विजय दिवस 2022 : भारत विजय दिवस क्यों मनाता है? (Vijay Diwas 2022 : Why does India celebrate Vijay Diwas? )

विजय दिवस 2022 (Vijay Diwas 2022 ) : 1971के युद्ध में पाकिस्तान पर भारतीय सेना की जीत की याद में हर वर्ष 16 दिसंबर को विजय दिवस मनाया जाता है यह वर्ष उस घटना की 51वी वर्षगांठ है जिसके कारण बांग्लादेश का उदय हुआ।

विजय दिवस (Vijay Diwas) के दिन विश्व के युद्ध के इतिहास में सेना का सबसे बड़ा आत्मसमर्पण हुआ था। इस दिन विश्व के राजनीतिक नक्शे पर एक नए राष्ट्र का उदय हुआ। अतः यह सिर्फ भारत ही नहीं, अपितु संपूर्ण विश्व के लिए ऐतिहासिक दिन है।
Vijay Diwas 2022

विजय दिवस 2022 (Vijay Diwas 2022)

Why does India celebrate Vijay Diwas? Vijay Diwas 2022 Latest

विजय दिवस 2022 (Vijay Diwas 2022 ) : 1971के युद्ध में पाकिस्तान पर भारतीय सेना की जीत की याद में हर वर्ष 16 दिसंबर को विजय दिवस मनाया जाता है यह वर्ष उस घटना की 51वी वर्षगांठ है जिसके कारण बांग्लादेश का उदय हुआ।

विजय दिवस (Vijay Diwas) के दिन विश्व के युद्ध के इतिहास में सेना का सबसे बड़ा आत्मसमर्पण हुआ था। इस दिन विश्व के राजनीतिक नक्शे पर एक नए राष्ट्र का उदय हुआ। अतः यह सिर्फ भारत ही नहीं, अपितु संपूर्ण विश्व के लिए ऐतिहासिक दिन है।

बांग्लादेश का उदय

24 वर्षों से दमन और अत्याचार सहन कर रहे उस समय के पूर्वी पाकिस्तान के करोड़ों लोगों को भारतीय सेनाओं के पराक्रम और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के दृढ़ संकल्प की बदौलत मुक्ति मिली। बंगाल का एक बड़ा हिस्सा पूर्वी पाकिस्तान के नाम से पाकिस्तान के शोषण और अत्याचारों को सहन कर रहा था और यह सब परिणाम था अंग्रेजों द्वारा जातीय आधार पर किए गए बटवारा का।
1971 में पाकिस्तान में हुए आम चुनाव में शेख मुजीबुर्रहमान की पार्टी आवामी लीग ने भारी जीत हासिल की और सत्ता की हकदार बन गई। पाकिस्तान की 169 से 167 सीट शेख मुजीबुर्रहमान की पार्टी को मिली। सरकार बनाने के लिए मुजीबुर्रहमान के पास बहुमत था जो 313 सीटों वाली पाक नेशनल असेंबली में सरकार बनाने के लिए पर्याप्त था। लेकिन पाकिस्तानी नेताओं और सैन्य अधिकारियों को एक बंगाली नेता का शासन मंजूर नहीं था। इसलिए जब शेख मुजीबुर्रहमान ने पाकिस्तान का राष्ट्रपति बनने और सरकार बनाने का दावा किया तो तुरंत ही पीपुल्स पार्टी के जुल्फीकार अली भुट्टो ने मुजीबुर्रहमान का दावा खारिज करते हुए पाकिस्तान में सैन्य शासन लागू करने की सिफारिश कर दी। पूर्वी पाकिस्तान में फैल रहे असंतोष को दबाने के लिए पश्चिमी पाकिस्तानियों द्वारा कठोर सैनिक कार्यवाही शुरू कर दी गई। 25 मार्च 1971 को आवामी लीग को भंग कर दिया गया और शेख मुजीबुर्रहमान को गिरफ्तार कर लिया गया।

मुक्ति वाहिनी का गठन

पाकिस्तानी सेना के मेजर जियाउर रहमान ने बांग्लादेश की स्वतंत्रता की घोषणा कर दी और शेख मुजीबुर्रहमान को भी आजाद करने की घोषणा कर दी। इसके बाद पाकिस्तान में मुक्ति वाहिनी का गठन किया गया। पूर्वी पाकिस्तानी सेना के द्वारा गठित मुक्ति वाहिनी ने पश्चिमी पाकिस्तान की सेना से युद्ध किया। इस युद्ध में अंत में बेतहाशा कत्लेआम हुए। पूर्वी बंगाल में बड़े पैमाने पर अत्याचार किए गए। हत्या और बलात्कार की घटनाएं चरम सीमा पर थी। गिरफ्तारी और यातना से बचने के लिए बड़ी संख्या में आवामी लीग के सदस्य भागकर भारत आ गए।

भारत में शरणार्थी संकट बढ़ने लगा। करीब एक करोड़ शरणार्थियों ने भाग कर भारत में शरण ली। इस वजह से पाकिस्तान के खिलाफ कार्यवाही करने का भारत पर दबाव बढ़ने लगा। भारतीय प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने मौके की नजाकत को भांपते हुए पूर्वी पाकिस्तान में सैन्य हस्तक्षेप का निर्णय लिया। प्रधानमंत्री ने भारतीय फील्ड मार्शल सैम मानेक्शा को लड़ाई के लिए तैयार रहने को कहा। 3 दिसंबर 1971 को पश्चिम सेक्टर में पाकिस्तान द्वारा हमला कर दिया गया। जिस समय भारतीय ठिकानों पर पाकिस्तान ने हमला किया तो भारतीय सेना ने पूर्वी पाकिस्तान को आजाद कराने का अभियान शुरू कर दिया। पाकिस्तानियों के पास भारत की अपेक्षा अधिक सैनिक थे। ढाका की रक्षा के लिए पाकिस्तान के पास 26400 सैनिक थे जबकि भारत के पास केवल 3000 सैनिक। जो ढाका की सीमा के बाहर थे। अधिक सैनिक बल होने के बावजूद पाकिस्तान का मनोबल गिरता जा रहा था। किंतु भारतीय सेना ने पाकिस्तान का दृढ़ता से मुकाबला किया। यह लड़ाई 15 दिनों तक चली। इसके बाद ढाका में पाकिस्तानी जनरल नियाजी और पाकिस्तान के 93000 सैनिकों ने भारतीय सेना के जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा के सामने समर्पण कर दिया।
अमेरिका और चीन के भारी दबाव के बावजूद भी इंदिरा गांधी जरा भी नहीं डरी और पाकिस्तान के दो टुकड़े कर दिए। इस युद्ध की सफलता का पूरा श्रेय इंदिरा गांधी और फील्ड मार्शल मानेकशॉ को जाता है। इस अदम्य साहस को देखकर दुनिया भर में इंदिरा गांधी को आयरन लेडी का खिताब दिया गया। तत्कालीन नेता प्रतिपक्ष अटल बिहारी बाजपेई ने इंदिरा गांधी को “दुर्गा” की संज्ञा दी थी। बांग्लादेश 9 महीने के खूनी संघर्ष के बाद पाकिस्तान से आजाद हुआ और इस आजादी में भारत की निर्णायक भूमिका रही थी।