nation One Election )की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता देश को इस चुनाव के चक्रव्यूह से निकालने के लिए एक व्यापक चुनाव सुधार अभियान चलाने की आवश्यकता है।

इसके तहत जनप्रतिनिधित्व कानून में सुधार काले धन पर रोक,
राजनीति में बढ़ते अपराधीकरण पर रोक, लोगों में राजनीतिक जागरूकता पैदा करना शामिल है। जिससे समावेशी लोकतंत्र की स्थापना की जा सके।

विश्व के किन देशों में होते हैं एक साथ एक चुनाव

विश्व के कई ऐसे देश हैं जहां एक देश एक चुनाव (One Nation One Election)की व्यवस्था है। जर्मनी, हंगरी, स्पेन, पोलैंड, इंडोनेशिया, बेल्जियम, दक्षिण अफ्रीका, स्नोवालिया और अल्बानिया जैसे देशों में एक देश एक चुनाव की व्यवस्था है। हाल ही में इस सूची में स्वीडन शामिल हुआ है जहां एक साथ सभी चुनाव कराए जाते हैं।