Ganesh Shankar Vidyarthi Jayanti: ब्रिटिश शासन के खिलाफ कलम को हथियार बनाने वाले, ‘पत्रकारिता के पुरोधा’ गणेश शंकर विद्यार्थी की जयंती पर विशेष

Ganesh Shankar Vidyarthi Jayanti: ब्रिटिश शासन के खिलाफ कलम को हथियार बनाने वाले, ‘पत्रकारिता के पुरोधा’ गणेश शंकर विद्यार्थी की जयंती पर विशेष:
गणेश शंकर विद्यार्थी को पत्रकारिता का भगवान कहा जाता है।
गणेश शंकर विद्यार्थी एक समाजसेवी स्वतंत्रता सेनानी और कुशल राजनितिज्ञ तो थे ही लेकिन इन सब से कहीं अधिक वे एक निडर और निष्पक्ष पत्रकार थे। कहते हैं कलाम की ताकत तलवार से भी अधिक होती है। गणेश शंकर विद्यार्थी एक ऐसे ही पत्रकार थे जिन्होंने अपनी कलम की ताकत से ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिला दी थी। भारत के स्वाधीनता संग्राम में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है। गणेश शंकर विद्यार्थी एक ऐसे स्वतंत्रता सेनानी थे जिन्होंने कलम और वाणी के साथ-साथ महात्मा गांधी के अहिंसक समर्थकों और क्रांतिकारियों को समान रूप से देश की आजादी में सक्रिय सहयोग प्रदान किया।
आइए जानते हैं पत्रकारिता के पुरोधा गणेश शंकर विद्यार्थी के जीवन के विषय में-

गणेश शंकर विद्यार्थी जन्मदिवस (Birth Anniversary of Ganesh Shankar Vidyarthi) 26अक्टूबर, 2023

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गणेश शंकर विद्यार्थी (Ganesh Shankar Vidyarthi ) को पत्रकारिता का भगवान कहा जाता है

Ganesh Shankar Vidyarthi Jayanti: गणेश शंकर विद्यार्थी एक समाजसेवी स्वतंत्रता सेनानी और कुशल राजनितिज्ञ तो थे ही लेकिन इन सब से कहीं अधिक वे एक निडर और निष्पक्ष पत्रकार थे। कहते हैं कलाम की ताकत तलवार से भी अधिक होती है। Ganesh Shankar Vidyarthi एक ऐसे ही पत्रकार थे जिन्होंने अपनी कलम की ताकत से ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिला दी थी। भारत के स्वाधीनता संग्राम में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है। गणेश शंकर विद्यार्थी एक ऐसे स्वतंत्रता सेनानी थे जिन्होंने कलम और वाणी के साथ-साथ महात्मा गांधी के अहिंसक समर्थकों और क्रांतिकारियों को समान रूप से देश की आजादी में सक्रिय सहयोग प्रदान किया।

आइए जानते हैं पत्रकारिता के पुरोधा गणेश शंकर विद्यार्थी (Ganesh Shankar Vidyarthi Jayanti) के जीवन के विषय में-

गणेश शंकर विद्यार्थी का जीवन परिचय

Ganesh Shankar Vidyarthi का जन्म अपने ननिहाल प्रयागराज के अतरसुइया मोहल्ले में 26 अक्टूबर 1890 को हुआ था। उनके पिता का नाम जयनारायण था। उनके पिताजी को उर्दू फारसी का अच्छा ज्ञान था। वह एक स्कूल में अध्यापक थे। गणेश का बाल्यकाल मुंगावली में बीता तथा प्रारंभिक शिक्षा दीक्षा भी वहीं हुई। उनकी पढ़ाई की शुरुआत उर्दू से हुई। 1905 में उन्होंने भेलसा से अंग्रेजी मिडिल परीक्षा पास की। 1907 में प्राइवेट परीक्षा के रूप में एंट्रेंस परीक्षा पास की और आगे की पढ़ाई के लिए इलाहाबाद के कायस्थ पाठशाला में दाखिला लिया।

विद्यार्थीजी के व्यावसायिक जीवन की शुरुआत

गणेश शंकर (Ganesh Shankar Vidyarthi) की आर्थिक स्थिति दयनीय थी जिस कारण वे एंट्रेंस तक ही पढ़ सके, लेकिन उन्होंने अपना स्वतंत्र अध्ययन जारी रखा। गणेश शंकर विद्यार्थी ने अपनी मेहनत और लगन के बल पर पत्रकारिता के गुणों को खुद में भली भांति सहेज लिया था। Ganesh Shankar Vidyarthi को एक सरकारी नौकरी भी मिली थी लेकिन उनकी अंग्रेजी अधिकारियों से नहीं पटती थी।इसलिए उन्होंने नौकरी छोड़ दी।

विद्यार्थी जी का संपादन कार्य

कानपुर में करेंसी ऑफिस में नौकरी छोड़ने के बाद गणेश शंकर ने अध्यापन का कार्य शुरू किया। विद्यार्थी जी ने 16 वर्ष की आयु में ही “हमारी आत्मोसर्गता”नमक एक किताब लिख डाली थी। उनकी योग्यता पर महावीर प्रसाद द्विवेदी बहुत प्रसन्न थे। उन्होंने अपनी ‘सरस्वती’ के लिए विद्यार्थी जी को बुलाया। विद्यार्थी जी ने सरस्वती के बाद ‘अभ्युदय’ नामक पत्र में काम किया। 1907 से 1912 तक इनका जीवन संकटों से जूझता रहा। कुछ दिनों तक इन्होंने ‘ प्रभा’ पत्र का भी संपादन किया।

अक्टूबर 1913 में विद्यार्थी जी ने “प्रताप” का संपादन प्रारंभ किया ।”प्रताप” एक क्रांतिकारी पत्रिका थी जिसके माध्यम से विद्यार्थी जी ने उत्पीड़न और अन्याय के खिलाफ आवाज बुलंद किया। “प्रताप” के माध्यम से उन्होंने पीड़ित किसानों, मिल मजदूर और दबे- कुचले गरीबों के दुखों को उजागर किया।

"प्रताप" का प्रकाशन

अपने वरिष्ठजनों से सहयोग का आश्वासन पाकर विद्यार्थी जी ने ‘प्रतापस’ पत्र का प्रकाशन प्रारंभ किया। प्रताप समाचार पत्र के प्रथम अंक में ही उन्होंने स्पष्ट कर दिया था कि हम राष्ट्रीय आंदोलन, सामाजिक, आर्थिक क्रांति, जातीय गौरव, साहित्यिक, सांस्कृतिक विरासत के लिए अपने हक अधिकार के लिए संघर्ष करेंगे। अपने क्रांतिकारी पत्रकारिता के कारण विद्यार्थी जी को बहुत कष्ट उठाने पड़े। अंग्रेजों ने उन्हें जेल भेजा, जुर्माना लगाया और 22 अगस्त 1918 को प्रताप में प्रकाशित नानक सिंह की “सौदा ए वतन” नामक कविता से नाराज होकर अंग्रेजों ने विद्यार्थी जी पर राजद्रोह का आरोप लगाकर प्रताप का प्रकाशन बंद करवा दिया। 

Ganesh Shankar Vidyarthi जी ने आर्थिक संगठन से जूझते हुए 8 जुलाई 1918 को ‘ प्रताप’ की फिर से शुरुआत की। प्रताप के इस अंक में सरकार की दमन पूर्ण नीति की जमकर खिलाफत की, जिसके कारण आम जनता ने मुक्त हस्त से विद्यार्थी जी का आर्थिक सहयोग किया। लगातार अंग्रेजों के विरोध में समाचार प्रकाशित होने के कारण प्रताप पत्र की पहचान सरकार विरोधी बन गई। 

तत्कालीन मजिस्ट्रेट मिस्टर स्ट्राइफ ने प्रताप को ‘बदनाम पत्र’ की संज्ञा देकर उनकी जमानत राशि जब्त कर ली। अंग्रेजों के क्रोध का शिकार बनने के कारण उन्हें 23 जुलाई और 16 अक्टूबर 1921 में कठोर कारावास की सजा हुई लेकिन विद्यार्थी जी ने सरकार के विरुद्ध अपनी कलम की धार को कम नहीं होने दिया।

साहित्य के प्रति विधार्थी जी की गहरी अभिरुचि

Ganesh Shankar Vidyarthi की पत्रकारिता के साथ-साथ साहित्य में भी अभिरुचि थी। उनकी साहित्यिक रचनाएं ‘सरस्वती’, ‘कर्मयोगी’, ‘ स्वराज’ ‘हितवार्ता’ में छपती रही। हिंदी में “शेखचिल्ली की कहानीयां” विद्यार्थी जी की ही देन है। विद्यार्थी जी इलाहाबाद से निकलने वाले पत्र ‘ अभ्युदय’ से भी जुड़े। अंततः कानपुर लौटकर विद्यार्थी जी ने प्रताप अखबार की शुरुआत की जो भारत की आजादी की लड़ाई का मुख्य पत्र सिद्ध हुआ। प्रताप क्रांतिकारी विचारों में भारत की स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति का माध्यम बन गया।

‘प्रताप’ में निरंतर क्रांतिकारियों के विचार व लेख छपते रहते थे। राम प्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा प्रताप में छपी थी। भगत सिंह को भी प्रताप से विद्यार्थी जी ने ही जोड़ा था। Ganesh Shankar Vidyarthi जी महात्मा गांधी के समर्थक थे तथा उन्हें अपना नेता मानते थे। लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के विचारों से प्रेरित गणेश शंकर विद्यार्थी जंगे- आजादी के निष्ठा भगवान सिपाही थे।

पत्रकारिता के पुरोधा

विद्यार्थीजी की किशोरावस्था में ही समाचार पत्रों के प्रति गहरी रुची थी। वह ‘भारत मित्र’ ‘ बंगवासी’ जैसे अन्य समाचार पत्रों का गंभीरता से अध्ययन करते थे, जिसके कारण पठन-पाठन के प्रति उनकी रुचि दिनों दिन बढ़ती गई। उन्होंने उस समय के प्रसिद्ध विचारको, वाल्टेयर, थोरो, इमर्सन, जान स्टुअर्ट मिल, शेख सादी सहित अन्य रचनाकारों की कृतियों का अध्ययन किया। स्वभाव से उग्रवादी विचारों का होने के कारण विद्यार्थी जी महात्मा गांधी के अंग्रेजों के खिलाफ अहिंसात्मक आंदोलन से सहमत नहीं थे।

वह लोकमान्य तिलक के राष्ट्रीय दर्शन से बेहद प्रभावित थे। विद्यार्थी जी ने मात्र 16 वर्ष की अल्पायु में ‘हमारी आत्मोसर्गता’ नामक किताब लिख डाली थी। वर्ष 1911 में उनका पहला लेख आत्मोसर्ग शीर्षक से समाचार पत्र सरस्वती में प्रकाशित हुआ, जिसका संपादन हिंदी के उद्भुत विद्वान आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी किया करते थे। द्विवेदी जी के व्यक्तित्व और विचार से ही प्रभावित होकर विद्यार्थीजी पत्रकारिता के क्षेत्र में आए।

भाषा शैली

गणेश शंकर विद्यार्थी की भाषा में सरलता और प्रवाहमयता सर्वत्र मिलती है। उनकी शैली में भावात्मकता ओज और गांभीर्य निर्भीकता पाई जाती है। विद्यार्थी जी की शैली वक्रता प्रधान थी जिसे पाठक के मन पर गहरा प्रभाव पड़े बिना नहीं रहता। उनकी भाषा हर किसी के मन पर तीर की भांति चुभती थी। अपनी कलम की ताकत से वह गरीब और किसान की छोटी से छोटी परेशानी को दर्द की कहानी में बदल देते थे।

सांप्रदायिकता की भेंट चढ़े

Ganesh Shankar Vidyarthi एक ऐसे पत्रकार थे जिन्होंने आजादी के आंदोलन के दौर में दंगाई भीड़ के बीच भाईचारा कायम करने के लिए अपने प्राणों का बलिदान कर दिया। गणेश शंकर विद्यार्थी की मृत्यु कानपुर के हिंदू मुस्लिम दंगे में नि:सहायों को बचाते हुए 25 मार्च सन 1931 ईस्वी में हो गई। विद्यार्थीजी सांप्रदायिकता की भेंट चढ़ गए थे। अस्पताल की लाशों के बीच पड़ा उनका शव इतना फूल गया था कि उसे पहचानना तक मुश्किल था। 29 मार्च को विद्यार्थी जी का नम आंखों से अंतिम संस्कार कर दिया गया।

Ganesh Shankar Vidyarthi सांप्रदायिक सौहार्द के पुजारी थे। अपने अतुल देशभक्ति और अनुपम आत्मोसर्ग के लिए चिर स्मरणीय रहेंगे।