June 25, 2024

Sardar Vallabhbhai Patel Jayanti 2023:एकता का संदेश देने वाले लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल की जयंती पर विशेष

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Sardar Vallabhbhai Patel Jayanti 2023 || सरदार वल्लभभाई पटेल जयंती || Birth Anniversary of Sardar Vallabhbhai Pate || 31October 2023: बिखरी हुई विरासतों को एक सूत्र में पिरोते हुए, एएकता का संदेश देने वाले लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल की जयंती पर विशेष

‘सरदार पटेल’ के उपनाम से विख्यात भारत के लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल(Sardar Vallabhbhai Patel)की जयंती 31 अक्टूबर को मनाई जाती है। भारत के स्वाधीनता संग्राम के दौरान भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेताओं में से एक सरदार पटेल भारतीय बैरिस्टर और प्रसिद्ध राजनेता थे। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात सरदार पटेल भारत के प्रथम उप प्रधानमंत्री, गृह मंत्री, सूचना मंत्री और राज्य मंत्री रहे।

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बिखरी हुई विरासतों को एक सूत्र में पिरोते हुए, एकता का संदेश देने वाले लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल की जयंती पर विशेष

‘सरदार पटेल'(Sardar Patel) के उपनाम से विख्यात भारत के लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल(Sardar Vallabhbhai Patel)की जयंती 31 अक्टूबर को मनाई जाती है। भारत के स्वाधीनता संग्राम के दौरान भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेताओं में से एक सरदार पटेल भारतीय बैरिस्टर और प्रसिद्ध राजनेता थे। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात सरदार पटेल भारत के प्रथम उप प्रधानमंत्री, गृह मंत्री, सूचना मंत्री और राज्य मंत्री रहे। 

लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल (Sardar Vallabhbhai Patel) एक कुशल कूटनितिज्ञ थे। उन्होंने ही स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात सबसे बड़ी समस्या, रियासतों के एकीकरण को सुलझाया। आवश्यकता पड़ने पर सैन्य हस्तक्षेप के माध्यम से Sardar Vallabhbhai Patel अधिकांश रियासतों को एक तिरंगे के नीचे लाने में सफल रहे। उनकी इस उपलब्धि के कारण उन्हें “लौह पुरुष” या भारत का “बिस्मार्क”की उपाधि से सम्मानित किया गया। सरदार वल्लभभाई पटेल की जयंती “राष्ट्रीय एकता दिवस” (National Unity Day)के रूप में मनाई जाती है।

आईए जानते हैं भारत के “लौह पुरुष” सरदार वल्लभभाई पटेल के जीवन की रोचक यात्रा के बारे में-

लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल का जीवन परिचय (Biography of Iron Man Sardar Vallabhbhai Patel Patel)

सरदार वल्लभभाई पटेल का जन्म 31 अक्टूबर 1875 ईस्वी में गुजरात के नडियाड में लेवा पट्टीदार जाति के एक प्रसिद्ध जमींदार परिवार में हुआ था। उनके पिताजी का नाम झवेर भाई पटेल और माता का नाम लाड़बाई था। सरदार पटेल पांच भाई और एक बहन थे। सोमभाई, नरसी भाई और विट्ठल दास झवेर भाई पटेल उनके बड़े भाई थे। काशीभाई और बहन डाबीहा सबसे छोटी थी। विट्ठल भाई और वल्लभ भाई ने राष्ट्रीय आंदोलन में भाग लेकर भारतीय इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान ग्रहण किया।

लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल की शिक्षा (Education of Iron Man Sardar Vallabhbhai Patel)

सरदार पटेल ने करमसद में प्राथमिक विद्यालय और पेटलाद स्थित उच्च विद्यालय में शिक्षा प्राप्त की। लेकिन उन्होंने स्वाध्याय से ज्यादा ज्ञान अर्जित किया। 16 वर्ष की उम्र में ही उनका विवाह हो गया। सरदार पटेल ने 22 वर्ष की उम्र में मैट्रिक की परीक्षा पास की और जिला अधिवक्ता की परीक्षा में उत्तीर्ण हुए और वकालत करने लगे। उन्होंने 1900 में गोधरा में स्वतंत्र जिला अधिवक्ता कार्यालय की स्थापना की।

लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल के व्यावसायिक जीवन की शुरुआत ( Beginning of professional life of Sardar Vallabhbhai Patel)

Sardar Vallabhbhai Patel ने कमजोर मुकदमे को सटीकता से प्रस्तुत करके और पुलिस के गवाहो तथा अंग्रेज न्यायाधीशों को चुनौती देकर एक वकील के रूप में विशेष स्थान अर्जित किया। वकालत में शिखर पर पहुंचने के लिए दृढ़ प्रतिज्ञ पटेल ‘मिडिल टेंपल’ के अध्ययन के लिए 1910 में लंदन गए। लंदन में वे अंतिम परीक्षा में उच्च प्रतिष्ठा के साथ उत्तीर्ण हुए। फरवरी 1913 में वे भारत लौटे।

भारत लौटने के बाद सरदार पटेल अहमदाबाद अधिवक्ता बार में अपराध के कानून के अग्रणी बैरिस्टर बने।सरदार पटेल अहमदाबाद के फैशन परस्त गुजरात क्लब में ब्रिज के चैंपियन के तौर पर विख्यात थे,क्योंकि पटेल अपने ऊंचे रहन-सहन, तौर- तरीकों और चुस्त अंग्रेजी पहनावे के लिए जाने जाते थे।

1917 में सत्याग्रह से जुड़ाव और जीवन शैली में परिवर्तन

1917 तक लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल भारत की राजनीतिक गतिविधियों के प्रति उदासीन रहे। 1917 में महात्मा गांधी से प्रभावित होने के बाद सरदार पटेल के जीवन की दिशा बदल गई। हालांकि उन्होंने गांधी जी के नैतिक विश्वासों व आदर्शो से खुद को कभी नहीं जोड़ा। वह गांधी जी के सत्याग्रह से तभी तक जुड़े रहे जब तक वह अंग्रेजों के खिलाफ भारतीयों के संघर्ष में कारगर रहा, लेकिन गांधी जी के अनुसरण और समर्थन का संकल्प लेने के बाद पटेल जी ने अपनी शैली और वेशभूषा को पूर्णत: परिवर्तित कर दिया। वे भारतीय किसानों के समान सफेद वस्त्र पहनने लगे और भारतीय खान- पान को पूरी तरह से अपना लिया तथा गुजरात क्लब छोड़ दिया।

बारदोली सत्याग्रह से मिली 'सरदार' की उपाधि

1917 से 1924 तक लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल (Sardar Vallabhbhai Patel) अहमदनगर के पहले भारतीय निगम आयुक्त रहे। 1918 में जब भारी वर्षा से फसल तबाह होने के बावजूद मुंबई सरकार द्वारा पूरा सालाना लगान वसूलने के फैसले के विरुद्ध उन्होंने गुजरात के कैरा जिले में किसानों और काश्तकारों के जन आंदोलन की रूपरेखा बनाई तब उन्होंने अपनी पहली छाप छोड़ी। 1928 में बढ़े हुए करों के खिलाफ सरदार पटेल ने बारदोली के भूमिपतियों के संघर्ष का सफलतापूर्वक नेतृत्व किया, जिसके कारण देशभर में उनकी पहचान राष्ट्रवादी नेता के रूप में बन गई और उन्हें “सरदारसी की उपाधि मिली। अंग्रेज उन्हें एक खतरनाक शत्रु मानते थे।

"लौह पुरुष" सरदार वल्लभभाई पटेल का राजनीतिक दर्शन (Political philosophy of the Sardar Vallabhbhai Patel)

लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल क्रांतिकारी नहीं थे। वह व्यावहारिक आधार पर सशस्त्र आंदोलन को नकारते थे जबकि इसके विपरीत जवाहरलाल नेहरु स्वतंत्रता के लिए संघर्ष में हिंसा की अनदेखी करने के पक्ष में थे। महात्मा गांधी की भांति पटेल भी भारत को भविष्य में ब्रिटिश राष्ट्रकुल में बराबरी के सदस्य के रूप में देखना चाहते थे। वह भारत में आत्मनिर्भरता और आत्मविश्वास कायम करने पर जोर देते थे। लेकिन वे स्वतंत्रता के लिए हिंदू- मुस्लिम एकता को शर्त नहीं मानते थे। जवाहरलाल नेहरू बलपूर्वक आर्थिक और सामाजिक बदलाव के पक्षधर थे, जबकि पटेल इससे असहमत थे।

गांधी जी के दबाव में कांग्रेस के अध्यक्ष पद उम्मीदवार से पीछे हटे

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के 1929 के लाहौर अधिवेशन में Sardar Vallabhbhai Patel महात्मा गांधी के बाद अध्यक्ष पद के दूसरे दावेदार थे लेकिन गांधी जी ने स्वाधीनता के प्रस्ताव को स्वीकृत होने से रोकने के प्रयास में अध्यक्ष पद की दावेदारी छोड़ दी और मुसलमानों के प्रति पटेल की हठधर्मिता के कारण पटेल पर भी नाम वापस लेने का दबाव बनाया। अंततः जवाहरलाल नेहरू अध्यक्ष बने। 1937- 38 में सरदार पटेल कांग्रेस के अध्यक्ष पद के प्रमुख दावेदार थे लेकिन एक बार फिर गांधी जी के दबाव में पटेल को अपना नाम वापस लेना पड़ा और जवाहरलाल नेहरू निर्वाचित हुए। 

1945- 46 में सरदार पटेल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष पद के लिए प्रमुख उम्मीदवार थे लेकिन महात्मा गांधी ने एक बार फिर हस्तक्षेप करके जवाहरलाल नेहरू को अध्यक्ष बनवा दिया। ब्रिटिश वायसराय ने अंतरिम सरकार के गठन के लिए कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में नेहरू को आमंत्रित किया। इस दौरान सरदार पटेल को 1930, 1932 और 1940 में जेल भी जाना पड़ा

इस प्रकार यदि महात्मा गांधी ने Sardar Vallabhbhai Patelपर अध्यक्ष पद की उम्मीदवारी से नाम वापस लेने का दबाव न बनाया होता या यूं कहें कि यदि सरदार पटेल ने अध्यक्ष पद से अपना नाम वापस ना लिया होता तो भारत की तस्वीर कुछ और होती। सरदार पटेल भारत के प्रथम प्रधानमंत्री होते लेकिन सरदार पटेल को उप प्रधानमंत्री बनाया गया।

भारत के प्रथम प्रधानमंत्री के चुनाव के 25 वर्ष बाद चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने लिखा था “निसंदेह बेहतर होता यदि नेहरू को विदेश मंत्री तथा सरदार पटेल को प्रधानमंत्री बनाया जाता। यदि पटेल कुछ दिन और जीवित रहते तो वह प्रधानमंत्री पद पर अवश्य पहुंचते जिसके लिए संभवत:वह योग्य पात्र थे। तब भारत में कश्मीर, तिब्बत, चीन और अन्यान्य विवादों की कोई समस्या नहीं रहती

देसी रियासतों के विलय में वल्लभभाई ने निभाई महत्वपूर्ण भूमिका

भारत के स्वतंत्र होने के प्रथम तीन वर्ष सरदार पटेल उप प्रधानमंत्री, गृह मंत्री, सूचना मंत्री और राज्य मंत्री रहे। उनकी ख्याति भारत के राजनीतिक एकीकरण और भारतीय रजवाड़ों को भारतीय संघ में शामिल करने के कारण रही। भारत के तत्कालीन गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने भारतीय संघ में उन रियासतों का विलय किया जो स्वयं में प्रभुता संपन्न थी। उनका अलग झंडा, अलग शासक था। 

आजादी के संक्रमण काल में ही पी.वी.मेनन के साथ मिलकर सरदार पटेल ने देशी राज्यों को भारत में मिलाने का कार्य आरंभ कर दिया था। पटेल के प्रयासों से ही 15 अगस्त 1947 तक हैदराबाद,कश्मीर और जूनागढ़ को छोड़कर शेष भारतीय रियासतें भारतीय संघ में शामिल हो चुकी थी। हैदराबाद में सेना भेजकर पटेल ने हैदराबाद के निजाम का आत्मसमर्पण करा लिया ।भारी विरोध के कारण जूनागढ़ का नवाब थी भाग कर पाकिस्तान चला गया। इस प्रकार जूनागढ़ भी भारत में मिला लिया गया। देसी रियासतों का भारतीय संघ में विलय भारतीय इतिहास की पड़ी उपलब्धि थी।

सरदार पटेल का राजनीतिक योगदान

Sardar Vallabhbhai Patel आधुनिक भारत के शिल्पी थे। उनके कठोर व्यक्तित्व में ‘बिस्मार्क’ जैसी संगठन कुशलता, ‘कौटिल्य’ जैसी राजनीति सत्ता तथा राष्ट्रीय एकता के प्रति ‘अब्राहम लिंकन’ जैसी अटूट निष्ठा थी। भारत के राजनीतिक इतिहास में सरदार पटेल के योगदान को भुलाना असंभव है। उन्होंने अदम्य उत्साह, असीम शक्ति से नवजात गणराज्य की प्रारंभिक कठिनाइयों का सरलता से समाधान करके विश्व के राजनीतिक मानचित्र पर अमिट स्थान अंकित किया है। उनके राजनीतिक योगदान इस प्रकार हैं-

  • देसी रियासतों के एकीकरण की समस्या को बिना खून- खराबे के बड़ी समझदारी से हल किया।
  • चीन के प्रधानमंत्री द्वारा जवाहरलाल नेहरू को यह कहने पर कि तिब्बत को चीन का अंग मान ले, सरदार पटेल ने नेहरू को चेताया था कि तिब्बत पर चीन का प्रभुत्व मानना भारत के लिए खतरनाक साबित होगा। हालांकि नेहरू ने पटेल का यह सुझाव नहीं माना और चीन ने भारतीय सीमा की 40 हजार वर्ग गज भूमि पर कब्जा कर लिया।
  • लक्षद्वीप समूह के लोग देश की मुख्य धारा से कटे हुए थे। यहां तक की भारत के स्वतंत्र होने की जानकारी भी उन्हें कई दिनों बाद मिली। सरदार पटेल को आशंका थी कि पाकिस्तान लक्षद्वीप पर दावा कर सकता है। अतः उन्होंने भारतीय नौसेना का जहाज भेज कर वहां राष्ट्रीय ध्वज फहराया। इसके कुछ घंटे बाद ही पाकिस्तानी नौसेना का जहाज लक्षद्वीप के पास देखा गया लेकिन भारत का झंडा देखकर वापस कराची लौट गया।
  • सरदार पटेल ने सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण, गांधी स्मारक निधि की स्थापना, कमला नेहरू अस्पताल की रूपरेखा आदि जैसे ऐतिहासिक कार्य किए ।

गांधी जी के प्रति अटूट श्रद्धा

सरदार पटेल की गांधी जी के प्रति अटूट श्रद्धा थी। पटेल वह अंतिम व्यक्ति थे जिन्होंने गांधी जी की हत्या के कुछ क्षण पहले ही उनसे बात की थी। गृह मंत्री होने के नाते गांधीजी की सुरक्षा में चूक को उन्होंने अपनी गलती माना था। गांधी जी की हत्या का उन्हें गहरा आघात लगा था।

संघ को किया प्रतिबंधित

हिंदू चरमपंथियों का नाम गांधीजी की हत्या में आने पर सरदार पटेल ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को प्रतिबंधित कर दिया और सरसंघचालक एस. एस. गोलवलकर को जेल में डाल दिया गया।

गृह मंत्री के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान सरदार पटेल ने कश्मीर के संवेदनशील मामले को सुलझाने में कई मुश्किलों का सामना किया। उनका मानना था कि कश्मीर मामले को संयुक्त राष्ट्र में नहीं ले जाना चाहिए।

भारत के लौह पुरुष

गृह मंत्री बनने के बाद सरदार पटेल को भारतीय रियासतों के विलय की जिम्मेदारी सौंपी गई और अपने दायित्व का निर्वहन करते हुए उन्हें उन्होंने 600 छोटी बड़ी रियासतों का भारत में विलय कराया जो स्वतंत्र भारत की पहली उपलब्धि थी। उनकी नीतिगत दृढ़ता के लिए राष्ट्रपिता ने उन्हें “लौह पुरुष” की उपाधि दी। 

जिस प्रकार जर्मनी के एकीकरण में बिस्मार्क ने भूमिका निभाई थी उसी प्रकार आजाद भारत को विशाल राष्ट्र बनाने में वल्लभभाई ने उल्लेखनीय योगदान दिया। इसीलिए यदि बिस्मार्क को जर्मनी का ‘आयरन चांसलर’ कहा जाता है तो पटेल को भारत का “लौह पुरुष” कहा जाता है।(Sardar Vallabhbhai Patel is known as the iron man of India.)

सरदार पटेल के राजनीतिक विरोधियों ने उन्हें मुस्लिम वर्ग का विरोधी बताया लेकिन यह वास्तविकता से परे हैं। सरदार पटेल ने हिंदू- मुस्लिम एकता के लिए आजीवन संघर्ष किया। गांधी जी ने कहा था “सरदार पटेल को मुस्लिम विरोधी बताना सत्य को झुठलाना है यह बहुत बड़ी विडंबना है।”

लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल का निधन

लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल  जी का निधन 15 दिसंबर 1950 को मुंबई, महाराष्ट्र में हुआ था।

सम्मान और पुरस्कार

सरदार पटेल को मरणोपरांत 1999 में ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया गया।

स्टैच्यू ऑफ यूनिटी

लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल  की 137वीं जयंती के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुजरात के मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए गुजरात के नर्मदा जिले में सरदार पटेल के स्मारक का शिलान्यास किया और अब यह विश्व की सबसे ऊंची प्रतिमा एकता की मूर्ति (Statue of Unity) के रूप में जानी जाती है। यह प्रतिमा एक छोटे से चट्टानी दीप पर स्थित है जो केवाड़िया में सरदार सरोवर बांध के सामने नर्मदा नदी के मध्य में है।

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