बाबा भीमराव अंबेडकर के 67 वें महापरिनिर्वाण दिवस पर जानिए उनके जीवन के आखिरी दो दिनों के बारे में: Dr. Bhimrao Ambedkar Jayanti

Ambedkar jayanti: भारतीय संविधान के जनक डॉक्टर भीमराव अंबेडकर की 67वी पुण्यतिथि 6 दिसंबर को मनाई जा रही है।उनकी पुण्यतिथि को देशभर में ‘महापरिनिर्वाण दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। डॉक्टर अंबेडकर एक समाज सुधारक, विधिवेत्ता, अर्थशास्त्री, लेखक, बहुभाषाविद, मुखर वक्ता, विद्वान और धर्म के विचारक थे।वह एक बहुजन राजनीतिक नेता और एक बौद्ध पुनरुत्थानवादी भी थे। उन्होंने अपने जीवन के अंतिम दिनों में बौद्ध धर्म अपना लिया था।

Dr. Bhimrao Ambedkar Jayanti

भारतीय संविधान के जनक डॉक्टर भीमराव अंबेडकर (Dr. Bhimrao Ramji Ambedkar)की 67वी पुण्यतिथि 6 दिसंबर को मनाई जा रही है।उनकी पुण्यतिथि को देशभर में ‘महापरिनिर्वाण दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। डॉक्टर अंबेडकर एक समाज सुधारक, विधिवेत्ता, अर्थशास्त्री, लेखक, बहुभाषाविद, मुखर वक्ता, विद्वान और धर्म के विचारक थे।वह एक बहुजन राजनीतिक नेता और एक बौद्ध पुनरुत्थानवादी भी थे। उन्होंने अपने जीवन के अंतिम दिनों में बौद्ध धर्म अपना लिया था।

Ambedkar ने अपना संपूर्ण जीवन हिंदू धर्म की चतुवर्ण प्रणाली और भारतीय समाज में सर्वत्र व्याप्त जाति व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष में समर्पित कर दिया। बौद्ध महा शक्तियों के दलित आंदोलन को प्रारंभ करने का श्रेय भी डॉक्टर अंबेडकर को जाता है। “दलितों का मसीहा” कहे जाने वाले बाबा अंबेडकर ने 6 दिसंबर 1956 को आखिरी सांस ली थी।

इसीलिए 6 दिसंबर को उनकी पुण्यतिथि को महापरिनिर्वाण दिवस के रूप में मनाया जाता है। आइए जानते हैं बाबा साहेब के परिनिर्वाण दिवस पर ,महापरिनिर्वाण क्या है तथा बाबा साहब के जीवन के आखिरी दिन के विषय में-

क्या है महापरिनिर्वाण दिवस ?

परिनिर्वाण को बौद्ध धर्म के लक्ष्यों के साथ-साथ एक प्रमुख सिद्धांत भी माना जाता है। परिनिर्वाण एक संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ है,मृत्यु के पश्चात मुक्ति अथवा मोक्ष। भगवान बुद्ध की मृत्यु को बौद्ध ग्रंथ “महापरिनिब्बाण सूक्त” के अनुसार मूल महापरिनिर्वाण कहा जाता है।

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बाबा साहब के जीवन के आखिरी दो दिन

बाबा भीमराव अंबेडकर (Bhimrao Ambedkar) की जीवन यात्रा बहुत ही संघर्षमय और कष्टमय रही। एक तरफ जहां बचपन में उन्हें दलित होने का अभिशाप झेलना पड़ा, वहीं अपने संपूर्ण जीवन यात्रा में वे कई बीमारियों से जूझते रहे। बाबासाहेब ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, न्यूराइटिस और आर्थराइटिस जैसी लाइलाज बीमारियों से पीड़ित थे। 6 दिसंबर 1956 को सुबह सोते वक्त ही उनका प्रणांत हो गया था। अपने जीवन के अंतिम समय में किन सार्वजनिक कार्यक्रम में शामिल हुए आईए जानते हैं-

4 दिसंबर को था उनका संसद का आखिरी दौरा

नवंबर के अंतिम तीन सप्ताह के दौरान बाबा साहब दिल्ली से बाहर थे। 14 नवंबर को काठमांडू में हुए धर्म सम्मेलन में बाबासाहेब शामिल हुए थे। इस सम्मेलन का उद्घाटन नेपाल के राजा महेंद्र ने किया था और बाबा साहब को राजा ने मंच पर अपने पास बैठने को कहा था। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था। यह बौद्ध धर्म में बाबा साहब के कद को दर्शाता है। भीमराव अंबेडकर की पत्नी सविता अंबेडकर थीं,जिन्हें माईसाहेब अंबेडकर के नाम से भी जाना जाता है।

माई साहेब ने अपनी जीवनी “डॉक्टर अंबेडकरांच्या सहवासात” में लिखा है कि, नवंबर के आखिरी 3 हफ्तों में बाबा साहब ने बौद्ध धर्म के तीर्थ स्थलों, महात्मा बुद्ध के जन्म स्थल लुंबिनी, पटना में अशोक की मशहूर लाट,और बोधगया का दौरा भी किया। इन यात्राओं के बाद 30 नवंबर को जब वह दिल्ली लौटे तो बहुत थक चुके थे।

उसी समय दिल्ली में संसद का शीतकालीन सत्र शुरू हो चुका था, लेकिन अस्वस्थ होने के कारण बाबा साहब इस सत्र में शामिल नहीं हो पा रहे थे। 4 दिसंबर को राज्यसभा के कार्यवाही में भाग लेने की बाबा साहेब की जिद पर डॉक्टर मालवंकर ने बाबा की सेहत जांचने के बाद उन्हें राज्यसभा की कार्यवाही में हिस्सा लेने की इजाजत दे दी।इस प्रकार 4 दिसंबर को राज्यसभा की कार्यवाही में हिस्सा लेने के बाद बाबा साहेब दोपहर बाद घर लौट आए। यह बाबा साहेब द्वारा संसद का आखिरी दौरा था।

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16 दिसंबर को शामिल होना था धर्म परिवर्तन समारोह में

16 दिसंबर 1956 को मुंबई में एक धर्म परिवर्तन समारोह के आयोजन में बाबा साहब और माई साहब दोनों को शामिल होना था। बाबा साहब ने अपनी खराब सेहत के कारण अपने सचिव नानक चंद रत्तू से 14 दिसंबर को मुंबई जाने की टिकट के बारे में पूछा और नानक चंद रत्तू से कहा कि वह विमान से उनके मुंबई जाने की व्यवस्था करें, जिससे वे मुंबई में होने वाले धर्म परिवर्तन के समरोह में शामिल हो सकें। इसके पश्चात बाबा साहब नानक चंद रत्तू को बोलकर काफी देर तक लिखवाते रहे और रात 11:30 बजे सोने चले गए।

भीमराव अंबेडकर का हमसाया थे नानक चंद रत्तू

नानक चंद रत्तू, जो कि काम की तलाश में पंजाब के होशियारपुर जिले से दिल्ली आए थे, वहां उनकी मुलाकात भीमराव अंबेडकर से हुई। 1940 में नानक चंद रत्तू ने बाबासाहेब के सचिव के तौर पर कार्य करना शुरू किया और 6 दिसंबर 1956 अर्थात बाबा साहब के जीवन के अंतिम क्षणों तक वे सचिव के रूप में उनके साये की तरह साथ रहे। नानक चंद, बाबा साहेब के लेखों को टाइप करने में मदद करते थे। नानक चंद ने बाबा साहब की याद में दो किताबें भी लिखी थी।

बाबा साहेब की जीवन का आखिरी दिन

अपने निधन से एक दिन पूर्व बाबा साहेब 5 दिसंबर की सुबह 7:30 बजे सो कर उठे। माई साहब और बाबा साहब दोनों ने मिलकर चाय पी। दफ्तर जाने के लिए तैयार नानक चंद रत्तू भी वहां आ गए उन्होंने भी चाय पी। माई साहेब ने बाबा साहेब के दैनिक कार्यों को निपटने में मदद की और डॉक्टर मालवंकर और बाबा साहब के साथ मिलकर नाश्ता किया। इसके पश्चात् माई साहेब ने बाबा साहब को दवाएं दी और अपनी रसोई का काम निपटाने लगीं।

5 दिसंबर को लंच के बाद जब बाबासाहेब सोने चले गए तब माई साहेब खरीदारी करने चली गई क्योंकि वे बाजार उसी समय जाती थी जब या तो बाबा साहब सो रहे होते थे या संसद चले जाते थे। डॉक्टर मालवंकर भी माई साहेब के साथ खरीदारी करने बाजार चले गए।

जब बाबा साहब को आया गुस्सा

दोपहर 2:30 बजे माई साहेब बाजार गईं और शाम करीब 5:30 बजे पर वापस लौटीं, लेकिन जब वे वापस लौटी तो बाबा साहब बेहद गुस्से में थे। माई साहब ने अपनी जीवनी ‘ डॉक्टर अंबेडकरांच्या सहवासात’ में लिखा है कि, यदि बाबा साहेब की कोई किताब अपनी जगह पर नहीं मिलती थी या कलम कहीं और होती थी तो बाबा साहब आग बबूला हो जाते थे। यदि उनकी उम्मीद के मुताबिक कोई काम ना हुआ या उनकी इच्छा के विरुद्ध छोटा सा काम भी हुआ तो उनका गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच जाता था।

बाबा साहेब का गुस्सा तूफान की तरह था जितनी तेजी से आता था उतनी ही जल्दी शांत हो जाता था। माई साहब ने बाजार से लौटकर बाबा साहेब का गुस्सा शांत किया और उनके लिए कॉफी बनाने लगीं।

रात 8:00 बजे जैन पुजारियो का एक प्रतिनिधिमंडल और उनके प्रतिनिधि बाबा साहब से मिलने आने वाले थे। प्रतिनिधि मंडल के कुछ सदस्यों और बाबा साहेब के बीच बंगले के लिविंग रूप में बौद्ध धर्म और जैन धर्म को लेकर बातचीत हुई। वह प्रतिनिधि प्रतिनिधिमंडल 6 दिसंबर को होने वाले जैन सम्मेलन में बाबा साहब को शामिल करना चाहता था।

प्रतिनिधिमंडल चाहता था कि बाबा साहब उस सम्मेलन में शामिल होकर जैन भिक्षुओं से बहस करें जिससे जैन और बौद्ध धर्म के बीच एकता कायम हो सके।बाबा साहब में जैन धर्म के प्रतिनिधिमंडल से कहां कि वे 6 दिसंबर के लिए उनके सचिव से शाम का समय ले लें।
इसके पश्चात बाबा साहब ने “बुद्धं शरणं गच्छामि” का पाठ शुरू कर दिया। बाबा साहब जब बहुत प्रसन्न रहते थे तो वह बुद्ध वंदना और कबीर के दोहे पढ़ा करते थे। इसके पश्चात बाबा साहब ने रात के खाने में थोड़ा सा खाना खाया। उनके खाने के बाद माई साहेब ने खाना खाया। माई साहेब के खाना खत्म होने तक बाबा साहेब इंतजार करते रहे। इसके बाद उन्होंने कबीर का दोहा,“ चलो कबीर तेरा भवसागर डेरा” बड़े लय में गाया और छड़ी के सहारे बेडरूम की तरफ चल पड़े।

5 दिसंबर की रात बाबा साहब ने “द बुद्ध एंड हिज धम्मा” की

प्रस्तावना में फिर से बदलाव किया। इसके बाद एस.एम. जोशी और आचार्य प्रहलाद केशव अत्रे के अलावा ब्राह्मी सरकार के नाम लिखी चिट्ठियों पर एक नजर डाली। इसके बाद 11:30 बजे ही वे सोने चले गए, जबकि रोज बाबा साहब देर रात तक पढ़ते, लिखते रहते थे।

बाबा साहेब का महापरिनिर्वाण

किसी को क्या पता था कि संघर्ष के पथ का यह मुसाफिर अब अपनी आखिरी मंजिल तक पहुंचने को बेताब है। किसी को क्या मालूम था कि 5 दिसंबर की रात “दलितों के मसीहा” बाबा साहब के जीवन की अंतिम रात होगी।

6 दिसंबर को जब सूर्योदय हुआ उस समय बाबा साहब के जीवन का सूर्य अस्त हो चुका था। 6 दिसंबर 1956 को जब माई साहेब चाय की ट्रे लेकर बाबा साहब के कमरे में उन्हें जगाने गई उस समय सुबह के 7:30 बज रहे थे। माई साहब ने बाबा साहब को तीन बार आवाज दी लेकिन उनके शरीर में कोई हलचल नहीं हुई। उन्हें लगा वह गहरी नींद में सो रहे हैं लेकिन माई साहेब को क्या पता था कि बाबा साहेब गहरी नींद नहीं अपितु चिर निद्रा में चले गए थे।

उस वक्त बंगले में सिर्फ दो लोग थे, माई साहेब और उनके सहायक सुदामा। माई साहेब ने डॉक्टर मालवंकर को फोन किया और उनसे पूछा कि उन्हें क्या करना चाहिए। डॉक्टर मालवंकर ने बाबा साहेब को ‘कोरामाइन’ का इंजेक्शन देने को कहा लेकिन इसके लिए बहुत देर हो चुकी थी। बाबा साहेब की मृत्यु को कई घंटे बीत गए थे। ऐसे में यह इंजेक्शन देने का कोई फायदा नहीं था इसके बाद नानक चंद रत्तू भी आ गए। उन लोगों ने बाबा साहेब के वदन की मालिश करनी शुरू कर दी। कोई मुंह से सांस देने की कोशिश करने लगा लेकिन जब शरीर में प्राण ही नहीं तो कोई तरकीब कहां से काम करेगी। बाबा साहब इस संसार को छोड़कर जा चुके थे।
बाबा साहब के पार्थिव शरीर को मुंबई एक विमान के द्वारा लाया गया और मुंबई में बाबा साहेब का अंतिम संस्कार किया गया।

बाबा साहेब का अंतिम संस्कार बौद्ध शैली में किया गया।
इस प्रकार *आधुनिक युग का मनु” कहे जाने वाले बाबा भीमराव अंबेडकर का महापरिनिर्वाण हो गया। मरणोपरांत बाबा साहेब को ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया गया।

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